Baisakhi: खालसा की स्थापना और किसानों का पर्व, Lockdown के बीच ऐसे करें दान-पुण्य

सोमवार, 13 अप्रैल को सूर्य शाम 8:30 पर मेष राशि में संचार करेंगे. इसीलिए इस पर्व को मेष संक्रांति के नाम से भी जाना जाता है. इसी दिन से सौर नववर्ष का आरंभ होता है. बद्रीनाथ धाम की यात्रा भी इसी दिन से शुरू होती है. लॉकडाउन (Lockdown) के चलते इस बार यात्रा की तिथि को बदल दिया गया है.

बैसाखी के त्यौहार (Baisakhi festival) को किसानों का पर्व भी कहा जाता है जिसे पूरे भारत में काफी धूमधाम से मनाया जाता है. इस पर्व को मनाने का उद्देश्य है- प्रकृति को अच्छी फसल के लिए धन्यवाद देना. यही वजह है कि इस त्यौहार में सभी धर्मों के लोग शामिल होते हैं.

किसान इस त्यौहार को बेहद ही उल्लास के साथ मनाते हैं. कहते हैं कि पंजाब में जब रबी की फसल पककर तैयार हो जाती हैं तब यह पर्व मनाया जाता है. लोग इस दिन देवी की पूजा करते हैं. महिला और पुरुष ढोल-नगाड़ों की थाप पर नृत्य करते हैं और आनंद मनाते हैं.

यह पर्व अप्रैल महीने की 13 या 14 तिथि को मनाया जाता है. इस साल यह पर्व 13 अप्रैल को मनाया जा रहा है. इस दिन लोग अनाज की पूजा करते हैं और सभी के घरों को धन-धान्य से भरा रखने के लिए प्रकृति से प्रार्थना करते हैं.

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पर्व मनाने का क्या है कारण

सिख धर्म (Sikhism) के लोगों के लिए इस पर्व का विशेष महत्व है. इसी दिन 1699 में सिखों के दसवें और अंतिम गुरु, गुरु गोविंद सिंह ने खालसा पंथ (Khalsa Panth) की स्थापना की थी जो सैनिक संतों का विशिष्ट समूह था. कहा जाता है कि गुरु अर्जुन देव और गुरु तेग बहादुर (Guru Arjun Dev and Guru Tegh Bahadur) ने इस्लामिक धर्मांतरण से मना कर दिया था जिसके दिए उन्हें मुगल शासकों ने बहुत प्रताड़ित किया और मार डाला.

कौन कहलाते हैं खालसा

इस्लामिक युग में ही सिखों के उत्पीड़न ने खालसा की स्थापना को प्रेरित किया जिसे ‘अंतरात्मा और धर्म की स्वतंत्रता’ का पंथ कहा जाता है. ‘खालसा’ ऐसे पुरुष और महिलाओं को कहा जाता है जिन्होंने सिख दीक्षा समारोह में भाग लिया हो और जो सिख आचार संहिता और परंपराओं का सख्ती से पालन करते हैं.

इस दिन गुरुद्वारों में विशेष रौनक देखने को मिलती है. श्रद्धालु इस दिन घरों की सफाई करके आंगन में रंगोली या अल्पना बनाते हैं. घरों में तरह-तरह के पकवान बनाए जाते हैं और शाम को घरों में लाइटिंग की जाती है. गुरुद्वारों में गुरु ग्रंथ साहिब का पाठ -कीर्तन आदि होता है.

सोमवार, 13 अप्रैल को सूर्य शाम 8:30 पर मेष राशि में संचार करेंगे. इसीलिए इस पर्व को मेष संक्रांति (Sankranti) के नाम से भी जाना जाता है. इसी दिन से सौर नववर्ष का आरंभ होता है. बद्रीनाथ धाम की यात्रा भी इसी दिन से शुरू होती है, लेकिन इस बार लॉकडाउन (Lockdown) के चलते यात्रा की तिथि को बदल दिया गया है.

पांडवों से भी है संबंध

क्या आप जानते हैं कि सिख समुदाय से संबंधित इस त्योहार की उत्पत्ति का संबंध पांडवों से भी माना जाता है. पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब पांडव वनवास वनवास के दिनों में पंजाब के कटराज ताल के पास पहुंचते हैं, जहां एक सरोवर का जल पीने से युधिष्ठिर के चारों भाइयों की मृत्यु हो जाती है. तब एक यक्ष के सभी सवालों के सही जवाब देने पर युधिष्ठिर के चारों भाई फिर से जीवित हो जाते हैं. माना जाता है कि तभी से बैसाखी पर्व मनाया जाता है और आज भी पंजाब के इस स्थान पर विशाल मेले का आयोजन किया जाता है.

लॉकडाउन के बीच कैसे करें दान-पुण्य

बैसाखी के दिन गंगा-स्नान और दान-पुण्य का विशेष महत्व है. कहते हैं कि इस दिन दान करने से जातक को निरोगी काया, सुख समृद्धि और धन की प्राप्ति होती है. ज्योतिषियों के अनुसार, दान-पुण्य का शुभ मुहूर्त या पुण्यकाल दोपहर 1:00 बज गए 59 मिनट पर शुरू होगा और 14 अप्रैल के सूर्योदय तक रहेगा. इस साल कोरोना वायरस (Coronavirus) की वजह से लगे देशव्यापी लॉकडाउन के चलते जातकों को घर पर ही स्नान करना होगा. दान-पुण्य के लिए आपको आसपास जो भी जरूरतमंद मिले, उसे ही शुभ मुहूर्त में दान करके आप पुण्य कमा सकते हैं.

अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग नाम

वैशाखी शब्द विशाखा नक्षत्र (Visakha nakshatra) से लिया गया है. हिंदुओं की मान्यता है कि हजारों साल पहले इसी दिन गंगा नदी धरती पर उतरी थीं.

असम में इस दिन को बिहू पर्व के रूप में मनाया जाता है. यहां यह पर्व फसल काटकर मनाया जाता है.

बंगाल में यह पर्व पोइला बैसाख के नाम से मनाया जाता है. बंगालियों के नए साल की शुरुआत को पोइला बैसाख कहते हैं.

केरल में यह त्यौहार विशु नाम से मनाया जाता है.

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