कृषि बिल: किसानों के हित में या विरोध में ? समझिए कृषि विशेषज्ञ डॉक्टर अशोक गुलाटी से

भारत सरकार का कहना है कि ये कानून किसानों का काम आसान करेंगे. किसानों को मंडियों के बाहर अपनी फसल बेचने की आज़ादी होगी. जानिए क्या कहते हैं एक्सपर्ट अशोक गुलाटी..

भारत में कृषि से जुड़े तीन कानूनों को लेकर राजनीतिक बवाल मचा हुआ है. विपक्षी पार्टियां विशेषकर पंजाब और हरियाणा में कई किसान संगठन इनका विरोध कर रहे हैं. सरकार कृषि से जुड़ी तमाम परेशानियों को दूर करने के उद्देश्य से ये कानून लाई है. केंद्र का कहना है कि ये कानून किसानों का काम आसान करेंगे. किसानों को मंडियों के बाहर अपनी फसल बेचने की आज़ादी होगी. किसान प्राइवेट कॉन्ट्रैक्ट के ज़रिए पहले ही अपनी फसल बेच सकेंगे.

वहीं दूसरी ओर किसानों को ये भी डर है कि इन विधेयकों के कानून बन जाने से मिनिमम सपोर्ट प्राइस (MSP) को खत्म करने का रास्ता खुल जाएगा और किसान बड़ी प्राइवेट कंपनियों के रहमो-करम पर आश्रित हो जाएंगे. विरोधी किसानों का कहना है कि भारत सरकार इन कानूनों के ज़रिए कॉर्पोरेट्स को फायदा पहुंचाने की कोशिश कर रही है.

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इस पूरे मामले पर जाने माने कृषि विशेषज्ञ और अर्थशास्त्री डॉ अशोक गुलाटी से TV9 भारतवर्ष ने खास बातचीत की. डॉक्टर अशोक गुलाटी कमीशन फॉर एग्रीकल्चर कॉस्ट एन्ड प्राइसेज़ के अध्यक्ष भी रहे हैं.

सवाल- आप कृषि क्षेत्र में बदलावों पर लिखते रहे हैं, केंद्र सरकार जो तीन बदलावों को लेकर कानून ला रही है उस पर आपकी क्या राय है?

जवाब- ये ऐतिहासिक कदम है. ये कदम 20 साल पहले लेना चाहिए था. देर ही से सही, इससे किसान और उपभोक्ताओं दोनों का फायदा होगा. मार्केटिंग लागत और बिचौलियों की लागत कम होगी, प्रतियोगिता बढ़ेगी और कृषि क्षेत्र में फायदा होगा.

सवाल- अगर इन कानूनों से फायदा ही होने वाला है तो इनका विरोध क्यों हो रहा है?

जवाब- इसमें दो चीज़ें हैं एक अर्थशास्त्र से जुड़ा हुआ और दूसरा है राजनीति. गलत जानकारी को लेकर कैंपेन चलाया गया है कि इससे मंडी सिस्टम और एमएसपी खत्म हो जाएगी. ये अध्यादेश में कहीं नहीं है और न सरकार ने ऐसा कुछ कहा है. 2019 में कांग्रेस ने खुद इस तरह के बदलावों की घोषणा की थी.

सवाल- क्या इन कानूनों से किसानों में बंटवारा हो जाएगा, एक वो जो कानून से प्रेरित होकर मंडी से बाहर फसल बेंचेगे और दूसरे वो जो एमएसपी पर ही फसल बेचेंगे?

जवाब- ऐसा बिल्कुल नहीं है, एमएसपी का सिस्टम 1965 में शुरू हुआ. उस वक्त देश में अन्न की बहुत कमी थी. आज वो स्थिति नहीं है. एनएसएसओ का सर्वे कहता है कि केवल 6 फीसदी किसानों को इसका फायदा हुआ है. बाकी किसान कहां पर फसल बेचते हैं इसका किसी को पता नहीं. एक असंगठित क्षेत्र में भी किसान फसल बेचते हैं वो एमएसपी पर नहीं. एमएसपी सिर्फ चार से पांच स्टेट में किसानों को मिल पाता है.

सवाल- कहा जा रहा है कि इससे सबसे बड़ा झटका मंडियों को लगेगा, आड़तियों की मनमानी नहीं चलेगी, एपीएमसी की मंडियां कैसे काम करती हैं?

जवाब- एपीएमसी मंडी सरकारी ज़मीन पर होती हैं. सरकार एक कृषि आधारित मार्केटिंग कमेटी बनाती है. वहां लाइसेंस ट्रेडिंग कमीशन एजेंट्स के ज़रिए हो सकती है. इन मंडियों में किसान खुद नहीं कमीशन एजेंट के ज़रिए फसल बेच सकता है. कमीशन एजेट 2.5 फीसदी तक कमीशन ले लेता है. अन्य खर्चे मिलाकर 8.5 फीसदी तक अतिरिक्त कीमत बाद में बढ़ जाती है.

सवाल- राज्य सरकारों का आरोप है कि मंडियों में अनाज कम पहुंचेगा तो टैक्स में कमी आएगी और रिवेन्यू घटेगा.

जवाब- बिल्कुल सही बात है, हालांकि इसमें अभी समय लगेगा. राज्य सरकारें एमएसपी के ऊपर करीब 8 फीसदी टैक्स लगाती हैं, जिसमें 2.5 फीसदी ट्रेडिंग एजेंट्स का कमीशन शामिल होता है.

सवाल- कहा जाता है कि एपीएमसी मंडी सिस्टम ब्लैक मनी को व्हाइट करने का ज़रिया है, इस बात में कितनी सच्चाई है?

जवाब- इसका कोई सबूत नहीं है, वो जांच का काम है. मुझे ये पता है कि जो टैक्स है वो सीएजी के एडिट में भी नहीं आता है. इस पर सरकार जांच करे.

सवाल- विपक्ष के नेता विरोध में ज़ोर-शोर से लगे हैं, नेताओं को किसानों से मुहब्बत है? मंडियों से मुहब्बत है? या उनके खुद के हित इसमें शामिल है.

जवाब- ये इंटर स्टेट और केंद्र का विषय है, इसका फायदा केंद्र सरकार ने उठाया है. वाजपेयी सरकार ने रिफॉर्म्स की बात कही थी. उसके बाद कांग्रेस ने भी इस तरह के बदलाव की बात कही थी. हालांकि ये बदलाव पूरे देश में शामिल नहीं हो पाए. कांग्रेस चाहती तो इसका फायदा ले सकती थी. ये कहकर कि मोदी सरकार हमारे घोषणा पत्र को लागू कर रही है, लेकिन कांग्रेस खुद इसका विरोध कर रही है.

सवाल- कृषि क्षेत्र की आय कुल जीडीपी का करीब 8 फीसदी होता है, इसकी वज़ह से भी क्या अन्य ट्रेडर्स इसका विरोध कर रहे हैं?

जवाब- कृषि क्षेत्र की आय पर आयकर में छूट मिलती है, उसकी दो वज़हें थीं, एक किसान की आय कम है, और उसकी आय निकालना बहुत मुश्किल काम है. इस वज़ह से छूट दी गई थी. इसमें कई लोग बहुत फायदा उठा रहे हैं, कुछ बेनामी संपत्ति के ज़रिए. दूसरे सेक्टर का काम दिखाकर इनकम टैक्स का बचाव किया जाता है. इस वज़ह से ब्लैक मनी भी बनाई जा रही है.

सवाल- एक बार जब मंडी सिस्टम खत्म हो जाएगा तो क्या मल्टीनेशनल कंपनियां फसलों की कीमत में बड़ा बदलाव कर सकती हैं?

जवाब- सरकार की संस्था इसके खिलाफ एक्शन ले सकती है. इसको लेकर सिर्फ डर बनाया जा रहा है.

सवाल- इससे क्या भारत की फूड सिक्योरिटी प्रभावित हो सकती है, इससे FCA का क्या रोल रहा है?

जवाब- मुझे इससे 10 फायदे दिखते हैं. इससे हिंदुस्तान की खेती में प्रतियोगिता बढ़ेगी, नई तकनीक आएगी, बीज और खाद कंपनियां किसानों से करार करेंगी. बेहतर कीमतों के साथ ही गुणवत्ता में भी सुधार होगा. फूड सेफ्टी में भी सुधार होगा, हालांक ये आदर्श व्यवस्था नहीं है. इसमें भी कुछ कमियां हैं जिनमें सुधार किया जा सकता है. दिशा ठीक है, इसके लिए सरकार सराहना की ज़रूरत है.

सवाल- इन तीन बदलावों के लिए सरकार को कितने नंबर देंगे?

जवाब- सरकार ने जो दिशा तय की है उसमें इसे दस में से नौ नंबर मिलने चाहिए. कुछ और चीज़ें हैं उसमें सुधार किया जा सकता है. मंडी सिस्टम अगले 20 साल तक चलेगा. अगर वो बेहतर व्यवस्था देंगे तो खत्म नहीं होगा. किसानों को बेहतर दाम मिल सकेगा.

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