क्या देश में अपराधों के लिए आज कल दिखाया जाने वाला कंटेंट जिम्मेदार..? लगाई जाए OTT प्लेटफॉर्म पर सेंसरशिप!

सिंगापुर और ब्रिटेन में स्वतंत्र कंटेंट रेगुलेटरी संस्थाएं हैं जो ओटीटी कंटेंट पर भी नजर रखती हैं. ब्रिटेन में तो ओटीटी प्लेटफॉर्म्स को भी उन्हीं नियमों पर तोला जाता है जो पब्लिक सर्विस ब्रॉडकास्टर्स के लिए हैं. ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया में भी ओटीटी कंटेंट के लिए सख्त कानून बने हुए हैं.

आए दिन टीवी पर, इंटरनेट पर, अखबारों में देखने या सुनने को मिलता है कि समाज में अपराध बहुत बढ़ गए हैं. खासतौर पर महिलाओं के साथ होने वाले अपराध. हालांकि इन अपराधों की कई वजह हो सकती हैं, लेकिन, शहर छोटे हों या बड़े, या फिर गांव, दो बातों को अपराध के लिए सबसे बड़ी वजह बताया जाता है. एक तो गरीबी और दूसरा संचार माध्यमों पर आज कल दिखने वाला कंटेंट.

संचार माध्यमों में भी पहले सबसे ज्यादा दोष फिल्मों को दिया जाता था, लेकिन अब सबसे ज्यादा उंगली उठती है इंटरनेट पर सब्सक्रिप्शन के माध्यम से आसानी से उपलब्ध ओटीटी कंटेंट पर. यह ओटीटी कंटेंट क्या है, यह भी आपको बताते चलें. नेटफ्लिक्स, डिज़नी प्लस हॉटस्टार, वूट, जी 5, अमेजन प्राइम वीडियो, जिओ सिनेमा, ऑल्ट बालाजी, ईरोस नाउ, हंगामा, शेमारू आदि आदि. ये सब ओटीटी प्लेटफॉर्म्स हैं जहां आप मेंबरशिप ले कर मन चाहा कंटेंट देख सकते हैं.

इन ब्रैंड्स को ओटीटी यानी ओवर द टॉप इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह सब अपना कंटेंट दर्शकों तक बिना केबल, सैटेलाइट या ब्रॉडकास्ट सिग्नल्स के, या उनको बायपास कर के, इंटरनेट के माध्यम से पहुंचाते हैं. आज हम चर्चा करेंगे कि क्या ओटीटी प्लेटफॉर्म्स के कंटेंट को नियंत्रित करने की जरूरत है. ताकि बच्चों और युवाओं को, जिनकी सोच कच्ची या अपरिपक्व होती है, उन्हें वही दिखाया जाए जो उनके लिए उपयुक्त है, जिसकी उन्हें जरूरत है.

एक जमाना था जब दूरदर्शन के कंटेंट को उबाऊ या बोरिंग माना जाता था, क्योंकि वह बड़ी कड़ाई से नियंत्रित था. इस बात के सख्त कायदे और नियम थे कि क्या दिखा सकते हैं और क्या नहीं, लेकिन, तब भी दूदर्शन के फैंस थे, जो उसके कंटेंट की क्वालिटी और विविधता के कायल थे, और अब भी हैं. लेकिन कंटेंट का सीन यानि परिदृष्य पिछले 20 सालों में बड़ी तेजी से बदला है.

ओटीटी प्लेटफॉर्म्स की कमाई अब 35 अरब के पार

पहले टीवी चैनल्स के कंटेंट में जनता में बढ़ती मांग के चलते बदलाव हुए और फिर पिछले सात आठ सालों में ओटीटी प्लेटफॉर्म्स ने ऐसी धूम मचाई कि कंटेंट प्लेटफॉर्म के रूप में टीवी को अपना भविष्य खतरे में लगने लगा. यूं समझिए कि साल 2018 में भारत में ओटीटी प्लेटफॉर्म्स की कमाई करीब 21.5 अरब रुपए थी, जो 2019 में बढ़ कर 35 अरब रुपए को पार कर गई.

तो, जहां एक बिजनेस के रूप में ओटीटी धूम मचा रहे हैं और दर्शक मुग्ध हैं, वहीं इन पर दिखने वाले कंटेंट को लेकर कई चिंताएं व्यक्त की जा रही हैं. शिकायतें कंटेंट में गंदी गालियों, नग्नता यानि न्यूडिटी और गंभीर हिंसा के दृश्यों को लेकर हैं. बात इतनी गंभीर हो चली है कि परिवारों में माता-पिता परेशान होने लगे हैं कि वे बच्चों के साथ बैठ कर अब ओटीटी कंटेंट नहीं देख सकते. तो, सवाल उठता है कि क्या ओटीटी कंटेंट पर लगाम कसने का समय आ गया है?

आज के जमाने में, बच्चों और युवाओं के कंटेंट देखने पर अधिकतर घरों में ज्यादा रोकटोक नहीं है. वे जो चाहे देख सकते हैं, लेकिन क्या यह सही है. क्या यह सोचने का समय आ गया है कि 14 या 15 साल की उम्र वालों को क्या दिखाया जाए और क्या नहीं, यह अच्छे से साफ यानि स्पष्ट करने का समय आ गया है. क्या कोई ऐसा गेटवे या फिल्टर होना चाहिए जो कच्ची उम्र वालों को अनुपयुक्त कंटेंट देखने से रोक सके? क्या ऐसा गेटवे या फिल्टर संभव भी है?

ये वो सवाल हैं जिनसे सरकार, रेगुलेटरी बॉडी TRAI और खुद ओटीटी प्लेटफॉर्म्स जूझते रहे हैं. अब, पिछले हफ्ते 15 ओटीटी प्लेटफॉर्म्स ने एक सेल्फ रेगुलेशन कोड पर दस्तखत किए, जो उनके स्ट्रीमिंग कंटेंट को नियंत्रित करेगा. ये कैसे होगा, इसका जवाब यह है कि तुरंत प्रभाव से इन प्लेटफॉर्म्स पर मौजूद सारे कंटेंट के बारे में, देखने से पहले, दर्शक को यह जानकारी पढ़ने को मिलेगी कि अमुक कंटेंट किस ऐज ग्रुप के लिए उपयुक्त यानि मुनासिब है और क्या कंटेंट में गाली, हिंसा या सेक्स के सीन हैं.

दर्शकों के लिए बनानी होगी शिकायती पैनल

इन ओटीटी प्लेटफॉर्म्स को एक “दर्शक कंप्लेंट इकाई” का गठन करना पड़ेगा और कंपनी की एक आतंरिक कमेटी और एक सलाहकार पैनल बनाना पड़ेगा जो दर्शकों से मिलने वाली शिकायतों का निपटारा करेंगी. जानकारों का कहना है कि ओटीटी प्लेटफॉर्म्स ने अपनी पहल पर इस कोड पर हामी इसलिए भरी है ताकि सरकार अपनी तरफ से इस विषय में सेंसरशिप को लेकर कुछ न करे.

ओटीटी प्लेटफॉर्म्स के अधिकारियों का कहना है कि इस कोड से कलाकारों को अपना काम अच्छे से करने की आजादी मिलेगी और दर्शक भी कंटेंट देखने से पहले जान जाएंगे कि उसमें क्या है और वह उनके लिए मुनासिब है या नहीं. अगर कंटेंट को लेकर शिकायतें मिलती हैं तो कमेटी और पैनल उनका निपटारा करने के लिए मौजूद हैं.

सिंगापुर और ब्रिटेन में स्वतंत्र कंटेंट रेगुलेटरी संस्थाएं हैं जो ओटीटी कंटेंट पर भी नजर रखती हैं. ब्रिटेन में तो ओटीटी प्लेटफॉर्म्स को भी उन्हीं नियमों पर तोला जाता है जो पब्लिक सर्विस ब्रॉडकास्टर्स के लिए हैं. ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया में भी ओटीटी कंटेंट के लिए सख्त कानून बने हुए हैं.

ध्यान देने की बात यह है कि हमारे यहां के इस समाधान में माता-पिता या अभिभावकों का रोल बड़ा महत्वपूर्ण होगा. उन्हें ही ये देखना होगा कि उनके बच्चे स्क्रीन पर क्या देख रहे हैं. यानि कंटेंट गेटवे या फिल्टर की जिम्मेदारी वे ही निभाएंगे. ये उपाय काम करेगा या नहीं यह फैसला हम आप पर छोड़ते हैं.

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