पहले LAC तक पहुंचने में 14 दिन लगते थे, अब सिर्फ 1 दिन: सूबेदार मेजर सोनम मुरुप

सूबेदार मेजर सोनम मुरुप ने कहा, "1962 के युद्ध के दौरान कमियां थीं और हमने अपनी जमीन खो दी थी. लेकिन अब भारतीय सेना (Indian Army), वायुसेना (Airforce) और नौसेना (Navy) पूरी तरह से प्रशिक्षित, सशस्त्र और सुसज्जित हैं."
it takes only 1 day for army to reach LAC, पहले LAC तक पहुंचने में 14 दिन लगते थे, अब सिर्फ 1 दिन: सूबेदार मेजर सोनम मुरुप

1962 में जहां भारतीय सेना को वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) तक पहुंचने में 16 से 18 दिन का समय लगता था, वहीं अब सेना को यहां तक पहुंचने में महज एक दिन का ही समय लगता है. लद्दाख स्काउट्स के सेवानिवृत्त अध्यक्ष सूबेदार मेजर सोनम मुरुप ने भारतीय सेना (Indian Army) के लद्दाख स्काउट्स रेजिमेंट में अपने दिनों को याद करते हुए कहा कि भारतीय सेना अब वह नहीं है, जो 1962 में हुआ करती थी.

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सेवानिवृत्त सैनिक ने कहा, “1962 के युद्ध के दौरान कमियां थीं और हमने अपनी जमीन खो दी थी. लेकिन अब भारतीय सेना, वायुसेना और नौसेना पूरी तरह से प्रशिक्षित, सशस्त्र और सुसज्जित हैं. लेकिन इससे भी अधिक अब हमारे पास सड़कें, पुल और अन्य बुनियादी ढांचा है, जो इससे पहले हमारे पास नहीं था.”

अब हम और नहीं कहेंगे ‘हिंदी-चीनी भाई भाई’

1962 के युद्ध से पहले लोकप्रिय ‘हिंदी-चीनी भाई भाई’ के नारे को खारिज करते हुए मुरूप ने कहा, “हम इसे अब और नहीं कहेंगे. इसके बजाय सभी सैनिक केवल ‘भारत माता की जय’ और लद्दाख में ‘की सो सो लेरगेलो’ (भगवान की विजय) के नारे लगाएंगे और चीन को मात देंगे. यह उत्साह न केवल सैनिकों, बल्कि सेवानिवृत्त सैनिकों के बीच भी जिंदा है. 84 साल की उम्र में भी लद्दाख स्काउट्स के हमारे सैनिकों के पास वापस लड़ने की ताकत और क्षमता है.”

श्योक नदी को ‘मौत की नदी’ के रूप में जाना जाता है

मुरूप 1977 में सेना में शामिल हुए थे और 2009 में सेवानिवृत्त हुए. उन्होंने एक सैनिक के रूप में अपने अनुभवों को याद करते हुए कहा कि वे लोग श्योक नदी के रास्ते हथियार, गोला-बारूद, राशन और सामान लेकर कुली और टट्टू के साथ चले. उन्होंने बताया कि श्योक नदी को कठिन इलाके और तेज प्रवाह के कारण ‘मौत की नदी’ के रूप में जाना जाता है. श्योक, सिंधु नदी की एक सहायक नदी है, जो उत्तरी लद्दाख से होकर बहती है और गिलगित-बाल्टिस्तान में प्रवेश करती है.

मेजर मुरूप ने कहा, “कभी-कभी हमें इसे एक दिन में पांच बार भी नदी पार करनी पड़ती था. कुल मिलाकर हमें नदी को 118 बार पार करना पड़ता था. जिसके कारण हमारी त्वचा खराब हो जाती थी, लेकिन हम आगे बढ़ते रहते थे. यहां तक कि 1980 के दशक तक हमें 12 से 15 दिन लग जाते थे.”

हमें चीन पर बिल्कुल भी भरोसा नहीं करना चाहिए

मुरूप ने कहा कि आज चीजें बदल गई हैं. “वर्तमान सरकार ने सड़कें और पुल बनाए हैं. गलवान घाटी पुल 2019 में पूरा हो गया. अब एक या दो दिन में ही सैनिक आराम से वहां पहुंच सकते हैं. हथियारों और राशन को ले जाने के लिए किसी भी तरह के टट्टू, घोड़े या कुली की जरूरत नहीं है.” मेजर ने तर्क देते हुए कहा कि चीन अब चिंतित है कि क्षेत्र में भारतीय सेना की तैनाती और बुनियादी ढांचे में कोई कमजोरी नहीं है. लद्दाख स्काउट्स के सेवानिवृत्त सैनिक ने कहा, “इसलिए वे अपनी निराशा व्यक्त कर रहे हैं. हमें चीन पर बिल्कुल भी भरोसा नहीं करना चाहिए.”

लद्दाख स्काउट्स रेजिमेंट को ‘स्नो वारियर्स’ और भारतीय सेना की ‘आंख और कान’ के तौर पर जाना जाता है, जिसकी लद्दाख में पांच लड़ाकू बटालियन हैं. लद्दाख स्काउट्स के पास 300 वीरता पुरस्कार और प्रशंसा पत्र हैं, जिनमें महावीर चक्र, अशोक चक्र और कीर्ति चक्र शामिल हैं.

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