आंखों के सामने आज भी घूमती है बच्ची की फोटो, साबित करती है कठुआ के राक्षसों की दरिंदगी

बंजारा समुदाय की मासूम बच्ची को 10 जनवरी, 2018 को उस समय अगवा कर लिया गया था, जब वह घोड़े चराने के लिए गई थी.

कठुआ में 8 साल की एक बच्ची का गैंगरेप होता है और फिर बहुत ही बेरहमी से उसका कत्ल कर दिया जाता है. यह घटना पिछले साल 17 जनवरी, 2018 को सामने आई थी, जब बच्ची का शव जिले के जंगलों में विभत्स हालत में मिला था.

बंजारा समुदाय की मासूम बच्ची को 10 जनवरी, 2018 को उस समय अगवा कर लिया गया था, जब वह घोड़े चराने के लिए गई थी. आज वो विभत्स तस्वीर मेरी नजरों के सामने आ रही है, जब कश्मीर के मेरे एक दोस्त ने 17 जनवरी की रात करीब साढे दस बजे इस मामले की जानकारी मुझे दी थी.

उसने कहा था कि कोई भी मीडिया में इस खबर को नहीं चला रहा है, क्या तुम कुछ कर सकती हो. मैंने उससे कहा कि पूरी डिटेल दो और उसने मुझे डिटेल के साथ बच्ची की वो तस्वीरें भेजी, जिसमें वो क्रूरता साफ दिखाई दे रही थी, जो उन हैवानों ने बच्ची के साथ की थी.

उन तस्वीरों को देखकर मैं सहम गई थी और इस सोच में डूब गई कि कोई इंसान इतना हैवान कैसे हो सकता है. बच्ची के चेहरे पर दांतों के गहरे जख्म थे. पूरे शरीर पर चोट के गहरे निशान थे.

इन तस्वीरों को देखकर मेरी रुह कांप गई थी. आज भी मेरी नजरों के सामने वो तस्वीरें घूमती हैं जो कि उन राक्षसों की दरिंदगी बयां करती हैं. इससे पहले मैंने कभी भी ऐसी घटना नहीं देखी थी, जिसमें वहशी दरिंदों की हैवानिय साफतौर पर नजर आ रही थी. मैं ऑफिस में नहीं थी पर स्टोरी हमने लगवाई, जिसके बाद अन्य मीडिया हाउस ने इस मामले को उठाया.

इस मामले में एक नाबालिग समेत सात आरोपियों के खिलाफ 15 पन्नों की चार्जशीट दर्ज की गई. दीपक, प्रवेश, सांझी राम, अनंत दत्ता, सुरेंद्र, तिलकराज, विशाल जंगोत्रा के खिलाफ रेप और हत्या को लेकर कई धाराओं में केस दर्ज किया था.

आज कोर्ट ने विशाल जंगोत्रा को छोड़कर सभी को दोषी करार दे दिया है. इन सभी दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा होना जरूरी है, ताकि इससे उन लोगों के अंदर डर पैदा हो जो कि अपनी हवस को मिटाने के लिए मासूम बच्चियों, लड़कियों और महिलाओं को शिकार बनाते हैं. वहीं उस नाबालिग पर भी जल्दी सुनवाई हो, जिसे बच्ची की निर्मम हत्या करने का मुख्य आरोपी बताया जाता है.

क्यों हैं इतनी नफरत

जिस इलाके से बच्ची ताल्लुक रखती थी वह हिंदू बहुल इलाका है और वहां मुस्लिमों की आबादी बहुत कम है. सांझी राम ग्राम प्रधान था. वह और उसके जैसे वहां रहने वाले कई लोग नहीं चाहते थे कि हिंदुओं के साथ मुस्लिम आबादी रहे. वे मुस्लिम आबादी को अपने इलाके से खदेड़ना चाहते थे और उनमें एक डर पैदा करना चाहते थे. आखिर क्यों?

क्यों लोगों में इतनी नफरत फैल रही है? क्यों लोग जाति-धर्म से ऊपर उठकर नहीं सोच पाते? क्या जाति-धर्म इंसानियत से ऊपर हैं? इस मामले को हिंदू-मुस्लिम का रंग देने की राजनेताओं ने खूब कोशिश की. मासूम बच्चियों के हत्यारों को बचाने के लिए इन राजनेताओं के नेतृत्व में तिरंगा यात्रा तक निकाली गई.

वकीलों के एक समूह ने क्राइम ब्रांच को चार्जशीट दर्ज करने से रोका. किस मिट्टी के बने थे ये लोग जिनके सामने विरोध करते समय उस बच्ची का ध्यान नहीं आया, जिसके साथ चार दिनों तक इन राक्षसों ने हैवानियत की.

आज उन राजनेताओं, वकीलों और देश के उन सभी लोगों को शर्म आनी चाहिए, जो कि बच्ची के साथ राक्षसों जैसी दरिंदगी करने वालों के समर्थन में खुलकर सामने आए थे.

हिंदू-मुसलमान, ऊंची जाति-नीची जाती करके हम आने वाली पीढ़ी को क्या सीख दे रहे हैं. जब हम छोटे थे, तब हमने कभी नहीं किया कि हम हिंदू हैं और तुम मुसलमान. ऊंची-नीची जाति का फर्क नहीं किया, लेकिन आज छोटा बच्चा भी हिंदू-मुसलमान करता है.

स्कूल, कॉलेजों और घरों में बच्चा-बच्चा जानता है कि देश में हिंदू-मुसलमान हो रहा है. क्यों हम आने वाली पीढ़ी के लिए एक ऐसा माहौल दे रहे हैं जो कि आने वाले समय में उन्हीं के लिए खराब होगा. लोगों को इस सबसे ऊपर उठकर सोचने की जरूरत है, क्योंकि अगर हम आज नहीं बदले तो यह हमें ही नुकसान देगा.