पंडित नेहरू से कितने और क्यों तल्ख थे जिन्ना के रिश्ते, एक चिट्ठी ने जाहिर कर दिए थे दोनों के मतभेद

जवाहर लाल नेहरू और मोहम्मद अली जिन्ना (Nehru and Jinnah), दोनों की एक-दूसरे को लेकर सोच और नज़रिए ने आखिरकार एक दिन भारत और पाकिस्तान (India and Pakistan) के बंटवारे की नींव रखी.
nehru and jinnah india partition, पंडित नेहरू से कितने और क्यों तल्ख थे जिन्ना के रिश्ते, एक चिट्ठी ने जाहिर कर दिए थे दोनों के मतभेद

भारत और पाकिस्तान (India and Pakistan) के बीच जब साल 1947 में बंटवारा हुआ तब किसी ने भी दोनों देशों बीच के मौजूदा हालात की कल्पना नहीं की होगी. बंटवारे की आग ने जहां एक ओर भारत को दो हिस्सों में बांट दिया तो वहीं एक नए देश के अस्तित्व की नींव भी रखी.

बंटवारे की आग में लाखों घर जल गए और न जाने कितनों की जानें चली गईं. भारत-पाकिस्तान के अलग होने का जब भी जिक्र आता है तो दो नाम जो सबसे पहले ज़ेहन में आते हैं वो हैं नेहरू और जिन्ना. आधुनिक भारत के इतिहास में अगर दो सबसे बड़े राजनीतिक विरोधियों की बात करें तो मोहम्मद अली जिन्ना और पंडित जवाहर लाल नेहरू का नाम सबसे ऊपर रखा जाएगा.

एक-दूसरे की नीतियों से नहीं थे सहमत

नेहरू और जिन्ना जहां आपस में एक-दुसरे के विरोधी थे तो वहीं दोनों ही अपने-अपने लोगों के बीच खासे लोकप्रिय भी थे. जहां जिन्ना (Mohammad Ali Jinnah) एक तरफ खुद को देश में मुस्लिम तबके के लीडर के तौर पर सामने ला रहे थे तो वहीं दूसरी तरफ पंडित नेहरू (Jawaharlal Nehru) भारत की आज़ादी की नींव रख रहे थे. दोनों एक-दूसरे के तरीकों को अपने मुताबिक सही नहीं मानते थे और यही वजह थी कि एक दिन इसी वैचारिक और राजनीतिक मतभेद के चलते ब्रिटिश हुकूमत के सामने देश के बंटवारे का विकल्प रखा गया.

आपसी रंजिश के चलते जिन्ना ने छोड़ी कांग्रेस

दोनों के आपसी रिश्ते कितने कड़वे थे, इस बात का जिक्र भारत के वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर (Kuldeep Nayar) ने अपनी एक किताब ‘बियॉन्ड द लाइन्स: एन ऑटोबायोग्राफी’ में किया है. उन्होंने लिखा है कि ‘जिन्ना और नेहरू के बीच व्यक्तिगत प्रतिस्पर्धा सिर्फ मुद्दों तक सीमित नहीं थी और इससे मामला और भी ज्यादा उलझ गया था. वे दोनों बिल्कुल अलग शख्सियतें थीं.”

उन्होंने आगे लिखा है, “दोनों ही अपने-अपने तरीके से योग्य और प्रतिभाशाली थे और जनता में खूब लोकप्रिय थे लेकिन सैद्धांतिक रूप से दोनों दो विपरीत ध्रुवों की तरह थे. जिन्ना के कांग्रेस छोड़ने का एक कारण यह भी रहा होगा कि पार्टी में जिन्ना और नेहरू दोनों के लिए एक साथ पर्याप्त जगह नहीं थी. गांधी जी का झुकाव नेहरू की तरफ था और जिन्ना जानते थे कि नेहरू ही उनके उत्तराधिकारी होंगे’.

मुस्लिम लीग की अहमियत और ओहदे पर दोनों में थे मतभेद

नेहरू और जिन्ना के बीच हुए दो पत्रों के आदान-प्रदान (Exchange) से उनके मतभेद खुलकर जाहिर हो जाते थे. नेहरू ने 16 अप्रैल 1938 को अपने पत्र में उन्हें लिखा था कि “मुस्लिम लीग (Muslim League) एक अहम साम्प्रदायिक संस्था है लेकिन दूसरी संस्थाओं जो भले ही वे कम उम्र और छोटी हों, को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता”.

इसके जवाब में जिन्ना ने लिखा था “आप के लहजे और जुबान में एक बार फिर उसी दंभ और धौंस की झलक दिखाई दे रही है जैसे कि कांग्रेस (Congress) कोई प्रभुसत्तासंपन्न शक्ति हो”. जिन्ना का कहना था कि जब तक कांग्रेस मुस्लिम लीग को बराबरी के नजरिए से नहीं देखती और किसी तरह के ‘हिंदू-मुस्लिम समझौते’ के लिए तैयार नहीं होती, वह अपनी अंदरूनी ताकत पर भरोसा करते रहेंगे.

भारत का बंटवारा

भारत की मुस्लिम आबादी के लिए एक अलग देश की मांग ने जब जोर पकड़ा, तब ब्रिटिश हुकूमत (British Rule) ने दोनों को आपसी सुलह का भी मौका दिया. लेकिन आपसी मतभेद ने सुलह के उस मौके को भी नज़रंदाज कर दिया. दोनों की एक-दूसरे को लेकर सोच और नज़रिए ने आखिरकार एक दिन भारत और पाकिस्तान के बंटवारे की नींव रखी. पाकिस्तान के बनने के महज 13 महीने बाद जिन्ना का निधन हो गया लेकिन उनकी पाकिस्तान बनाने को लेकर रही जिद ने आज दोनों देशों को इन हालात पर ला खड़ा कर दिया है.

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