92 साल के पूर्व अटॉर्नी जनरल SC में रामलला की कर रहे हैं पैरोकारी, जानिए के. परासरन क्यों हैं खास?

हिंदू विद्वान और सरकारी वकील के परासरन 1970 से लेकर अब तक कई सराकरों के विश्वसनीय रहे हैं.

नई दिल्ली: पिछले सप्ताह मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता में सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने अयोध्या विवाद मामले में पक्षकार वकील ‘रामलला विराजमान’ के सामने असमान्य प्रस्ताव रखा. कोर्ट ने पूछा कि वो बैठ कर भी ज़िरह कर सकते हैं?

जिसके जवाब में वकील ने कहा, ‘नहीं ठीक है. आप बहुत दयालु हैं. कोर्ट की परंपरा रही है कि खड़े होकर ही ज़िरह किया जाए और मेरी चिंता परंपरा को लेकर ही है.’

‘रामलला विराजमान’ की ओर से पूर्व अटार्नी जनरल के परासरन ने कहा कि राम जन्मभूमि खुद ही मूर्ति का आदर्श बन चुकी है और यह हिन्दुओं की उपासना का प्रयोजन है. परासरन ने संविधान पीठ से सवाल किया कि इतनी सदियों बाद भगवान राम के जन्म स्थल का सबूत कैसे पेश किया जा सकता है.

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सितंबर, 2010 के फैसले के खिलाफ दायर अपीलों पर सुनवाई कर रही संविधान पीठ के अन्य सदस्यों में न्यायमूर्ति एस ए बोबडे, न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चन्द्रचूड, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर शामिल हैं.

परासरन ने पीठ से कहा, ‘वाल्मीकि रामायण में तीन स्थानों पर इस बात का उल्लेख है कि अयोध्या में भगवान राम का जन्म हुआ था.’ उन्होंने कहा, ‘इतनी सदियों के बाद हम यह कैसे साबित कर सकते हैं कि इसी स्थान पर भगवान राम का जन्म हुआ था.’

इस पर पीठ ने उनसे सवाल किया कि क्या इस तरह के किसी धार्मिक व्यक्तित्व के जन्म के बारे में पहले कभी किसी अदालत में इस तरह का सवाल उठा था. पीठ ने पूछा, ‘क्या बेथलेहम में ईसा मसीह के जन्म जैसा विषय दुनिया की किसी अदालत में उठा और उस पर विचार किया गया.’

इस पर परासरन ने कहा कि वह इसका अध्ययन करके न्यायालय को सूचित करेंगे. इससे पहले, न्यायालय ने इस विवाद में सुनवाई के दौरान निर्मोही अखाड़े से जानना चाहा कि विवादित स्थल पर अपना कब्जा साबित करने के लिये क्या उसके पास कोई राजस्व रिकार्ड और मौखिक साक्ष्य है.

साल 2016 के बाद से के परासर कोर्ट में कभी-खबार ही उपस्थित होतें हैं. लेकिन दो बड़े मामलों में वरिष्ठ अधिवक्ता और दो बार के पूर्व अटॉर्नी जनरल ऑफ़ इंडिया को चेन्नई से दिल्ली आना पड़ा. पहले सबरीमाला केस और अब अयोध्या विवाद.

हिंदू विद्वान और सरकारी वकील के परासरन 1970 से लेकर अब तक कई सराकरों के विश्वसनीय रहे हैं. कोर्ट रूम में उनके द्वारा दिया गया भाषण हिंदू शास्त्र पर लेक्टर जैसा है. मद्रास हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश संजय किशन कौल के पराशर को ‘पितामह ऑफ़ इंडिया बार’ बुलाते थे जिन्होंने धर्म से बिना समझौता किए क़ानून के लिए अमूल्य योगदान दिया.

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