अंदाज का कैनवास, शब्‍दों के रंग, पढ़ें शायरी में चित्रकारी का हुनर रखने वाले अलबेले राहत इंदौरी का सफरनामा

राहत इंदौरी के शेर न सिर्फ आशिकों के लिए थे और न ही सिर्फ जिंदादिली के लिए, बल्कि उनके शेरों के जरिए अपने हकों को आवाज देने का जो शोर सुनाई देता था, वो शायद ही उनके समकालीन किसी शायर की आवाज में सुनने को मिला.
Rahat Indori, अंदाज का कैनवास, शब्‍दों के रंग, पढ़ें शायरी में चित्रकारी का हुनर रखने वाले अलबेले राहत इंदौरी का सफरनामा

रैप और हिप हॉप के जमाने में उर्दू की शायरी को लोगों के बीच अपने अजीब मगर शानदार अंदाज से पॉपुलर कर देने वाले मशहूर शायर राहत इंदौरी अब इस दुनिया में नहीं रहे. कोरोना से संक्रमित होने के बाद दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया है.

उर्दू की शायरी का ये रॉकस्टार अब भले ही मंचों पर अपने अलबेले अंदाज में शायरी पढ़ते हुए नजर नहीं आएगा, लेकिन उसकी आवाज और लिखे हुए शब्द आगे भी कई वर्षों तक लोगों के गम बांटेंगे, चेहरे पर मुस्कान लाएंगे और अपने जिंदा होने का एहसास दिलाते रहेंगे.

उर्दू शायरी का रॉकस्टार बनना चाहता था चित्रकार

उर्दू शायरी की इस जिंदादिल राहत इंदौरी को एक शख्स में देखने से बेहतर है एक सफर के रूप में देखना. ये सफर शुरू होता है इंदौर से, जो बाद में राहत के नाम के साथ हमेशा के लिए जुड़ गया और राहद- इंदौरी हो गए. राहत का जन्म 1 जनवरी 1950 को इंदौर में हुआ. यहीं शुरुआती पढ़ाई, फिर BA और फिर भोपाल की बरकतुल्लाह यूनिवर्सिटी से उर्दू साहित्य में MA. फिर राहत ने उर्दू साहित्य में Phd भी की.

उर्दू को आत्मसात कर लेने वाले राहत ने बाद में उर्दू साहित्य पढ़ाना शुरू किया और इंदौर की देवी अहिल्या विश्वविद्यालय में उर्दू साहित्य के प्राध्यापक भी रहे, लेकिन उन्हें पॉपुलर किया उनकी शायरी और इन्हें पढ़ने के उनके अलग अंदाज ने. उनके अंदाज और अल्फाजों ने बहुत जल्द ही उन्हें लोगों का पसंदीदा शायर बना दिया.

शायर से पहले चित्रकार बनना चाहते थे राहत

राहत शायरी करने से पहले चित्रकार बनना चाहते थे. उन्होंने चित्रकारी की भी. कई हिंदी फिल्मों के लिए गाने लिखने से पहले उन्होंने कई फिल्मों के पोस्टर भी बनाए. बाद में भी उन्होंने कई बुक्स के कवर्स डिजाइन किए. हालांकि वो चित्रकारी में आगे करियर बना पाते उससे पहले ही शायरी ने उन्हें काफी पॉपुलर कर दिया. दरअसल, राहत पहले चित्रकार बनना चाहते थे. इसलिए उनकी शायरी का अंदाज ऐसा था जैसे कोई पेंटिंग में बनाई गई चीजों को शब्‍दों में पिरो रहा हो.

राहत ने दिए बॉलीवुड को कई पॉपुलर गाने

मंचों पर शायरी पढ़ने के उनके सफर की शुरुआत तो कॉलेज के दिनों में ही हो गई थी जब वह 19 के थे, जो कि आजीवन चली. न सिर्फ उनकी शायरी बल्कि खुद वो देश की सीमा लांघकर विदेशो में भी सबके पसंदीदा शायर बन गए. उनकी शानदार शायरी के बूते वो बॉलीवुड नगरी मुंबई भी पहुंचे.

उन्होंने बेगम जान, मर्डर, मुन्नाभाई एमबीबीएस, मिशन कश्मीर, इश्क, घातक और मैं खिलाड़ी तू अनाड़ी, जैसी सुपरहिट फिल्मों के लिए गीत भी लिखे. इन पॉपुलर गीतों में इश्क फिल्म का- नींद चुराई मेरी किसने ओ सनम, मिशन कश्मीर का बुमरो-बुमरो श्याम रंग बुमरो, मुन्ना भाई एमबीबीएस का एम बोले तो और बेगम जान का मुर्शीदा शामिल हैं.

Rahat Indori, अंदाज का कैनवास, शब्‍दों के रंग, पढ़ें शायरी में चित्रकारी का हुनर रखने वाले अलबेले राहत इंदौरी का सफरनामा

अब बात करते हैं राहत की शायरी की. राहत इंदौरी के शेर न सिर्फ आशिकों के लिए थे और न ही सिर्फ जिंदादिली के लिए, बल्कि उनके शेरों के जरिए अपने हकों को आवाज देने का जो शोर सुनाई देता था, वो शायद ही उनके समकालीन किसी शायर की आवाज में सुनने को मिला. उनके लिखे कई शेर, कई आंदोलनों के चेहरे बने. बड़े से बड़े दर्द को भी राहत अपने ठहाकों से भरे शेर में बहा देते थे.

अमेरिका, कुवैत और पाकिस्तान में भी राहत की शायरी

राहत की दीवानगी सिर्फ भारत तक ही सीमित नहीं थी. उन्हें दुनियाभर से प्यार मिला. अमेरिका, सऊदी अरब, पाकिस्तान, कुवैत और भारत में 35 से ज्यादा अवॉर्ड्स से राहत इंदौरी को सम्मानित किया गया. राहत इंदौरी ने 9 किताबें भी लिखी हैं.

उर्दू शायरी का ये रॉकस्टार आज तमाम मंचों को अलविदा कह गया है. ऐसे में राहत को उन्हीं के एक शेर से विदाई दी जानी चाहिए-

आंख में पानी रखो होंटों पे चिंगारी रखो
जिंदा रहना है तो तरकीबें बहुत सारी रखो

राह के पत्थर से बढ़ कर कुछ नहीं हैं मंजिलें
रास्ते आवाज देते हैं सफर जारी रखो

एक ही नदी के हैं ये दो किनारे दोस्तों
दोस्ताना जिंदगी से मौत से यारी रखो

आते जाते पल ये कहते हैं हमारे कान में
कूच का ऐलान होने को है तय्यारी रखो

ये जरूरी है कि आंखों का भरम कायम रहे
नींद रखो या न रखो ख्वाब मेयारी रखो

ये हवाएं उड़ न जाएं ले के कागज का बदन
दोस्तों मुझ पर कोई पत्थर जरा भारी रखो

ले तो आए शायरी बाजार में राहत मियां
क्या जरूरी है कि लहजे को भी बाजारी रखो

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