जब लाल बहादुर शास्त्री ने काली कर दी होटल की छत, पढ़ें 6 दिलचस्प किस्से

एक छिटपुट सी रेल दुर्घटना के बाद शास्त्री ने रेल मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था. उनका कहना था कि क्योंकि रेल उनके अधीन था, इसलिए किसी भी गलती के लिए वे अपने को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार मानते थे.

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नयी दिल्ली
लाल बहादुर शास्त्री चाहे नेहरू मंत्रिमंडल में मंत्री रहे हों या फिर देश के प्रधानमंत्री, उनकी सादगी हमेशा कायम रही. पहनने, रहने से लेकर खाने -पीने तक में शास्त्री जी सादगी पसंद थे. उनके सूचना अधिकारी के तौर पर लंबे वक्त तक उनके साथ रहे कुलदीप नैयर ने अपनी किताब ‘एक जिंदगी काफी नहीं‘ में शास्त्री जी की सादगी के बारे में काफी कुछ लिखा है. कुलदीप नैयर की किताब से कुछ जानकारियां उन्हीं के शब्दों में.

1. बिजली का खर्च बचाते थे शास्त्री जी
कामराज योजना के तहत शास्त्री जी उन दिनों नेहरू मंत्रिमंडल से बाहर हो गए थे. मैं हमेशा की तरह शाम को उनके बंगले में गया. उनके बंगले में अंधेरा छाया हुआ था. सिर्फ ड्राइंग रूम की लाइट जल रही थी. मुझे लगा कि शायद वे घर पर नहीं थे क्योंकि उनका इकलौता गार्ड भी दिखाई नहीं दे रहा था. फिर पता चला कि शास्त्री जी घर पर ही थे. ड्राइंग रूम में अकेले बैठे अखबार पढ़ रहे थे. मैंने पूछा कि बाहर रोशनी क्यों नहीं थी. उन्होंने कहा कि अब बिजली का बिल उन्हें खुद देना पड़ेगा और वे ज्याद खर्च नहीं उठा सकते. शास्त्री जी के घर में किसी मिलने-जुलने वाले को न देखकर साफ पता चलता था कि वे सत्ता में नहीं थे.

2. महंगा होने की वजह से आलू खाना छोड़ा
शास्त्री जी जब सरकार से बाहर थे तो उन्होंने अपने भोजन को एक सब्जी तक सीमित कर दिया था और अपनी मनपसंद सब्जी आलू खाना छोड़ दिया था क्योंकि आलू उन दिनों काफी महंगा था. गरीबी ने उन्हें विनयशील बना दिया था और लोगों को उनमें यह बड़ी प्यारी खूबी दिखती थी. अहंकार और दंभ से भरे राजनीतिज्ञों की भीड़ में उनकी विनम्रता हर किसी को प्रभावित करती थी.

3. गन्ने का जूस पिया और पैसे दिए
अन्य नेताओं की तुलना में शास्त्री जी कितने सीधे सादे व्यक्ति थे, इसका अंदाजा मेरी आंखों के सामने घटी छोटी सी घटना से लगाया जा सकता है. वे तब गृह मंत्री थे और हम कुतुब में एक कार्यक्रम के बाद कार से वापस लौट रहे थे. हमेशा की तरह एक सुरक्षा गार्ड एम्बेसेडर कार की अगली सीट पर बैठा हुआ था . उन दिनों नेहरू समेत सभी मंत्री एम्बेसेडर से ही चला करते थे. हम जब उस जगह पहुंचे, जहां आज AIIMS है तो रेलवे फाटक बंद होने के कारण हमारी कार को रुकना पड़ा. शास्त्री जी ने देखा कि कुछ ही दूरी पर गन्ने के रस की एक दुकान थी. उन्होंने कहा -क्यों न फाटक खुलने तक गन्ने के रस का एक-एक गिलास पी लिया जाए? इससे पहले कि कोई कुछ कह पाता शास्त्री जी कार से नीचे उतर गए और पीछे-पीछे मैं भी उतर गया. हम दोनों ने गन्ने का एक-एक गिलास रस पीया. शास्त्री जी ने पैसे चुका दिए. हैरानी की बात ये थी कि किसी ने भी हमें नहीं पहचाना. दुकान वाले ने भी नहीं. उसे क्या पता था कि देश का गृहमंत्री और भविष्य का प्रधानमंत्री खुद कार से उतरकर उसका गन्ने का रस पीने आया है और पैसे भी खुद उसी ने चुकाए हैं.

4. जब बेटे को घर छोड़कर जाने को कहा
शास्त्री जी अपने बारे में बहुत कम बात करते थे. बड़ी मुश्किल से मैं उनसे जान सका कि एक छिटपुट सी रेल दुर्घटना के बाद उन्होंने रेल मंत्री से इस्तीफा क्यों दे दिया था. उन्होंने कहा था कि क्योंकि रेल उनके अधीन था, इसलिए किसी भी गलती के लिए वे अपने को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार मानते थे. एक बार जब मैंने उनसे कहा कि उनके बड़े बेटे हरि के किसी व्यापारिक संपर्क के बारे में शिकायतें सुनने में आ रही थीं तो उन्होंने दो टूक जवाब दिया था कि हरि को घर छोड़कर जाना होगा. इस बात को लेकर शास्त्री की पत्नी बहुत बिगड़ गईं थीं और उन्होंने मुझ तक संदेशा भिजवाया था कि मुझे उनके घरेलू मामले में टांग नहीं अड़ानी चाहिए. मुझे पता था कि हरि को घर छोड़ने के लिए कहा गया था हालांकि कुछ हफ्तों बाद आ गए थे. शायद वो शास्त्री जी को विश्वास दिलाने में सफल रहे थे कि उनके खिलाफ शिकायतें निराधार थी.

5. खर्च चलाने के लिए लिखने लगे कॉलम
संसद सदस्य की बहुत मामूली तनख्वाह होने के कारण शास्त्री जी का बड़ी मुश्किल से गुजारा हो रहा था. मैंने उन्हें अखबारों के लिए लिखने की सलाह दी . उनका पहला लेख नेहरू पर था. मैंने उनके लिए सिंडिकेट सेल की व्यवस्था कर दी, जैसा कि मैंने पैंतीस साल बाद अपने लिए किया था. उनका लेख दक्षिण में हिन्दू में, पूर्व में आनंद बाजार पत्रिका में, उत्तर में हिन्दुस्तान टाइम्स में और पश्चिम में टाइम्स ऑफ इंडिया में छपा. हर अखबार ने उन्हें पांच सौ रुपए दिए. दो हजार की अतिरिक्त आमदनी से उन्हें काफी फर्क पड़ा. उनका दूसरा लेख उनके हीरो लाला लाजपत राय पर था. इससे पहले कि तीसरा लेख लिख पाते नेहरू को भुवनेश्वर में दिल का दौरा पड़ा और शास्त्री को कैबिनेट में बुला लिया गया. मैं भी उनके सूचना अधिकारी के रूप में लौट आया.

6. होटल में बना रहे थे अपना खाना
शास्त्री की सादगी उनकी सबसे बड़ी खूबी थी. एक बार केयरो के गुटनिरपेक्ष सम्मेलन में प्रधानमंत्री शास्त्री के साथ मैं भी गया हुआ था. मैंने शास्त्री को होटल के कमरे में खुद ही अपना खाना पकाते देखा था. मैंने एक डिस्पैच में इसका जिक्र किया तो हिल्टन होटल वालों ने हंगामा खड़ा कर दिया और कमरे की दीवारें और छत काली करने के लिए शास्त्री पर मुकदमा ठोकने की धमकी दे डाली.

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