रंग लाई जाधवपुर यूनिवर्सिटी की कोशिश, अब 6 महीनों तक स्टोर किया जा सकेगा रसगुल्ला

बंगाल के फेमस मिठाईवाले राधाराम मलिक बलराम मलिक ने कहा है कि ये प्रयोग उनके उद्योग के लिए बहुत फायदेमंद है और जाधवपुर युनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने जादू कर दिखाया है.

पश्चिम बंगाल सरकार ने 2017 में ही रसगुल्ला के लिए जीआई टैग हासिल कर लिया था. आप लोग सोच रहे होंगे कि ये जीआई टैग क्या होता है? और इसका महत्व क्या होता है? वर्ल्ड इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी आर्गेनाईजेशन की मानें तो जीआई का मतलब है ज्योग्राफिकल इंडिकेशन. ज्योग्राफिकल इंडिकेशन उन चीजों को दिया जाता है जिनकी निर्धारित क्षेत्रीय उत्पत्ति होती है और जिनमें उस क्षेत्र से जुड़े कुछ खास गुण भी होते हैं.

हाल ही में जाधवपुर युनिवर्सिटी के फूड प्रोसेसिंग टेक्नोलॉजी डिपार्टमेंट के वैज्ञानिक डॉक्टर प्रशांत कुमार दास ने रसगुल्ले की शेल्फ लाइफ 6 महीने तक बढ़ाने के लिए एक प्रयोग किया. इस प्रयोग के दौरान उन्होंने कैनिंग की तकनीक और प्रिजर्वेटिव्स का इस्तेमाल किया था. कहते हैं कि कामयाबी एक दिन में नहीं आती. इस प्रयोग की कामयाबी के लिए भी 10 साल तक प्रयास किए गए. इस प्रयोग का उद्देश्य था कि 6 महीने के प्रिजर्वेशन के बाद भी रसगुल्ले के स्वाद और ताजगी में कोई अंतर न आए. रसगुल्ले की शेल्फ लाइफ बढ़ाने के लिए ये प्रयोग लंबे समय तक किए गए. ये प्रयोग कामयाब रहा और अब हम रसगुल्लों को लंबे समय तक प्रिसर्व कर सकते हैं.

इस प्रयोग में शामिल वैज्ञानिक डॉक्टर दास से जब TV9 के पत्रकारों ने इस प्रयोग के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि पिछ्ले 10 सालों में उन्होंने रसगुल्ले को प्रिसर्व करने के लिए हर तरह के प्रयोग किए हैं. जब TV9 के पत्रकारों ने उनसे पूछा कि इस शोध पर सरकार की क्या प्रतिक्रिया है तो उन्होंने कहा कि ये सरकार के ऊपर है वह इस शोध का उपयोग कैसे करना चाहते हैं.

बंगाल के फेमस मिठाईवाले राधाराम मलिक बलराम मलिक ने कहा है कि ये प्रयोग उनके उद्योग के लिए बहुत फायदेमंद है और जाधवपुर युनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने जादू कर दिखाया है. इस प्रयोग के चलते अब वह रसगुल्ला बिना किसी चिंता के दूसरे देशों में एक्सपोर्ट भी कर पाएंगे.

ख़ास सूत्रों से पता लगा है कि जब तक ये प्रयोग बाजार में नहीं आ जाता, सरकार इस पर कोई प्रेस वार्ता नहीं करेगी.