बॉर्डर पर भारत के रोड कनेक्टिविटी प्रोजेक्‍ट की रफ्तार देखकर बेचैन हो रहा ड्रैगन

बॉर्डर पर रोड कनेक्टिविटी (Road Connectivity) के मामले में चीन (China) हमेशा आगे रहा है, लेकिन पिछले कुछ सालों से भारत (India) ने सामरिक महत्‍व की सड़कों के निर्माण में काफी तेजी से काम किया है, यही चीन को खटक रहा है.
India-China conflict, बॉर्डर पर भारत के रोड कनेक्टिविटी प्रोजेक्‍ट की रफ्तार देखकर बेचैन हो रहा ड्रैगन

चीन के साथ लगने वाली सीमा पर रोड कनेक्टिविटी भारत के लिए दशकों से बड़ी समस्‍या रही है. विषम भौगोलिक परिस्थिति और मौसम यहां सबसे बड़ी चुनौती है. हालांकि, चीन ने इन्‍हीं चुनौतियों से पार पाते हुए भारत से सटे अपने इलाकों में सड़कों का जाल बिछा रखा है, लेकिन भारत तेजी से ऐसा करने में सफल नहीं हो पाया है. भारत सरकार ने चीन की तरफ से बढ़ती चुनौतियों को देखते हुए पिछले कुछ सालों से ध्‍यान रोड कनेक्टिविटी की रफ्तार बढ़ाई है, जिससे चीन बेचैन हो उठा है.

बॉर्डर पर तेजी से बनाई जा रही हैं सड़कें

चीन से सटे बॉर्डर पर सामरिक महत्‍व वाली कुल 73 सड़कें आती हैं, जिनमें 12 पर CPWD काम कर रहा है और 61 पर बॉर्डर रोड ऑर्गनाइजेशन (BRO). BRO के तहत आने वाली रोड कुल 3,300 किलोमीटर की हैं. इसमें करीब 74 प्रतिशत यानी 2,400 किलोमीटर रोड पूरी तरह से तैयार हैं और सरफेस का काम भी हो गया है. हालांकि 3,281 किलोमीटर रोड आवाजाही लायक ही हैं.

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करीब दो प्रतिशत यानी 70 किलोमीटर सड़क का काम बचा है और बाकी का सारा काम 2022 तक पूरा कर लिया जाएगा. इसमें सबसे बड़ी उपलब्धि लद्दाख में दरबुक-शियोक (DS) से दौलत बेगओल्डी (DBO) तक 255 किलोमीटर का रोड है, जिसका काम 2019 में पूरा हो चुका है. यह लेह-काराकोरम हाई-वे का हिस्सा है. DS से DBO तक 37 ब्रिज हैं. एक ब्रिज -KM 130 है, जो काफी चैलेंजिग था.

इस रोड की सबसे बड़ी बात ये है की पहले दरबुक से DBO जाने में करीब 5-6 दिन लगते थे, लेकिन इस रोड के आ जाने से ये रास्ता कुछ घंटो का रह गया है. इस रोड को हाई वे की तरह बनाया गया है, जिसे आने वाले वक्त में और छोटे ट्रेक से भी जोड़ा जाएगा. इस रोड को पूरा होने में करीब 19 साल लगे हैं.

चीन और पाकिस्तान पर एक साथ बनी रहेगी नजर

दूसरी बड़ी वजह ये है की भारतीय वायु सेना ने 2013 में अपना ट्रांसपोर्टर एयरक्राफ्ट DBO में उतारा था और ऐसा करीब 45 साल बाद हो पाया, लेकिन इस रोड के आ जाने के बाद DBO न सिर्फ हवाई मार्ग से जुड़ गया है बल्कि अब ऑल वेदर रोड से भी जुड़ गया है इससे भारत की हवाई क्षमता को भी काफी मजबूती मिलेगी.

India-China conflict, बॉर्डर पर भारत के रोड कनेक्टिविटी प्रोजेक्‍ट की रफ्तार देखकर बेचैन हो रहा ड्रैगन

दरअसल DBO में भारत के मजबूत होने के कई स्ट्रैटजिक फायदे हैं. पहला यहां से अक्साई चीन महज 6-7 किलोमीटर दूर है. जो की LAC का इलाका है. वहीं यहां से सियाचीन भी महज 80 किलोमीटर दूर है. DBO पर पकड़ मज़बूत होने का मतलब है LAC और LOC दोनों पर चीन और पाकिस्तान पर नजर रखना और कम समय में करवाई करने के लिए तैयार भी रहना.

अब हर मौसम में तवांग से जोड़ेगी सेला टनल

तवांग सामरिक दृष्टि से सेला टनल भारत के लिए बेहद अहम है. चीन भी तवांग पर अपना दावा जताता रहा है. यहां की करीब 50 हजार की आबादी और भारतीय फौज के लिए देश के दूसरे हिस्से से रोड कनेक्टिविटी का एक मात्र रास्ता सेला पास है. सेला पास तवांग की लाइफ लाइन है और ठंड के मौसम में यह बंद होने पर तवांग और LAC पर तैनात लोग पूरी तरह दूसरे हिस्सों से कट जाते हैं. पास बंद हो जाता है और मौसम खराब होने की वजह से वहां तब हेलिकॉप्टर का इस्तेमाल भी नहीं किया जा सकता है.

अब यहां सेला टनल बनाने का काम शुरू हो गया है और यह काम 36 महीनों में पूरा कर लिया जाएगा. सेला टनल पूरी होने पर तवांग और फॉरवर्ड एरिया के लिए ऑल वेदर कनेक्टिविटी होगी. इसके साथ ही तेजपुर से तवांग तक का ट्रेवल टाइम भी करीब 1 घंटा कम हो जाएगा. तब 13 हजार 700 फीट की ऊंचाई पर सेला टॉप से नहीं गुजरना होगा. पीएम नरेंद्र मोदी ने इसी साल 9 फरवरी को इस प्रोजेक्ट की नींव रखी थी.

बनकर तैयार हो चुकी है रोहतांग टनल

रोहतांग टनल का काम भी 2019 के अंत तक पूरा हो गया है. यह टनल 10 हजार फीट की ऊंचाई पर है और 8.8 किलोमीटर की है. इतनी ऊंचाई पर यह दुनिया की सबसे लंबी टनल है. इसके ऊपर पहाड़ की लंबाई दो किलोमीटर की है. यह जिस टेक्नोलॉजी से बनाई जा रही है इसका इस्तेमाल चीन में भी हुआ है. इसके अलावा मनाली-लेह एक्सेस में भी तीन टनल बनाने की योजना है. तीनों टनल मिलकर 33 किलोमीटर की होंगी. ये टनल बारा लाचा ला, लाचुंग ला और तांगला ला में 15 हजार फीट की ऊंचाई में बनेंगी.

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