Infosys Crisis: सुधा मूर्ति के 10 हजार से खड़ी हुई थी कंपनी, पढ़िए उनके त्याग और सादगी की कहानी

इस कंपनी को खड़ा करने के लिए कभी सुधा मूर्ति (Sudha Murthy) ( इंफोसिस के संस्थापक नारायण मूर्ति की पत्नी) ने त्याग और परिश्रम की पराकाष्ठा पार कर दी थी. सुधा मूर्ति बेहद सादगी की परिचायक हैं. उन्होंने अब तक 92 किताबें लगभग सभी भारतीय भाषाओं में लिखी है.

नई दिल्ली: आईटी सेक्टर की सबसे बड़ी कंपनी इंफोसिस इन दिनों मुश्किल दौर से गुजर रही है. कंपनी के सीईओ सलिल पारेख और सीएफओ निलांजन रॉय पर आरोप है कि कंपनी को मुनाफे में दिखाने के लिए इन्होंने निवेश नीति और एकाउंटिंग से छेड़छाड़ की है. उसी दिन इन्फोसिस (Infosys) के शेयरों में 17 फीसदी की गिरावट आ गई और इसके शेयरधारकों को एक दिन में 55,000 करोड़ रुपये का नुकसान हो गया.

इस कंपनी को खड़ा करने के लिए कभी सुधा मूर्ति (Sudha Murthy) ( इंफोसिस के संस्थापक नारायण मूर्ति की पत्नी) ने त्याग और परिश्रम की पराकाष्ठा पार कर दी थी. सुधा मूर्ति बेहद सादगी की परिचायक हैं. उन्होंने अब तक 92 किताबें लगभग सभी भारतीय भाषाओं में लिखी है.

सुधा मूर्ति की पहली नौकरी
अगर मैं ये कहूं कि त्याग और सादगी का दूसरा नाम सुधा मूर्ति (Sudha Murthy) है तो ये अतिशयोक्ति नहीं कहलाएगा. सुधा मूर्ति पहले TELCO (टेल्को) कंपनी में बतौर इंजीनियरिंग काम करती थीं. मूर्ति पुणे स्थित टेल्को में काम करने वाली एकमात्र महिला थीं. वहीं टेल्को कंपनी में नौकरी मिलने की भी एक अलग ही कहानी है. फिलहाल शादी से पहले उनका नाम सुधा कुलकर्णी होता था. उसके बाद नारायण मूर्ति (Narayana Murthy) से शादी हो जाने के बाद उनका नाम सुधा मूर्ति हो गया. ये बात उन्होंने खुद बताई.

चौंक गए थे जे आर डी टाटा
एक बार टाटा ग्रुप के चेयरमैन जेआरडी टाटा (JRD TATA) ने सुधा मूर्ति ने उनसे नाम पूछा. उनका जवाब सुनकर वो भी हंस पड़े थे. सुधा मूर्ति (Sudha Murthy) से जवाब दिया, “सर जब मैंने टेल्को ज्वाइन किया था तब सुधा कुलकर्णी और अब सुधा मूर्ति.” इसके बाद 1981 में उन्होंने टेल्को कंपनी छोड़ दी. एक बार फिर जेआरडी टाटा से उनका आमना-सामना हुआ. इस बार वो बोलीं कि मैं टाटा कंपनी को छोड़ रही हूं. जेआरडी टाटा थोड़ा चौंक गए और पूछा क्यों?. तब मूर्ति ने जवाब दिया कि मेरे पति इंफोसिस नाम की एक नई कंपनी खोलने जा रहे हैं मैं उनका हाथ बटाऊंगी. इतना सुनकर जेआरडी टाटा ने उनको शुभकामनाएं देते हुए सलाह भी दी. जेआरडी टाटा ने कहा कि कोई भी शुरूआत दबे मन से मत करना. शुरूआत हमेशा फुल कॉन्फिडेंस से करना. तभी सफलता मिल पाएगी और हां जब तुम इस काबिल हो जाना तो समाज सेवा मत भूलना. क्योंकि समाज हमें बहुत कुछ देता है.

नारायण मूर्ति ने मांगी मदद
कुछ इस तरह इंफोसिस कंपनी की नींव रखी गई. एक इंटरव्यू के दौरान सुधा मूर्ति ने बताया था, “उन्होंने (एनआर नारायण मूर्ति) मुझे बताया कि मुझे आपकी कड़ी मेहनत के तीन साल की आवश्यकता है और मैं कमाई नहीं कर पाऊंगा, आपको परिवार का प्रबंधन करना होगा, और मुझे शुरुआती निवेश देना होगा. मैंने कहा ठीक है. जब आपके पास बहुत सी चीजें नहीं होती हैं, तो आप डरते नहीं हैं. मैंने अपने करियर में केवल तीन साल गंवाए, यह ठीक है.

800 रूपये में पूरी शादी
इन्फोसिस फाउंडेशन की चेयरपर्सन, एक लेखक और परोपकारी, सुधा ने 1978 में इन्फोसिस (Infosys) टेक्नोलॉजीज के संस्थापक एनआर नारायण मूर्ति से शादी की. उनकी शादी दोनों के परिवार के साथ एक सरल संबंध था. पूरी शादी की लागत 800 रुपये थी, जिसमें दोनों ने बराबर रकम ली.

नौकरी छोड़नी पड़ी थी सुधा मूर्ति को
1981 में, मूर्ति ने अपने बड़े सपने को साकार किया और यह इन्फोसिस के लिए शुरुआत थी, जो सॉफ्टवेयर परामर्श में सबसे बड़े नामों में से एक थी. नारायण मूर्ति ने कहा कि वो और सुधा दोनों एक साथ इंफोसिस में नहीं रह सकते. नारायण मूर्ति ने कहा कि ये तुम चुन सकती हो कि तुम इंफोसिस ज्वाइन करो या मैं. इस पर सुधा मूर्ति ने खुद वहां ज्वाइन नहीं किया.

इस पर सुधा मूर्ति ने कहा, “यह मेरे लिए बहुत कठिन था, यह एक आसान निर्णय नहीं था क्योंकि 1968 में मैं इंजीनियरिंग कॉलेज और 1972 में मैंने स्नातक किया था. जहां विश्वविद्यालय में एक भी लड़की नहीं थी. मेरे जैसा एक व्यक्ति जो करियर के प्रति जागरूक था और तकनीकी चीजों में इतना शौकीन था. यह बहुत कठिन था.

परिवार संभालने की जिम्मेदारी पहले
सुधा ने कहा, “मैंने सोचा कि अगर मैं अंदर हूँ, तो वह बाहर है, और जब आप एक कंपनी शुरू करते हैं, तो आपको इधर-उधर भागना पड़ता है, परिवार से दूर रहना पड़ता है, आपको जो कुछ करना होता है, और वहां आप कार्ड नहीं खेल सकते हैं, मैं एक महिला हूं और मैं परिवार से दूर नहीं हो सकती, मैं बच्चों से दूर नहीं हो सकती, यह व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है. दूसरी बात जिसने उन्हें इन्फोसिस लेने से रोका, वह उनके बच्चे थे, जिन्हें जीवन के शुरुआती चरण में अपनी माँ की आवश्यकता होती है. “इसलिए यह सोचकर कि मैंने ठीक कहा और मैंने निर्णय लिया, लेकिन मेरा दिल बहुत भारी था. मुझे यह कहते हुए सुलह करने में कई साल लग गए कि मैं टीम इंफोसिस का हिस्सा नहीं हूं.

चट्टान की तरह दृढ़ हो गईं सुधा
जैसा कि मूर्ति ने अपने सपनों को साकार करने के लिए सह-संस्थापकों (उनके बीच नंदन नीलकेणि) के साथ कड़ी मेहनत की, सुधा वह चट्टान बन गई जिसने उनके रिश्ते और मूर्ति की महत्वाकांक्षाओं को स्थिर रखा. उसने एक गृहिणी की भूमिका निभाई और अपने पति का समर्थन किया लेकिन कहीं न कहीं रेखा ने महसूस किया कि उसने अपने सुनहरे दिन खो दिए हैं.

38 साल पहले सात दोस्तों ने मिलकर बनाई थी इंफोसिस
इंफोसिस को आज से 38 साल पहले सात दोस्तों ने मिलकर बनाई थी. इसमें सबसे आगे थे नारायण मूर्ति. मूर्ति ने अपने छह दोस्तों नंदन नीलकणि, एनएस राघवन, एस गोपालकृष्णन, एसडी शिबूलाल, के अलावा के दिनेश और अशोक अरोड़ा के साथ मिलकर इंफोसिस की नींव रखी थी. ये सभी पटनी कंप्यूटर्स के कर्मचारी थे. पटनी कंप्यूटर्स से अलग होकर उन्होंने अपना खुद का फर्म बनाया था.

पत्नी से लिए उधार 
इंफोसिस (Infosys) की स्थापना 10 हजार रुपए के मामूली रकम से हुई थी. नारायण मूर्ति ने कंपनी का नाम रखा- इंफोसिस कंसलटेंट. पैसों की कमी हुई तो उन्होंने अपनी पत्नी सुधा मूर्ति से कुछ उधार लिए. नारायण मूर्ति के घर के सामने वाले रूम में कंपनी का दफ्तर बना. हालांकि कंपनी का आधिकारिक दफ्तर राघवन के पते पर था.

नारायणमूर्ति पहले कर्मचारी नहीं थे
इंफोसिस के शुरू करने के पीछे मुख्यतौर पर नारायणमूर्ति को माना जाता है. लेकिन वो कंपनी के पहले कर्मचारी नहीं हैं. पहले व्यक्ति एनएस राघवन हैं. नारायण मूर्ति कंपनी के चौथे कर्मचारी थे. उन्हें पटनी कंप्यूटर्स में अपना बचा हुआ काम पूरा करने में एक साल का वक्त लग गया. एक साल बाद उन्होंने इंफोसिस जॉइन किया. इंफोसिस के पास 1983 तक एक भी कंप्यूटर नहीं था. मूर्ति की आर्थिक हालत ऐसी नहीं थी कि वो कंप्यूटर का आयात करवाते. कंपनी को पहला कंप्यूटर हासिल करने में 2 साल का वक्त लग गया. शुरुआती वर्षों में कंपनी के सामने मुश्किलें भी आईं. इंफोसिस उस वक्त संकट में आ गया, जब कंपनी के एक संस्थापक सदस्य अशोक अरोड़ा ने कंपनी छोड़ दी.

उधार लेते थे पैसे
एक बार नारायणमूर्ति की पत्नी सुधा मूर्ति ने बताया कि इंफोसिस शुरू करते वक्त नारायण मूर्ति अक्सर उससे पैसे उधार लिया करते थे. सुधा उधार दिए पैसों का हिसाब रखती थीं और उसे एक डायरी में दर्ज करती थीं. नारायणमूर्ति ने सुधा को वो पैसे कभी नहीं लौटाए. जब दोनों की शादी हो गई तो सुधा मूर्ति ने उधार वाले पन्ने को अपनी डायरी से फाड़ दिया. सुधा मूर्ति ने बताया था कि नारायणमूर्ति ने करीब 4 हजार रुपए उधार लिए थे.

1993 में पहली  बार कंपनी को मिला IPO
1993 में पहली बार कंपनी आईपीओ लेकर आई. 14 जून 1993 को इंफोसिस देश की पहली आईटी कंपनी बनी जिसे शेयर बाजार ने लिस्ट किया. इंफोसिस जब आईपीओ लेकर आई तो इसका इश्यू प्राइस था 95 रुपए लेकिन शेयर बाजार में लिस्ट होने के दिन इसका शेयर 145 रुपए पर लिस्ट हुआ. कंपनी की साख इसी से पता चलती है. 1999 तक इंफोसिस की स्थिति काफी अच्छी हो चुकी थी. कंपनी का नेटवर्थ 100 मिलियन डॉलर पहुंच चुका था. इंफोसिस भारत की पहली आईटी कंपनी थी जिसे नैसडैक (NASDAQ) ने लिस्ट किया. इंफोसिस दुनिया की 20 बड़ी आईटी कंपनियों में से एक थी.