सरकारी कानून की आड़ में भ्रष्टाचार की भेंट चढ़े 25000 करोड़, पढ़ें इस घोटाले की हर परत खोलने वाली रिपोर्ट

ये सब कुछ हुआ एक कानून की आड़ में, जिसका नाम है रोशनी एक्ट, जो जम्मू-कश्मीर में आबादी में बदलाव के लिए सबसे बड़ा हथियार बना दिया गया. इस घोटाले की जांच सीबीआई ने शुरू कर दी है.

सांकेतिक तस्वीर

आप और हम अक्सर सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे की खबरें सुनते रहते हैं, लेकिन जमीन पर अवैध कब्जे को जिहाद का हथियार बना दिया जाए. वो भी बेहद संवेदनशील राज्य जम्मू-कश्मीर में सिस्टम और सफेदपोश नेताओं के संरक्षण में, तो हैरानी लाजिमी है. कश्मीर के सबसे बड़े घोटाले के पीछे की हम साजिश बता रहे हैं. ये घोटाला है 25 हजार करोड़ रुपये का और खास बात ये है कि इसमें करप्शन के साथ जिहाद का कनेक्शन भी है.

रोशनी एक्ट की आड़ में चल रहे लैंड जिहाद की इनसाइड स्टोरी बताएंगे और समझाएंगे कि कैसे कश्मीर में चुनी हुई सरकारों ने, वहां के मुख्यमंत्रियों ने जम्मू-कश्मीर के साथ धोखा किया. इस देश के साथ धोखा किया. नेताओं और नौकरशाहों के नेक्सस ने वोट और नोट की जमकर लूट की. डेमोग्राफी बदलने की साजिश हुई. धर्म के आधार पर आबादी का बैलेंस बिगाड़ने की साजिश हुई.

ये सब कुछ हुआ एक कानून की आड़ में, जिसका नाम है रोशनी एक्ट, जो जम्मू-कश्मीर में आबादी में बदलाव के लिए सबसे बड़ा हथियार बना दिया गया. इस घोटाले की जांच सीबीआई ने शुरू कर दी है, जिसका आदेश हाईकोर्ट ने रोशनी एक्ट को असंवैधानिक करार देते हुए दिया था. ताकि 25 हजार करोड़ रुपये वाले. कश्मीर में अब तक के इस सबसे बड़े घोटाले को अंजाम देने वाले हर बड़े से बड़े और छोटे से छोटे शख्स का पता लगाकर. उसे कानूनी अंजाम तक पहुंचाया जा सके.

हाई कोर्ट ने नेताओं और नौकरशाहों को बताया जिम्मेदार

जम्मू कश्मीर के अब तक के सबसे बड़े 25 हजार करोड़ के रोशनी भूमि घोटाले के लिए हाईकोर्ट ने नेताओं व नौकरशाहों के लालच को सीधा जिम्मेदार ठहराया है. जम्मू-कश्मीर देश का शायद एकमात्र ऐसा प्रदेश होगा, जहां सरकारी जमीनों पर धड़ल्ले से कब्जा हुआ. राजनेताओं व नौकरशाहों के प्रभाव में जमकर अतिक्रमण हुआ. इससे भी चिंतनीय यह रहा कि सरकारी जमीनों पर हुए कब्जों को हटाने की बजाय सरकार की तरफ से ऐसे कानून बनाए गए, जिससे कब्जा करने वालों को ही जमीन का मालिक बना दिया गया.

बीस साल पहले हुए एक सरकारी सर्वे के मुताबिक, जम्मू-कश्मीर की 20,64,792 कनाल जमीन पर लोगों ने अवैध कब्जा कर रखा था. तत्कालीन सरकार ने इस कब्जे को हटाने की बजाय लोगों को इन जमीनों का मालिकाना अधिकार देने के लिए रोशनी एक्ट बनाया. नवंबर 2001 में राज्य विधानमंडल द्वारा इसे अधिनियमित किया गया और मार्च 2002 में लागू किया गया था.

इसका मकसद कृषि क्षेत्र को बढ़ावा देने के साथ राज्य में अधर में लटके बिजली प्रोजेक्टों को पूरा करने के लिए धन जुटाना था. योजना अपने मकसद में नाकाम साबित हुई.

रोशनी घोटाले की जांच अब सीबीआई करेगी

25 हजार करोड़ के रोशनी घोटाले की जांच अब सीबीआई करेगी. जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट की चीफ जस्टिस गीता मित्तल और जस्टिस राजेश बिंदल की खंडपीठ ने यह आदेश देते हुए रोशनी एक्ट को असंवैधानिक करार दिया. साथ ही इस एक्ट के तहत दी गई जमीन के आदेशों को भी निष्प्रभावी कर दिया.

कोर्ट ने 64 पन्नों के आदेश में साफ लिखा कि रोशनी एक्ट की बुनियाद स्वार्थ पूर्ति के लिए ही रखी थी. नेताओं और नौकरशाहों की नीयत में खोट था, जिन्होंने स्वार्थ की खातिर गरीबों, जरूरतमंदों के नाम पर सरकारी और वन विभाग की जमीनों को हथिया लिया.

चीफ जस्टिस गीता मित्तल और जस्टिस राजेश बिंदल पर आधारित खंडपीठ ने एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) को भी कठघरे में खड़ा कर दोषियों के खिलाफ की कसरत को दिखावा बताया. सीबीआइ को जांच सौंपते हुए कोर्ट ने कहा कि सरकार के सामान्य प्रशासनिक विभाग में हिम्मत नहीं थी कि वह उनके खिलाफ कार्रवाई करते, जिन्होंने रोशनी एक्ट की आड़ में लूट-खसोट की. कोर्ट ने कहावत का उल्लेख भी किया कि दान पुण्य की शुरुआत घरों से शुरू होती है.

कोर्ट ने यहां तक लिखा है कि रसूखदारों ने सरकारी जमीनों की लूटखसोट लालचवश की है, जिससे राष्ट्र और जनहित को नुकसान पहुंचा. कोर्ट ने कहा कि बेईमानी से हथियाई जमीन में अपराधिक प्रवृत्ति झलकती है, जिसने सरकार के प्रति विश्वास को झकझोर दिया है. रोशनी एक्ट बनाने वालों में वे लोग शामिल रहे जिनका सभी स्तर पर अच्छा खासा प्रभुत्व था.

डिवीजन बेंच ने अफसोस जताया कि यह हम सबके लिए हैरान कर देने वाली बात है. नौ साल पहले इस मुद्दे को जनहित याचिका के जरिए उठाया गया, जब हम पूर्व जम्मू कश्मीर और लद्दाख के नागरिक थे और यहां चुनी हुई सरकार थी. वर्ष 2011 में जनहित याचिका दायर हुई उसके बाद 2014 में अन्य याचिका दायर हुई. याचिकाकर्ताओं की न्याय की दलीलों को इन नेताओं के कानों पर कोई असर नहीं हुआ. उन्होंने लूटखसोट करने वालों को प्रोत्साहित किया.

क्लोजर रिपोर्ट तक फाइल कर दी

घोटाले का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि 2019 में एंटी करप्शन ब्यूरो ने क्लोजर रिपोर्ट फाइल कर दी. फिर सामान्य प्रशासनिक विभाग ने 9 सितंबर 2020 में कहा कि न एंटी करप्शन ब्यूरो और न अधिकारियों के पास योग्यता या क्षमता है, जो कानूनी कार्रवाई करते हुए उन लोगों के खिलाफ कार्रवाई कर वे जमीन वापस ले जो अवैध रूप से हड़पी गई है. 2018 में हाईकोर्ट ने एक्ट को निरस्त करने के बाद मामले की जांच प्रदेश के एंटी करप्शन ब्यूरो को दी गई थी, लेकिन प्रभावी लोगों के दबाव में एसीबी इसकी जांच ठीक से नहीं कर रहा था.

9 अक्टूबर, 2020 को खंडपीठ ने मामले की सुनवाई के बाद कहा कि सीबीआई को हर आठ हफ्ते में स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करनी होगी. जांच प्रभावित न हो, इसके लिए प्रदेश के मुख्य सचिव की जवाबदेही तय की गई है. जिन अधिकारियों के कार्यकाल के दौरान यह घोटाला हुआ, उनके खिलाफ भी जांच होगी. एडवोकेट अंकुर शर्मा ने 2014 में इस एक्ट को हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए इसे निरस्त करने की मांग की थी.

23 सितंबर 2020 को हाईकोर्ट ने कई महीने की सुनवाई करने के बाद सीबीआइ जांच करवाने की मांग को लेकर दायर जनहित याचिका पर फैसला सुरक्षित रख लिया था. इस घोटाले में अफसरों, नेताओं, माफियाओं, कारोबारियों, मंत्रियों और विधायकों के नाम इस घोटाले में सामने आएंगे.13 नवंबर 2018 को हाईकोर्ट के डिवीजन बेंच ने रोशनी एक्ट के तहत हर तरह के लेनदेन पर रोक लगा दी. 28 नवंबर 2018 को तत्कालीन राज्यपाल सत्यपाल मलिक की अध्यक्षता में प्रदेश प्रशासनिक परिषद ने भी रोशनी एक्ट के तहत हर तरह के लेनदेन पर रोक लगा दी.

एक्ट के तहत हुआ 25 हजार करोड़ का घोटाला

सरकार की तरफ से गरीबों और कब्जा धारकों को जमीनों का मालिकाना हक देने के लिए शुरू की गई रोशनी योजना में 25 हजार करोड़ रुपये के घोटाले के आरोप किसी और ने नहीं, बल्कि तत्कालीन प्रिंसिपल एकाउंटेंट जनरल ने लगाए थे. 2013 में तत्कालीन प्रिंसिपल एकाउंटेंट जनरल जम्मू-कश्मीर एससी पांडे ने कहा था कि सरकार और राजस्व विभाग ने सभी नियम-कानूनों की धज्जियां उड़ाकर जमीन बांटी और जम्मू-कश्मीर के इतिहास में अब तक के सबसे बड़े घोटाले की इमारत तैयार कर दी. इतना ही नहीं कृषि भूमि को मुफ्त में ही ट्रांसफर कर दिया गया.

इसके लिए 2013 में पांडे ने एक पत्रकार सम्मेलन में सार्वजनिक रूप से कंप्ट्रोलर एंड आडिटर जनरल ऑफ इंडिया (CAG) की वर्ष 2012-13 की रिपोर्ट में रोशनी एक्ट से जुड़ी योजना के विभिन्न पहलुओं को उजागर किया था. यह कहा गया था कि अनुमान था कि राज्य की 20,64,792 कनाल भूमि पर हुए अवैध कब्जे का लोगों को मालिकाना हक देकर 25,448 करोड़ रुपये जुटाए जाएंगे, लेकिन कानून पर अमल नहीं किया गया. लोगों को 3,48,160 कनाल भूमि का हक देते हुए 317.54 करोड़ रुपये की जगह के लिए मात्र 76.24 करोड़ रुपये ही वसूले गए.

कैसे दिया गया अंजाम?

रोशनी एक्ट को नजरअंदाज करते हुए अलग से नियम तैयार कर 3,40,091 कनाल कृषि भूमि को निशुल्क ही ट्रांसफर कर दिया गया. प्रिंसिपल एकाउंटेंट जनरल ने कहा था कि उनके कार्यालय ने बार-बार राजस्व विभाग से रोशनी योजना के तहत लाभांवितों की सूची व जानकारी देने के लिए कहा, लेकिन महीनों लटकाकर रखा गया और जानकारी नहीं दी गई. आखिरकार सीएजी ने 31 जुलाई 2013 को रिपोर्ट तैयार कर ली. उनके पास सिर्फ 547 मामलों की जानकारी आई. इसमें 666 कनाल भूमि को ट्रांसफर करते हुए रियायतें दे दी गई, जिसमें सरकार को 225.26 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ. सरकार की तरफ से खुद ही फ्रैंडली नियम तैयार कर लिए गए. जमीन के मालिकाना अधिकार देने की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं रही. पुलवामा में सड़क किनारे 129 कनाल भूमि 59 लोगों को ट्रांसफर कर दी गई और इसमें रोशनी एक्ट का पूरी तरह से उल्लंघन हुआ.

रोशनी एक्ट की आड़ में सरकारी जमीनों पर कब्जा करने वालों को मालिक बनाने को एडवोकेट अंकुर शर्मा ने जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट में चुनौती दी थी. 2016 में उन्होंने यह केस दायर किया और लंबी सुनवाई के बाद 13 नवंबर 2018 को हाईकोर्ट के डिवीजन बेंच ने रोशनी एक्ट के तहत हर तरह के लेनदेन पर रोक लगा दी. इससे कुछ दिन बाद 28 नवंबर 2018 को तत्कालीन राज्यपाल सत्यपाल मलिक की अध्यक्षता में प्रदेश प्रशासनिक परिषद ने भी रोशनी एक्ट के तहत हर तरह के लेनदेन पर रोक लगा दी. उसके बाद से रोशनी एक्ट के तहत हालांकि कोई लेनदेन नहीं हुआ है, लेकिन अब एडवोकेट अंकुर शर्मा रोशनी एक्ट के तहत दी गई जमीन को वापस लाने की लड़ाई लड़ रहे हैं.

ऐसे किया गया घोटाला

2001 में नेशनल कॉन्फ्रेस सरकार ने रोशनी एक्ट बनाया। इससे जमा होने वाले राजस्व को बिजली परियोजना पर लगाने का तर्क दिया गया था. एक्ट का प्रावधान था कि उन्हीं लोगों को जमीन का मालिकाना हक मिलेगा, जिनके पास 1999 से पहले से सरकारी जमीनों पर कब्जा है. वर्ष 2004 में इस एक्ट में बदलाव कर वर्ष 1999 से पहले कब्जे की शर्त हटा दी गई. इससे लोगों ने सरकारी जमीन पर कब्जे को दर्शाकर आवेदन किए. कई लोगों ने 200 रुपये में एक कनाल जमीन पर मालिकाना हक पा लिया. एक्ट के तहत मूल्य तय करने के लिए कई कमेटियां बनीं, लेकिन इसमें भी नियमों को ताक पर रखा गया. 2007 के बाद मालिकाना हक के लिए आवेदन नहीं हो सकता था, लेकिन राजनेताओं ने यह जारी रखा.

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