भारत के लिए कितनी अहम है नई ग्लोबल व्यापार व्यवस्था, घरेलू नीतियों को लचीला बनाने की चुनौती

क्वाड में न सिर्फ अमेरिका, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं, बल्कि, Covid-19 के बाद दक्षिण कोरिया, वियतनाम और न्यूजीलैंड भी क्वाड के आर्थिक एजेंडे को देखते हुए क्वाड प्लस (QUAD PLUS) में शामिल होने पर विचार कर रहे हैं.

  • Vishnu Shankar
  • Publish Date - 6:05 pm, Wed, 14 October 20
Global Trades (FILE)

मंगलवार यानी कल दैनिक इंडियन एक्सप्रेस में एक लेख छपा, जिसमें लेखक, सी राजामोहन ने कहा है कि जापान की राजधानी, टोक्यो में क्वाड (QUAD) देशों की आपसी सुरक्षा सुनिश्चित करने पर लक्षित मीटिंग के बाद भारत के पास दुनिया में सामरिक और आर्थिक दोनों स्तर पर खुद को मजबूत बनाने का एक सुनहरा मौका है. सी राजामोहन नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर के इंस्टीट्यूट ऑफ साउथ एशियन स्टडीज में डायरेक्टर और अंतरराष्ट्रीय मामलों पर इंडियन एक्सप्रेस के कंट्रीब्यूटिंग एडिटर हैं.

सी राजामोहन के अनुसार. क्वाड में न सिर्फ अमेरिका, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं, बल्कि, Covid-19 के बाद दक्षिण कोरिया, वियतनाम और न्यूजीलैंड भी क्वाड के आर्थिक एजेंडे को देखते हुए क्वाड प्लस (QUAD PLUS) में शामिल होने पर विचार कर रहे हैं. यहां गौर करने वाली बात यह है कि सामरिक सुरक्षा और आर्थिक दोनों नजरिए से चीन इन सभी देशों के फोकस में है.

इन देशों के बीच चीन को क्षेत्रीय स्तर पर दादागिरी करने से रोकने और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था को अपने हक में करने की उसकी कोशिशों को नाकाम करने के कदमों पर विचार चल रहा है. भारत सुरक्षा और आर्थिक दोनों ही दृष्टिकोण से इस मुहिम में सबसे आगे खड़ा है.

क्वाड के साथ सुरक्षा गठबंधन के लिए विचार

अपनी सीमाओं पर चीन की घुसपैठ और भारतीय उपमहाद्वीप में पड़ोसियों के बीच और हिन्द महासागर क्षेत्र में उसकी बढ़ती हुई सामरिक भूमिका को चुनौती देने के लिए भारत, अब QUAD के बाकी देशों के साथ एक सुरक्षा गठबंधन करने पर विचार करने को तैयार है. चीन के साथ अपने आर्थिक संबंधों में कमी करने में दुनियाभर में सबसे आगे भारत ही रहा है.

फिर चाहे वो 2019 में रीजनल कंप्रिहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप (RCEP) हो या चीन का बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव यानी BRI, जिसे चीन ने 2017 में पहली बार परिभाषित किया था, भारत ने दोनों का ही विरोध किया है.

क्वाड प्लस के रोल पर असमंजस में क्यों है भारत?

पूर्वी लद्दाख में चीन के दुस्साहस के बाद भारत ने उसके साथ व्यापार और निवेश पर सीमाएं बांधनी शुरू कर दी हैं, लेकिन राजमोहन के अनुसार, भारत सुरक्षा संबंधी विषयों पर क्वाड की भूमिका को लेकर जितना आश्वस्त है, आर्थिक क्षेत्र में क्वाड प्लस के रोल पर अभी भी भारत की सोच पर प्रश्न चिन्ह लगा हुआ है.

इस विषय में भारत का असमंजस अकेला नहीं है. दुनिया के अधिकतर देशों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुरक्षा और आर्थिक संबंधों को लेकर उहापोह की स्थिति बनी हुई है. सभी अब अमेरिका की तरफ देख रहे हैं और उम्मीद है कि वहां राष्ट्रपति चुनाव का नतीजा बहुत सी बातों पर स्थिति को साफ कर देगा. सबके जहन में एक ही सवाल है कि डोनाल्ड ट्रंप या जो बाइडन, दोनों में से कौन जीतेगा?

चीन को लेकर अमेरिकी प्रशासन ने जाहिर की अपनी सोच

पिछले कुछ महीनों में राष्ट्रपति ट्रंप के अधिकारियों ने चीन को लेकर विचारधारा, राजनीतिक, आर्थिक, तकनीकी और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर अमेरिकी प्रशासन की सोच और नीतियों को साफ करने की कोशिश की है, लेकिन 40 साल से चली आ रही परस्पर आर्थिक निर्भरता की नीतियों के जंजाल को सुलटाने में समय लगता है.

फिर कुछ लोगों का यह भी सोचना है कि जो बाइडन अगर जीत जाते हैं, तो क्या वो चीन को लेकर ट्रंप की नीतियों को पलट देंगे और वापस चीन के साथ समझौतों की नीति पर लौट जाएंगे. एक राय यह भी है कि सभी पक्षों के अमरीकी प्रशासकों को अब चीन से मिल रही चुनौती का अच्छा अंदाज मिल चुका है. इसलिए, जीतने की स्थिति में भले ही बाइडन की शैली ट्रंप से अलग हो, लेकिन चीन की चुनौतियों पर उनका जवाब ट्रंप से बहुत भिन्न नहीं होना चाहिए.

बाइडन प्रशासन में चीन को लेकर हो सकता है वादविवाद!

वहीं भारत सहित दुनिया के अन्य देशों में अमेरिका पर नजर जमाए यथार्थवादियों को इस संबंध में सोच समझकर फैसले लेने की जरूरत है, क्योंकि हो सकता है जीतने की स्थिति में बाइडन प्रशासन में ही चीन नीति को लेकर गंभीर वादविवाद हो जाए.

डेमोक्रेटिक पार्टी में क्लाइमेट हॉक्स का एक बड़ा तबका है, जो क्लाइमेट चेंज के विषय में बहुत ही आक्रामक नीतियों का हामी है. यह ग्रुप चीन के साथ संघर्ष की नीति को छोड़ उसके साथ क्लाइमेट चेंज पर सहयोग करना चाह सकता है, ताकि दुनिया के ऊपर छाए इस गंभीर संकट को काबू किया जा सके.

साथ ही डेमोक्रेट्स के बीच उदारवादी मानवाधिकारवादियों का भी एक ग्रुप है, जो चाह सकता है कि अमेरिकी प्रशासन चीन द्वारा अपने अल्पसंख्यकों के साथ अपनाई जा रही नीतियों का मजबूती से प्रतिकार करे और उसके साथ एक नए शीत युद्ध की शुरुआत न की जाए.

जीतने के बाद क्या ट्रंप की नीतियों पर चलेंगे बाइडन?

वॉल स्ट्रीट और सिलिकॉन वैली में स्थित प्रभावशाली आर्थिक और तकनीकी ग्रुप अभी जो बाइडन की उम्मीदवारी का समर्थन कर रहे हैं. ये भी चाहेंगे कि चीन के साथ फिर से मेलमिलाप और सहयोग की नीति पर लौट चला जाए, लेकिन डेमोक्रेट्स में जो प्रगतिशील और लेबर धड़े हैं, वो चाहते हैं कि ट्रंप ने चीन के साथ नीतियों का जो पुनर्मूल्यांकन किया है, उसे जारी रखा जाए.

बाइडन एक जमाने में चीन के साथ फ्री-ट्रेड के समर्थक थे, लेकिन समय के साथ उनके नजरिए में बदलाव आया है. उन्होंने कहा है कि जीतने पर पहले वो अमेरिकी कामगारों पर ध्यान देंगे. उसके बाद ही फ्री-ट्रेड के समझौतों पर बात की जाएगी.

सच्चाई यह भी है कि बाइडन की कई योजनाएं ट्रंप की “अमेरिका फर्स्ट” नीति के बहुत करीब हैं. बाइडन अमेरिका में पहले से ज्यादा उत्पादन चाहते हैं. उनकी मंशा है कि अमेरिकी नागरिक अमेरिका में निर्मित सामान ज़्यादा खरीदें. उन्होंने एक मैक्रो इकोनॉमिक पॉलिसी का एजेंडा घोषित किया है ताकि अमेरिकी उद्योग और तकनीक के क्षेत्र में अमेरिका की पुरानी बढ़त को फिर से कायम किया जाए.

भारत के हक में होगा यह कदम

बाइडन के कुछ सलाहकारों ने ट्रंप की उस नीति को भी जारी रखने की वकालत की है, जिसके तहत चीन से अलग अमेरिका के भरोसेमंद देशों के साथ मिल कर ग्लोबल सप्लाई चेन का एक वैकल्पिक नेटवर्क बनाने की योजना है. ग्लोबल ट्रेडिंग व्यवस्था को दोबारा परिभाषित करने की यह कोशिश भारत के हक में हो सकती है, अगर वह ‘QUAD PLUS’ की आर्थिक योजनाओं में शरीक हो.

भारतीय नीति निर्धारक यह भी चाहेंगे कि आत्मनिर्भर अमेरिका का उदाहरण देख कर भारत में भी नई ग्लोबल व्यापार व्यवस्था के अनुरूप घरेलू औद्योगिक नीति का निर्माण हो, लेकिन समस्या यह है कि भारत में आर्थिक क्षेत्र की नीतियों के निर्माण में बरसों लग जाते हैं और फिर भी गुंजाइश रह जाती है. ध्यान देने वाली बात है कि भारत अभी तक अमेरिका के साथ एक मिनी ट्रेड डील भी नहीं कर पाया है, जब कि इस पर कई सालों से विचार चल रहा है.

घरेलू आर्थिक नीतियों को लचीला बनाने की चुनौती

याद रहे क्वाड प्लस में भारत के सहयोगी देश जापान, दक्षिण कोरिया, वियतनाम, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड सभी व्यापर पर लचीला रुख अपनाने वाले मुल्क हैं और ये सब अमरीका के साथ और आपस में व्यापार करने के रास्ते निकाल लेंगे.

अब भारत के सामने अपनी घरेलू आर्थिक नीतियों को और लचीला बनाने की बड़ी चुनौती है, ताकि वह प्रस्तावित नई ग्लोबल व्यापार नीति के अनुसार खुद को ढाल सके. इस चुनौती के समाधान में भारत की भावी सफलता निहित है.

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