तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो से लेकर…कैफ़ी आज़मी की मुफलिसी और देशभक्ति पर मशहूर शायरियां

कैफ़ी आज़मी साहब को कोई भी एक विधा में माहिर शायर नहीं कहेगा. उन्होंने जितने अच्छे अशआर मोहब्बत के लिए कहें हैं उतने ही अच्छे अशआर गरीबी, मुफलिसी, महिलाओं के उत्थान के लिए भी कहें हैं.
kaifi azmi poetry, तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो से लेकर…कैफ़ी आज़मी की मुफलिसी और देशभक्ति पर मशहूर शायरियां

नई दिल्ली: उर्दू अदब के अज़ीम शायर कैफ़ी आज़मी की 101वीं यौम-ए-पैदाइश (जन्मदिन) पूरी दुनिया में मनाया जा रहा है. उनकी लिखी गज़ले, नज़्मे, शायरियां और शेर आज भी लोगों की जु़बान पर हैं. वैसे ही कैफ़ी साहब की कलम से लिखा हर एक अल्फाज अपने आपमें मुकम्मल है लेकिन उनके कुछ अशआर और भी ज्यादा खास हैं.

1982 फिल्म अर्थ में
तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो, क्या ग़म है जिस को छुपा रहे हो
आँखों में नमी हँसी लबों पर, क्या हाल है क्या दिखा रहे हो
बन जाएँगे ज़हर पीते पीते, ये अश्क जो पीते जा रहे हो
जिन ज़ख़्मों को वक़्त भर चला है, तुम क्यूँ उन्हें छेड़े जा रहे हो
रेखाओं का खेल है मुक़द्दर, रेखाओं से मात खा रहे हो
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महज 11 बरस की उम्र में पहली गज़ल

इतना तो ज़िंदगी में किसी के ख़लल पड़े
हँसने से हो सुकून न रोने से कल पड़े
जिस तरह हँस रहा हूँ मैं पी पी के गर्म अश्क
यूँ दूसरा हँसे तो कलेजा निकल पड़े
इक तुम कि तुम को फ़िक्र-ए-नशेब-ओ-फ़राज़ है
इक हम कि चल पड़े तो बहर-हाल चल पड़े
साक़ी सभी को है ग़म-ए-तिश्ना-लबी मगर
मय है उसी की नाम पे जिस के उबल पड़े
मुद्दत के बा’द उस ने जो की लुत्फ़ की निगाह
जी ख़ुश तो हो गया मगर आँसू निकल पड़े
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मैं ढूँडता हूँ जिसे वो जहाँ नहीं मिलता
नई ज़मीन नया आसमाँ नहीं मिलता
नई ज़मीन नया आसमाँ भी मिल जाए
नए बशर का कहीं कुछ निशाँ नहीं मिलता
वो तेग़ मिल गई जिस से हुआ है क़त्ल मिरा
किसी के हाथ का उस पर निशाँ नहीं मिलता
वो मेरा गाँव है वो मेरे गाँव के चूल्हे
कि जिन में शोले तो शोले धुआँ नहीं मिलता
जो इक ख़ुदा नहीं मिलता तो इतना मातम क्यूँ
यहाँ तो कोई मिरा हम-ज़बाँ नहीं मिलता
खड़ा हूँ कब से मैं चेहरों के एक जंगल में
तुम्हारे चेहरे का कुछ भी यहाँ नहीं मिलता
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1982 फिल्म अर्थ

झुकी झुकी सी नज़र बे-क़रार है कि नहीं, दबा दबा सा सही दिल में प्यार है कि नहीं
तू अपने दिल की जवाँ धड़कनों को गिन के बता, मिरी तरह तिरा दिल बे-क़रार है कि नहीं
वो पल कि जिस में मोहब्बत जवान होती है, उस एक पल का तुझे इंतिज़ार है कि नहीं
तिरी उमीद पे ठुकरा रहा हूँ दुनिया को, तुझे भी अपने पे ये ए’तिबार है कि नहीं
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नज्म- औरत के ऊपर लिखी उनकी शानदार पंक्तियां

उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे
क़ल्ब-ए-माहौल में लर्ज़ां शरर-ए-जंग हैं आज
हौसले वक़्त के और ज़ीस्त के यक-रंग हैं आज
आबगीनों में तपाँ वलवला-ए-संग हैं आज
हुस्न और इश्क़ हम-आवाज़ ओ हम-आहंग हैं आज
जिस में जलता हूँ उसी आग में जलना है तुझे
उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे

कैफ़ी आज़मी साहब को कोई भी एक विधा में माहिर शायर नहीं कहेगा. उन्होंने जितने अच्छे अशआर मोहब्बत के लिए कहें हैं उतने ही अच्छे अशआर गरीबी, मुफलिसी, महिलाओं के उत्थान के लिए भी कहें हैं. उन्होंने देश के जवानों के लिए भी बहुत कुछ लिखा है. इससे आप समझ सकते हैं कि कैफ़ी केवल एक तरह की शेर ओ शायरी नहीं करते थे बल्कि हर वो बात जो उनकी आंखों में खटक जाती थी. वो उन सभी मसलों पर शायरियां लिखते थे.

फिल्म हकीकत में उनकी इस गज़ल को फिल्माया गया, जो आज भी लोगों की जुबान पर है
कर चले हम फ़िदा जानो-तन साथियो
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो
साँस थमती गई, नब्ज़ जमती गई
फिर भी बढ़ते क़दम को न रुकने दिया
कट गए सर हमारे तो कुछ ग़म नहीं
सर हिमालय का हमने न झुकने दिया
मरते-मरते रहा बाँकपन साथियो
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो
ज़िंदा रहने के मौसम बहुत हैं मगर
जान देने के रुत रोज़ आती नहीं
हस्न और इश्क दोनों को रुस्वा करे
वह जवानी जो खूँ में नहाती नहीं
आज धरती बनी है दुलहन साथियो
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो
राह कुर्बानियों की न वीरान हो
तुम सजाते ही रहना नए काफ़िले
फतह का जश्न इस जश्न‍ के बाद है
ज़िंदगी मौत से मिल रही है गले
बांध लो अपने सर से कफ़न साथियो
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो
खींच दो अपने खूँ से ज़मी पर लकीर
इस तरफ आने पाए न रावण कोई
तोड़ दो हाथ अगर हाथ उठने लगे
छू न पाए सीता का दामन कोई
राम भी तुम, तुम्हीं लक्ष्मण साथियो
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो

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