भारत में आने वाला है विकास का सुनहरा दौर, जानिए क्या कहती है नई रिसर्च

केवल आबादी में संरचनात्मक बदलाव की वजह से ही विकास नहीं होता है. देश के विकास के लिए और भी कई मुद्दे बेहद ज़रूरी होते हैं.
India enters 37 year period of demographic dividend, भारत में आने वाला है विकास का सुनहरा दौर, जानिए क्या कहती है नई रिसर्च

साल 2018 के बाद से भारत में निर्भर आबादी (Dependent Population- 15 से 64 साल के उम्र के लोग) की तुलना में कामकाजी आबादी (Working-age Population- 14 साल से कम और 65 साल से अधिक ) काफी तेज़ी से बढ़ी है.

कामकाजी आबादी में हुई यह वृद्धि अगले 37 सालों तक यानी कि 2055 तक बनी रहेगी.

एशिया के कई संपन्न देश- जापान, चीन, दक्षिण कोरिया ने ‘जनसांख्यिकीय विभाजन’ का सही तरीके से इस्तेमाल किया.

युनाइटेड नेशन पॉपुलेशन फंड (UNFPA) द्वारा परिभाषित ‘जनसांख्यिकीय विभाजन’ के अनुसार एज स्ट्रक्चर (उम्र संरचना) में होने वाले बदलाव की वजह से विकास की संभावना बढ़ जाती है.

जीवन काल में स्थिरता बढ़ने की वजह से कुल प्रजनन दर (Total Fertility Rate- प्रति महिला जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या) में बढ़ोतरी हुई है जिस वजह से यह बड़ा बदलाव देखा जा रहा है.

जापान ऐसा पहला देश बना जिसने जनसंख्या संरचना में होने वाले बदलाव को देश के विकास के लिए इस्तेमाल किया.

जापान का जनसांख्यिकीय विभाजन फेस 1964 से 2004 तक रहा. पहले 10 सालों का विशलेषण करें तो पता चलता है कि कि जनसंख्या में होने वाले इस बदलाव ने कैसे देश को विकास के रास्ते पर अग्रसर किया.

पहले पांच सालों में जापान का विकास दहाई अंक में हुआ, वहीं अगले दो सालों में विकास दर 8 प्रतिशत से ज़्यादा रहा.

हालांकि एक साल विकास दर 6 प्रतिशत से थोड़ा कम रहा, जबकि अन्य दो सालों में विकास दर 5 प्रतिशत के क़रीब रहा.

चीन साल 1994 में इस अवस्था में पहुंचा. जबकि 16 साल पहले यानी कि 1978 में चीनी नेता डेंग जियाओपिंग ने आर्थिक सुधार की शुरुआत की थी. हालांकि चीन की अर्थव्यवस्था में यह तेज़ी आर्थिक सुधार के तुरंत बाद ही दिखने लगा था लेकिन जनसांख्यिकीय विभाजन के असर की वजह से यह तेज़ी लंबे समय तक बरकरार रही.

जनसांख्यिकीय विभाजन काल (1978 से 1994) के बीच 8 सालों तक चीन का विकास दर दहाई अंको में रहा.

वहीं 1994 के बाद के अगले 18 सालों में सिर्फ दो साल ही ऐसा रहे जब उनका विकास दर 8 प्रतिशत से आगे नहीं बढ़ पाया.

एशिया में हुए जनसांख्यिकीय विभाजन का मुल्यांकन करें तो चार में से दो देशों में विकास का पैटर्न एक जैसा था. (ताईबान को इस लिस्ट से बाहर रखा गया है क्योंकि उनके विकास दर का आंकड़ा मौजूद नहीं है.)

वहीं सिंगापुर में जनसांख्यिकीय विभाजन का साल 1979 में शुरू हुआ. आगे के 10 साल को देखें तो केवल दो साल ही ऐसे रहे जब उनका विकास दर 7 प्रतिशत से कम रहा. जबकि चार साल ऐसे भी थे जब उनका विकास दर दहाई अंक पर था.

वहीं दक्षिण कोरिया की बात करें तो उनका जनसांख्यिकीय विभाजन काल 1987 में शुरू हुआ. इस फ़ेस के शुरू होने के बाद के अगले दस सालों में सिर्फ दो बार ऐसा हुआ जब उनका विकास दर सात प्रतिशत के नीचे गया हो.

हांगकांग में विभाजन काल 1979 में शुरु हुआ. उसके बाद अगले दस सालों में सिर्फ दो बार ही ऐसा हुआ जब विकास दर आठ प्रतिशत से कम रहा हो.

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हालांकि यह जानना महत्वपूर्ण है कि केवल आबादी में संरचनात्मक बदलाव की वजह से ही विकास नहीं होता है. देश के विकास के लिए और भी कई मुद्दे बेहद ज़रूरी होते हैं.

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