Kargil Vijay Diwas: एक मां की गोद खाली हुई तो क्या हुआ तीस की गोद कैप्टन अमित ने बचाई

17 मई, 1999 को करगिल युद्ध के दौरान शहीद हुए कैप्टन अमित भारद्वाज के पिता की आंखों में एक तरफ जब जवान बेटे के जाने का दुख था तो वहीं दूसरे तरफ उन्होंने एक और बेटा होने पर उसे भी देश के लिए कुर्बान करने की बात कह डाली थी.

जयपुर: अगर मेरा एक और बेटा होता तो उसे भी सेना में भेजता, ये बोल उस पिता के हैं, जिसने करगिल युद्ध के दौरान अपना जवान बेटा खो दिया. हम बात कर रहे हैं शहीद कैप्टन अमित भारद्वाज की, जो कि पाकिस्तान से लड़ते हुए करगिल की जंग में देश के लिए कुर्बान हो गए थे.

17 मई, 1999 को करगिल युद्ध के दौरान शहीद हुए कैप्टन अमित भारद्वाज के पिता की आंखों में एक तरफ जब जवान बेटे के जाने का दुख था तो वहीं दूसरे तरफ उन्होंने एक और बेटा होने पर उसे भी देश के लिए कुर्बान करने की बात कह डाली थी. टीवी9 भारतवर्ष ने करगिल दिवस के मौके पर कैप्टन अमित भारद्वाज के परिवार से मुलाकात की और अमित से जुड़ी कुछ पुरानी यादों को साझा किया.

हमने जब अमित के पिता जी से 17 मई वाले दिन के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा, “जहां तक सवाल देश का है, देश के लिए कुर्बान होने के लिए हमें हमेशा तैयार रहना चाहिए. अगर हम तैयार नहीं रहेंगे तो देश में दुश्मनों का इकट्ठा होना शुरू हो जाएगा. मेरे बेटे ने जो शहादत दी थी, तो मैं सोचता था कि अगर जरुरत पड़े कि मेरा एक और बेटा होता तो उसे भी मैं फौज में भेज देता. यह मेरे लिए गर्व की बात है.”

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“हमें आर्मी हेडक्वाटर से सूचना आई थी कि अमित लापता है. हमें लगा कि लड़ाई करते हुए कहीं खाई में गिर गया होगा या उसे कुछ हो गया होगा, पर हमें ऐसा नहीं लगा कि अमित जिंदा नहीं है. हम यही आस लगाए बैठे थे कि वह जिंदा होगा और वापस आएगा, पर हमें बाद में पता चला कि वह देश के लिए शहीद हो गया है. यह सुनकर तकलीफ तो हुई, क्योंकि मेरा बेटा चला गया था, लेकिन जब मैं देखता हूं कि मेरा बेटा देश के लिए गया है, देश की सेवा करते हुए अपने प्राणों को न्योछावर किया है तो मुझे साहस मिला और गर्व महसूस हुआ कि बेटे ने मेरा नाम रोशन किया. आज हमें बेटे के नाम से जाना जाता है कि हम उसके पिता है. ये मेरे लिए बहुत गर्व की बात है.”

अमित के पिता रोजाना उसके लिए बनाए समाधि स्थल पर जाते हैं और वहां जाकर अगरबत्ति जलाते हैं.

अमित की मां ने बताया कि उनकी आखिरी बात उनसे 8 मई को हुई थी. नम आंखों से अमित की मां ने उन दिनों को याद करते हुए कहा, “मैंने एक बार अमित से बोला था कि लेह में बहुत अच्छा सामना मिलता है, तो उसने कहा था ठीक है मां मैं जब आऊंगा तो लेकर आऊंगा, लेकिन वो आया नहीं. उसका सामान आया और उसके सामान में मुझे वो चीज मिलीं.”

भीगी पलकों से अमित की मां ने आगे कहा, “एक कहावत है कि ‘चिता भी रोती जाएगी’ यानि जब एक मां-बाप का बच्चा उसके सामने से चला जाता है तो एक तरह से यह होता है कि जो चिता जलती है वह भी रोती है. बेटे के जाने का बहुत दुख है, लेकिन लोगों का सम्मान देखकर गर्व भी हुआ. उसका सामान लेकर जब उसके साथी आए और उन्होंने करगिल की दास्तां बताई तो आंखों में आंसू आ रहे थे, तो उन्होंने मुझसे कहा कि माता जी हमारी साहब का अपमान मत कीजिए. यह देखकर मुझे बहुत गर्व हुआ कि यह देश के लिए गया है. उन्होंने मुझसे कहा कि एक मां की गोद खाली हुई तो क्या हुआ तीस मांओं की गोद आपके बेटे ने बचाई है.”

 

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