‘संजयजी क्या आप ही अपनी मां के पेट से पैदा हुए हैं, हम खंभे में से निकले हैं क्या?’

नयी दिल्ली
1979 में जनता पार्टी की टूट के लिए अगर किसी एक आदमी को सबसे अधिक जिम्मेदार माना गया तो वो राजनारायण थे. मोरारजी की कुर्सी चटकाने, सरकार गिराने और चरण सिंह को पीएम बनवाने में राजनारायण की भूमिका सबसे अहम थी. प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंकने वाले अक्खड़ और फक्कड़ किस्म के नेता राजनारायण के कई किस्से मशहूर हैं.

एक किस्सा संजय गांधी से उनकी ‘रहस्यमय मुलाकात’ का है…
राजनारायण पर आरोप लगा था कि जनता पार्टी को तोड़ने के लिए उन्होंने संजय गांधी और उस जमाने के मशहूर शराब कारोबारी कपिल मोहन के साथ मिलकर साजिश रची थी. कपिल मोहन के राजेंद्र नगर वाले घर पर हुई इस मुलाकात के बाद ही ‘बड़े खेल’ की रूपरेखा तय हुई ..वरुण सेनगुप्त की एक किताब ‘लास्ट डेज ऑफ मोरारजी राज’ में भी इस बात का विस्तार से जिक्र किया गया था. कुछ नेताओं और पत्रकारों का यही मानना था कि राजनारायण के बागी तेवर के पीछे संजय गांधी से उनकी ‘रहस्यमय मुलाकातें’ थी. लेकिन हकीकत क्या थी ? इसके कई वर्जन हैं.

एक वर्जन तो खुद राजनारायण का है. कुछ लोग कहते हैं कि संजय गांधी से कमलनाथ और कपिल मोहन के जरिए राजनारायण मिले थे और उन्हें मोरारजी को बेदखल करके चरण सिंह की ताजपोशी के लिए तैयार किया, जनता सरकार में उनके खिलाफ ठोके गए मुकदमे वापस लेने का भरोसा भी दिया गया था, जबकि राजनारायण का दावा कुछ और था.

हम आपकी जीभ पकड़कर दो झापड़ मारते
जनता पार्टी की टूट, चरण सिंह की ताजपोशी और फिर चंद दिनों में उनकी विदाई के बाद ‘रविवार’ के लिए उदयन शर्मा ने राजनारायण से दिलचस्प बात की थी, जो 1980 में छपी थी. उसी इंटरव्यू में संजय गांधी की बात करते-करते राजनारायण ने बताया था कि एक बार संजय की बातों से चिढ़कर उन्हें यहां तक कह दिया था कि‘ संजय जी, राजनारायण पर झूठ बोलने का आरोप कम से कम आज तक नहीं लगा और आप कहते हैं कि मैं झूठा हूं. अगर आप कहीं बाहर यह बात कहते तो हम आपकी जीभ पकड़कर दो झापड़ मारते‘. अब आगे पढ़िए उस इंटरव्यू का दिलचस्प हिस्सा.

उदयन शर्मा ने जब राजनारायण से संजय गांधी की उस ‘रहस्यमय मुलाकात’ के बारे में पूछा तो उनका जवाब था – इस आरोप में जरा भी सच्चाई नहीं है. मैं पटना से लौटा था. इसके पहले संजय की शक्ल मैंने कभी देखी नहीं थी. मेरा वायुयान चार-पांच घंटे लेट था. मैं यहां करीब दस बजे पहुंचा. कपड़े बदलकर सोचा कि खाना खा लें. खाना खाने बैठा तो देखा कि दरवाजे पर एक दुबला सा लड़का खड़ा है.

मैंने पूछा-‘आप कौन हैं ?’
वह बोला-‘मैं संजय हूं ‘
मैंने कहा-‘कौन संजय ?’
वह बोला-‘मैं इंदिरा जी का बेटा हूं ‘
मैंने कहा-‘आइए बैठिए , मैं खाना खा रहा हूं . आपके लिए कुछ मंगाऊं ?’
उसने कहा-‘खाकर आया हूं ‘
तब मैंने कहा- ‘कुछ चाय -कॉफी चलेगी ?’
उसने कहा- ‘नहीं यह भी नहीं’ 

फिर मैंने पूछा कि आप यहां आए कैसे? क्या आपने टेलीफोन किया था? उसने कहा – ‘नहीं वैसे ही चले आए. मैं केवल इसलिए आया कि मैं आपको कांग्रेच्युलेट कर दूं. जो काम हमने ग्यारह साल में नहीं किया वो आपने छह महीने में कर दिया. इसके लिए आपको धन्यवाद देता हूं.‘ मैंने कहा – ‘ठीक है , इसके लिए आपको धन्यवाद. कम से कम आपका विवेक तो जगा.‘ इसके बाद वह चला गया. बस इतनी बात हुई.

आपकी सरकार बहुत ज्यादती कर रही है
दूसरी घटना यह है कि कपिल मोहन के यहां कोई संस्कार था. उसमें मैं आमंत्रित था. मैं उनका पारिवारिक मित्र हूं. उनके पिता नरेंद्र मोहन जीवित थे, तभी से. इस समारोह में संजय गांधी भी आमंत्रित थे. जब मैं वहां पहुंचा तो संजय गांधी कुर्सी पर बैठे थे. मैं पलंग पर बैठ गया. दो एक आदमी और बैठ गए. बातचीत शुरू हो गई. संजय गांधी ने कहा कि‘आपकी सरकार मेरे साथ बहुत ज्यादती कर रही है.‘ मैंने पूछा -‘ क्या माने ? ‘ तब संजय ने कहा- ‘पहली बात तो ये कि चौधरी चरण सिंह प्रधानमंत्री बनने के बाद यशवंत राव चव्हाण आदि से भी मिले लेकिन हमारी मां से नहीं मिले.’

मैंने कहा – ‘भाई ये शिकायत आप चौधरी साहब से करिए क्योंकि मैंने ऐसा कोई वादा नहीं किया था. ‘ शायद इंदिरा जी को ऐसा आभास हो गया था कि चौधरी साहब आएंगे तो वे माला वगैरह लेकर अपने घर पर इंतजार करती रहीं. पर चौधरी साहब गए नहीं. इस पर उनको काफी रंज हुआ. मैंने और श्यामनंदन मिश्र ने सोचा था कि हर उस पार्टी के नेता को धन्यवाद दे दें, जिसके सहयोग से सरकार बनी. हम दोनों सबके यहां गए. पंडित कमलापति त्रिपाठी के यहां गए, जो राज्यसभा में इनके नेता थे. स्टीफेन के यहां गए, जो लोकसभा में इनके नेता थे. यह सब मैंने संजय गांधी को साफ कर दिया .
संजय गांधी ने कहा – ‘ मुझे रोज सुबह उठकर गुड़गांव जाना पड़ता है. हमारे ऊपर अभी तक पुराने मुकदमे चल रहे हैं. अब तक हमारे मुकदमे वापस नहीं हुए.’

तब मैंने कहा- संजय जी, राजनीति में आप बहुत दिनों से नहीं हैं. हमने अभी तक अठावन बार जेल काटी है, कांग्रेस राज में. झूठे मुकदमे चले. मजिस्ट्रेट सजा देते थे, हाईकोर्ट में मैं छूट जाता था. क्या आप ही अपनी मां के पेट से पैदा हुए हैं. हम खंभे में से निकले हैं क्या? अगर आपको गुड़गांव जाना पड़ता और आपके ऊपर मुकदमा है तो जाइए. इसमें परेशानी की क्या बात है ? आप तो साधन संपन्न हैं. हमारे पास तो साधन भी नहीं थे.’

संजय का जवाब था- ‘नहीं हमें तो वादा किया गया था कि मुकदमे हटा लिए जाएंगे.’

मैंने कहा- ‘भाई किसने आपसे वादा किया था? मैंने तो आपसे कोई वादा नहीं किया था . अगर आप पढ़े हैं तो आप कांग्रेस आई के संसदीय बोर्ड के फैसले को देखिए. बोर्ड ने कहा कि हम चौधरी चरण सिंह की सरकार को बिना शर्त समर्थन देते हैं. उसमें तो शर्त की कोई बात नहीं है. हमें यह सूचना स्वयं बीपी मौर्या ने दी थी. फिर किसी वचन लेने-देने की बात ही नहीं रह गई थी. आप जो भी कह रहे हैं, वह बिल्कुल असत्य है. अगर आपको परेशान किया जा रहा है तो मैं आपसे इतना कह सकता हूं कि इसे दूर करने की कोशिश मैं अवश्य करूंगा. जहां तक मुकदमों का प्रश्न है, ‘लॉ विल टेक इट्स ऑन कोर्स ‘.

मैंने तो लोकसभा में भी इंदिरा जी से कह दिया था कि अगर वे अपनी गलती कबूल कर लें तो उनको सदन से निष्कासित करने का प्रस्ताव लाने की कोई आवश्यकता नहीं है. यह भी कहा था कि मैं मोरारजी भाई से अनुरोध करूंगा कि वे निष्कासन का का प्रस्ताव वापस लें लेकिन इंदिरा जी ने यह नहीं किया, इसलिए सदन से उनका निष्कासन हो गया.’

इस पर संजय बोले – ‘मुझको कहना पड़ेगा कि आप झूठ बोलते हैं.

हमने कहा – ‘देखिए संजय जी, पता नहीं आप मुझसे क्यों उलझ रहे हैं. झूठ बोलने का आरोप मुझ पर आज तक किसी ने नहीं लगाया. उत्तर प्रदेश विधानसभा की कार्यवाही में दर्ज है कि जब बाबू संपूर्णानंद मुख्यमंत्री थे और बाबू त्रिलोकी सिंह विरोधी दल के नेता थे, तब एक सवाल आने पर बाबू संपूर्णानंद ने कहा – ‘देखिए बाबू त्रिलोकी सिंह , मैंने एक बात पाई कि राजनारायण ने जो बात मुझसे अकेले में कही, वही बात उन्होंने सदन में कही, वही उन्होंने पब्लिकली कही. आप अपनी बात बदलते रहते हैं.’ इस पर त्रिलोकी बाबू ने कहा कि श्रीमान, आपका मतलब क्या है ? क्या मैं झूठा हूं? तब संपूर्णानंद जी ने कहा कि मैं कुछ नहीं कहता, जो मुझे कहना था वो कह दिया. तो संजय जी, राजनारायण पर झूठ बोलने का आरोप कम से कम आज तक तो नहीं लगा और आप कहते हैं कि मैं झूठा हूं. अगर आप कहीं बाहर यह बात कहते तो हम आपकी जीभ पकड़कर दो झापड़ मारते.

(राजनारायण और उदयन शर्मा की ये दिलचस्प बातचीत उनकी किताब ‘जनता पार्टी कैसे टूटी ‘ में छपी है. उदयन शर्मा फाउंडेशन की तरफ से प्रकाशित इस किताब का संपादन वरिष्ठ पत्रकार कुरबान अली ने किया है.)

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