TCS, Wipro जैसी कंपनियों को बेचने पड़ सकते हैं अरबों डॉलर के शेयर, जानिए क्‍यों

वित्‍तमंत्री निर्मला सीतारमण ने भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) से प्रस्‍ताव पर विचार करने को कहा है.
TCS, TCS, Wipro जैसी कंपनियों को बेचने पड़ सकते हैं अरबों डॉलर के शेयर, जानिए क्‍यों

नई दिल्‍ली: वित्‍तमंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट 2019-20 में एक ऐसा प्रस्‍ताव किया है जिससे कई भारतीय कंपनियों को अरबों डॉलर मूल्‍य के शेयर बेचने पड़ सकते हैं. इनमें टाटा कंसल्‍टेंसी सर्विसेज (TCS), Wipro, हिंदुस्‍तान यूनिलिवर लिमिटेड जैसी कम से कम 100 भारतीय कंपनियां शामिल हैं. सरकार ने न्‍यूनतम पब्लिक शेयरहोल्डिंग को बढ़ाकर 25 से 35 प्रतिशत करने का प्रस्‍ताव दिया है. सीतारमण ने भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) से प्रस्‍ताव पर विचार करने को कहा है.

इस नियम के चलते करीब 57 बिलियन डॉलर (3.9 लाख करोड़ रुपये) की इक्विटी सेल्‍स हो सकती है. इस कदम से मल्‍टीनेशनल कंपनियों की घरेलू यूनिट्स खुद को एक्‍सचेंज से डी-लिस्‍ट करने की ओर जा सकती हैं क्‍योंकि वे स्‍थानीय फंडिंग पर निर्भर नहीं होतीं.

इस नए प्रस्‍ताव का मतलब यह कि एक कंपनी के कम से कम 35 प्रतिशत शेयर पब्लिक के पास होने चाहिए. बाकी में प्रमोटर्स का हिस्‍सा आ सकता है. अगर यह नियम बना तो TCS, WIPRO, एवन्‍यू सुपरमार्ट्स और कोल इंडिया जैसी कंपनीज को भारी संख्‍या में शेयर बेचने पड़ेंगे.

TCS, Wipro में प्रमोटर्स का कितना हिस्‍सा?

TCS के 72.05% शेयर्स प्रमोटर्स के पास हैं, जबकि Wipro में प्रमोटर्स के पास 73.85% शेयर हैं. बॉम्‍बे स्‍टॉक एक्‍सचेंज की लिस्टिंग के अनुसार, एवन्‍यू सुपरमार्ट्स में प्रमोटर्स का हिस्‍सा 81.2% है, जबकि कोल इंडिया के 70.96 शेयर्स पर प्रमोटर्स का कब्‍जा है.

सीतारमण ने लोकसभा में 2019-20 का केन्द्रीय बजट पेश करते हुए कहा, “सामाजिक कल्याण के उद्देश्य को हासिल करने के लिए कार्य करने वाले सामाजिक उद्यमों और स्वैच्छिक संगठनों को सूचीबद्ध करने के लिए SEBI के विनियामक दायरे में इलेक्ट्रॉनिक फंड रेइजिंग प्लेटफॉर्म-सोशल स्टॉक एक्सचेंज बनाने के लिए मैं कदम उठाने का प्रस्ताव करती हूं, ताकि वे इक्विटी ऋण या म्यूचुअल फंड की तरह यूनिट के रूप में पूंजी जुटा सकें.”

वित्तमंत्री ने कहा, “खुदरा निवेशकों का सरकार द्वारा जारी ट्रेजरी बिलों और प्रतिभूतियों में निवेश महत्वपूर्ण है. रिजर्व बैंक के प्रयासों को स्टॉक एक्सचेंज का उपयोग करते हुए संस्थागत विकास के साथ मजबूती प्रदान की जानी चाहिए. इस उद्देश्य के लिए आरबीआई डिपॉजिटरीज और सेबी डिपॉजिटरीज के बीच आपसी विनिमय आवश्यक है, ताकि ट्रेजरी बिल और सरकारी प्रतिभूतियों का आरबीआई और डिपॉजिटरी लेजर के बीच हस्तांतरण हो सके. आरबीआई और सेबी के साथ परामर्श के पश्चात सरकार जरूरी कदम उठाएगी.”

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