#HumWapasAayenge : कश्मीरी पंडितों ने अपनी तस्वीरों के साथ लिखी 19 जनवरी की खौफनाक कहानी

ट्विटर पर #HumWapasAayenge ट्रेंड हो रहा है. इसके पीछे 19 जनवरी 1990 की वह काली रात है जब कश्मीरी पंडितों को अपना घर, अपने वतन को छोड़कर भागना पड़ा था.
Kashmiri Pandits on #HumWapasAayenge campagin, #HumWapasAayenge : कश्मीरी पंडितों ने अपनी तस्वीरों के साथ लिखी 19 जनवरी की खौफनाक कहानी

ट्विटर पर #HumWapasAayenge ट्रेंड हो रहा है. इसके पीछे 19 जनवरी 1990 की वह काली रात है जब कश्मीरी पंडितों को अपना घर, अपने वतन छोड़कर भागना पड़ा था. कट्टरपंथी इस्लामिक संगठनों ने कश्मीरी पंडितों के बच्चों को मारा, औरतों का बलात्कार किया और परिवारों को पलायन के लिए मजबूर किया.

उस दौर के दर्द को दिखाने वाली ‘शिकारा’ नाम की एक फिल्म आ रही है. 7 फरवरी को रिलीज होने को तैयार इस फिल्म के लेखक-निर्देशक विधु विनोद चोपड़ा हैं. इस फिल्म के स्क्रीनप्ले लेखक राहुल पंडिता ने 17 जनवरी को फिल्म का एक डायलॉग वीडियो बनाकर ट्वीट किया जिसमें कहा गया है ‘हम आएंगे अपने वतन हाजी साहब…और यहीं पे दिल लगाएंगे, यहीं पे मरेंगे…और यहीं के पानी में हमारी राख बहाई जाएगी.’

इसके बाद ये ट्विटर पर एक मुहिम की तरह चल पड़ा. कई लोगों ने अपनी कहानी इस हैशटैग के साथ शेयर की. पत्रकार आदित्य राज कौल ने अपने परिवार का फोटो पोस्ट करते हुए लिखा है ‘हमारे परिवार की पहली आधिकारिक फोटो जब हमें अपने ही देश में रिफ्यूजी की तरह रजिस्ट्रेशन कराना पड़ा. मेरे माता-पिता और परदादी. जब इस्लामिक जिहादियों ने हमें पूरी तरह से बरबाद कर दिया और हमें जिंदगी की शुरुआत शुरू से करनी पड़ी.’

सुनंदा वशिष्ठ ने अपने बचपन की तस्वीर ट्वीट करते हुए लिखा ‘मेरे पास अपने बचपन की तमाम तस्वीरें नहीं हैं. जिंदगी और फैमिली अलबम के बीच चुनने के कोई विकल्प नहीं रहे. जान बचाने के दौरान फैमिली अलबम पीछे छूट गया. 30 साल हो गए. घर वापस जाने का संकल्प केवल मजबूत हुआ है.’

नम्रता वखलू ने 1991 की एक तस्वीर शेयर करते हुए लिखा है ‘श्रीनगर में मेरा घर और पड़ोस. 1991 की ये फोटो तब की है जब ज्यादातर पड़ोसी कश्मीर छोड़ चुके थे. धीरे-धीरे सब बदल गया.’

अभिनेता अनुपम खेर ने अपने परिवार की तस्वीर ट्वीट करते हुए लिखा ‘यादें साल बीतने के साथ धुंधली हो सकती हैं लेकिन वे एक दिन भी बूढ़ी नहीं होतीं. बाएं से दूसरे, कुर्सी पर बैठे हुए मेरे दादा पंडित अमरनाथ जी. उन्होंने कभी नहीं सोचा होगा कि 19 जनवरी 1990 को उनका पूरा परिवार कश्मीर से निकाल फेंका जाएगा.’

आदित्य राज कौल ने एक टिकट की तस्वीर ट्वीट करते हुए लिखा है ‘ये निर्वासन का टिकट है. 19 जनवरी 1990 को मेरे परिवार ने ये बस का टिकट खरीदा था ताकि वह इस्लामिक आतंक और मस्जिदों से आने वाली धमकियों से बच सकें. आज तीन दशक हो चुके हैं. कोई न्याय नहीं हुआ, बस सच को झुठलाया जा रहा है.’

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