ममता के बेलगाम गुंडों से उथलपुथल बंगाल, क्या लौटा बिहार सा जंगलराज?

एक वक्त था जब बिहार की चुनावी हिंसा सबसे ज़्यादा कुख्यात थी लेकिन अब सबकी नज़रें बंगाल की ओर लगी हैं. बंगाल में टीएमसी के बेकाबू कार्यकर्ता अपने प्रतिद्वंद्वियों के साथ-साथ अब सुरक्षाबलों से भी भिड़ने लगे हैं.

देश लोकसभा चुनाव के चौथे चरण की वोटिंग में जुटा है. बीजेपी-कांग्रेस के लिए 9 राज्यों की 72 सीटों पर तो चुनौती है ही, साथ में स्थानीय दलों के लिए भी मोर्चा मार लेने का मौका है.

यूपी में गठबंधन, ओडीशा में बीजू जनता दल और बंगाल में ममता बनर्जी की टीएमसी चुनाव में ज़ोरशोर से उतरी है. इन सबमें खास नज़र टीएमसी पर लगी हुई है जिसके कार्यकर्ताओं की सुबह-सवेरे आसनसोल में सुरक्षाकर्मियों से हिंसक झड़प हो गई. सुरक्षाबलों ने बेकाबू कार्यकर्ताओं पर लाठियां भांज डालीं और फिर कोशिश चलती रही कि मतदान शांतिपूर्वक निबट जाए. हिंसा पर उतारू गुंडों ने पत्रकारों भी नहीं बख्शा.

इस बीच टीएमसी वालों का गुस्सा बीजेपी सांसद और केंद्रीय मंत्री बाबुल सुप्रियो पर भी उतरा. उनकी गाड़ी में तोड़फोड़ की गई. बता दें कि  बाबुल एक बार फिर आसनसोल में बीजेपी प्रत्याशी हैं जबकि मुनमुन सेन को टीएमसी ने टिकट थमाया है. बीजेपी नेता आसनसोल की झड़प से इस कदर नाराज़ हुए कि चुनाव आयोग में शिकायत का मन बना लिया. दोपहर होते-होते बीरभूम में भी टीएमसी और बीजेपी के लोग भिड़ गए. वैसे ये पहली बार नहीं जब टीएमसी कार्यकर्ताओं और बाबुल सुप्रियो के बीच टकराव हुआ हो, या बंगाल में मतदान के दौरान हिंसक झड़प हुई हो. बाबुल सुप्रियो पर तो पहले भी कई बार टीएमसी के बेलगाम गुंडों ने हमला बोला था.  पिछले साल जनवरी में रोज वैली चिटफंड घोटाले में टीएमसी सांसद की गिरफ्तारी के बाद तो टीएमसी समर्थकों ने बाबुल सुप्रियो के घर पर ही धावा बोल दिया था जहां उनके माता-पिता रह रहे थे.

इन्हीं सब हालात और दो चरणों के चुनाव की स्थिति देखकर बंगाल में चुनाव के लिए तय किए गए विशेष पर्यवेक्षक अजय वी नायक ने बंगाल की स्थिति की तुलना दस से पंद्रह साल पहले के बिहार से कर दी . उनके इस बयान पर ममता बनर्जी खूब बिफरीं और चुनाव आयोग से उनको हटाने की मांग कर डाली.

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क्यों याद आया बिहार?
दरअसल नायक ने जिस बिहार को बंगाल के परिप्रेक्ष्य में याद किया वो कभी चुनाव के दौरान सबसे अराजक सूबा बन जाने के लिए कुख्यात था. बिहार में चुनाव कराना चुनाव आयोग की सबसे बड़ी चुनौती बन जाता था. दंबगई, बूथ लूट और गरीब-कमज़ोर लोगों के खिलाफ हिंसा आम थी. ज़मींदारों के पंजे में कैद गरीब तबके के लोग उसी के पसंदीदा उम्मीदवार को वोट डाल आते थे. इस काम में लालच और डर दोनों का इस्तेमाल होता था.

ज़मींदारों का दौर बीता तो उनकी जगह ऊंची जाति के दबंगों और पैसेवालों ने ले ली. चुनाव में प्रभाव डालकर प्रत्याशी जिताना और हराना जैसे किसी पेशे में तब्दील हो गया. राजनीति में अपराधीकरण तेज़ी से बढ़ रहा था. जातीय हिंसा ने बिहार में कानून व्यवस्था की हालत और खराब कर डाली. आम लोग तो जहां तक हो सके खुद को चुनावी प्रक्रिया से बचाकर ही रखने लगे.

आंकड़ों के मुताबिक बात करें तो 1971 लोकसभा चुनाव में देश भर के 63 बूथ पर शिकायतों के बाद फिर मतदान हुआ जिसमें 53 बूथ बिहार के थे. 1984 में 264 बूथ पर फिर मतदान का आदेश हुआ, जिसमें 159 बिहार से थे. 2001 के बिहार पंचायत चुनाव में सौ से भी ज़्यादा लोग मारे गए.

बिहार में वोटिंग के दौरान बूथों पर केंद्रीय बलों की तैनाती ज़रूरी हो जाती थी. इस बीच 12 दिसंबर 1990 को टीएन शेषन मुख्य चुनाव आयुक्त बने और उनके कमान संभालते ही हालात में तब्दीली आनी शुरू हो गई. सरकार की पिछलग्गू माने जानेवाली संस्था को ताकतवर बनाने में शेषन ऐसे जुटे कि कई नेताओं पर उन्होंने ज़बरदस्त कार्यवाही की.

पश्चिम बंगाल से क्यों तुलना?
पश्चिम बंगाल में वैसे तो राजनीतिक हिंसा का पुराना इतिहास है लेकिन साल 2004 के बाद तीसरी बार बंगाल में विशेष चुनाव पर्यवेक्षक की तैनाती हुई है. वर्तमान लोकसभा चुनाव में बंगाल के शुरूआती दो चरणों में किसी की मौत नहीं हुई थी लेकिन तीसरे चरण में मुर्शिदाबाद से एक हत्या की खबर आ ही गई. जंगीपुर, मुर्शिदाबाद, मालदा में बमबाजी और गोलीबारी हुई. राज्य के बाकी हिस्सों में भी छिटपुट हिंसा, राजनीतिक कार्यकर्ताओं के आपसी संघर्ष और वोटर को डराने-धमकाने की बातें खुलकर सामने आई. इसके बाद सो रहा चुनाव आयोग नींद से जागा. ये सब कुछ तब हुआ जब सुरक्षाबल मुस्तैदी से जुटे थे. शुरूआती चरणों के अनुभव के बाद नायक ने वो विवादित बयान दिया जिस पर ममता बनर्जी को गुस्सा आया. चुनाव आयोग ने फिलहाल बंगाल में सुरक्षा व्यवस्था और मज़बूत कर दी है. अब हालात ये हैं कि सुरक्षाबलों की किसी राज्य में चुनाव के दौरान तैनाती का  रिकॉर्ड बन चुका है.

बंगाल पिछले साल हुए पंचायत चुनाव में भी बूथ लूट और ईवीएम लूट की वारदातें देख चुका है. तब एक दर्जन मौत भी हुईं और लोग भी घायल हुए. हालात इतने खराब थे कि सुप्रीम कोर्ट तक को टिप्पणी करनी पड़ गई. अब तो पूरा देश ही फिक्र में है और सवाल पूछ रहा है कि क्या बिहार में चुनावी हिंसा के जिस दौर ने सबको डरा दिया था वो बंगाल में दोहराया जा रहा है?