किसान को लागत नहीं मिलती, फिर भी राशन महंगा, समझें बिचौलियों का खेल

अगर आप 100 रुपये का आटा खरीदते हैं तो किसान (Farmer) को इसमें से सिर्फ 10 से 23 रुपये ही मिलता है. यानी हर 100 रुपये में 77 से 90 रुपये तक बिचौलिये खा जाते हैं. खेत से निकला सस्ता अन्न तैयार करने और बाजार तक पहुंचाने में उसकी कीमत 90 पर्सेंट तक बढ़ जाती है.

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कृषि कानून के खिलाफ जारी है किसानों का प्रदर्शन

देश में किसानों (Farmers) का नाम तो इज्जत से लिया जाता है. लेकिन किसान की इज्जत करने वाले लोग ही किसानों को बड़ी बेदर्दी से लूटते हैं. विडंबना ये है कि खेत से निकला अन्न (Grain) बहुत ही सस्ता रहता है. लेकिन ये जब रसोई (Kitchen) तक पहुंचता है तो बहुत ही महंगा हो चुका होता है. आखिर इसका खेल क्या है. आज हम इसका विस्तार से विश्लेशण करेंगे. दरअसल जबसे केंद्र सरकार संसद में किसान बिल लेकर आई. संसद में ये बिल कानून बना. तब से देश के एक बड़े हिस्से में आग लगी हुई है.

इस कानून का कई जगहों पर विरोध हो रहा है. नए कानून के विरोध में देश के किसान अपना ट्रैक्टर तक फूंक दे रहे हैं. लेकिन इसके साथ ही सवाल ये भी उठ रहा है कि क्या किसानों को लेकर नए कानून पर छाती पीटने वाले ये लोग वाकई किसान ही हैं. या फिर ये किसान की रोटी हड़प जाने वाले बिचौलिये और नेता हैं. देश के लिए अब ये बात समझनी बहुत जरूरी हो गई है.

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सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन करते किसान

अगर हमारे देश का किसान सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन कर रहा होता तो वो किसान बिल का विरोध करने वालों के खिलाफ खड़ा होता और कानून के समर्थन में खड़ा होता. लेकिन आज जो लोग प्रदर्शन के लिए सड़कों पर उतर रहे हैं. उन्होंने वाकई कभी किसानों के हित में सोचा होता तो किसान आज इतना फटेहाल नहीं होता.

आंकड़ों के हिसाब से समझें

अगर आप 100 रुपये का आटा खरीदते हैं तो किसान को इसमें से सिर्फ 10 से 23 रुपये ही मिलता है. यानी हर 100 रुपये में 77 से 90 रुपये तक बिचौलिये खा जाते हैं. खेत से निकला सस्ता अन्न तैयार करने और बाजार तक पहुंचाने में उसकी कीमत 90 परसेंट तक बढ़ जाती है. ये अंधेरगर्दी नहीं तो और क्या है. किसानों की लागत नहीं मिलती और उसी अन्न को खरीदने में उपभोक्ता का दम निकल जाता है.

यूरोप के किसानों से तुलना

यूरोप के बाकी देशों में उपभोक्ता अगर 100 रुपये का आटा खरीदते हैं तो उसमें से 64 रुपये से लेकर 81 रुपये तक किसान की जेब में जाते हैं. यानी 19 रुपये से लेकर 36 रुपये तक अनाज खेत से निकलकर किचन तक पहुंचने में खर्च होता है. जिसे हम बिचौलियों का मुनाफा कह सकते हैं.

ये ही फर्क भारत के किसानों को पीछे धकेल रहा है. अगर आप भारत के किसी गांव में रहते हैं. या फिर किसी गांव से जुड़े हैं. तो आप अच्छी तरह समझ सकते हैं कि पिछले तीन दशक में गांवों में कितना फर्क आया है. किसान लगातार गरीब होते जा रहे हैं और उन्हीं की फसल बेचकर बिचौलिए अपने महल खड़े करते जा रहे हैं.

किसान के परिवार का हाल

ना तो किसान के बच्चों को अच्छी शिक्षा मिल पाती है, ना मेडिकल सुविधा. हर किसान खेती छोड़ने के लिए तैयार बैठा है. आंकड़ों के आधार पर दलील दी जा सकती है कि आज गांव में कोई भूखा तो नहीं सोता लेकिन ये हकीकत नहीं हो सकती.

किसानों के हालात से जुड़ा खौफनाक सच ये है कि दो साल पहले जारी आंकड़ों के मुताबिक भारत में किसानों का एक परिवार हर महीने सिर्फ 8,931 रुपये कमाता है. यानी पूरा परिवार हर रोज ज्यादा से ज्यादा 300 रुपये में काम चलाता है. पूरा परिवार काम करता है. लेकिन पांच सदस्यों के हिसाब से 176 रुपये का न्यूनतम मजदूरी भी नहीं पाता है. जबकि भारत में प्रति परिवार महीने की आमदनी 55 हजार रुपये है.


खून-पसीने की मेहनत को चंद लोगों की तिजोरी भरने का जरिया!

देश को ये समझना होगा कि जिस भारत में दुनिया की 18 परसेंट आबादी है. लेकिन धरती का सिर्फ 2.4 परसेंट जमीन है और सिर्फ 4 परसेंट पानी. उस देश की 58 परसेंट अवाम. देश की जीडीपी में अगर 16.5 परसेंट हिस्सा रखती है. तो इसके पीछे किसान का खून पसीना होता है.

इस खून पसीने की मेहनत को चंद लोगों की तिजोरी भरने का जरिया बनाकर नहीं रखा जा सकता. अगर किसान कानून में बदलाव की जरूरत हुई तो बदलाव करना होगा. किसान को भरोसे में लेना पड़े तो भरोसे में लेना होगा. लेकिन उस दुष्चक्र को तोड़ना होगा. जो अन्न को खाए जा रहा है. देश को खाए जा रहा है. देश के किसान को खाए जा रहा है.

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