यूरोप को भारत की समुद्री राह दिखाने की मुहिम के 523 साल, पढ़ें- वास्को डी गामा के सफर की पूरी डिटेल

कोलंबस (Christopher Columbus) की यात्रा के करीब 5 साल बाद पुर्तगाल के नाविक वास्को डी गामा (Vasco Da Gama) भारत का समुद्री मार्ग खोजने निकले. सफर का दिन पुर्तगाल के शाही ज्योतिषयों ने बड़ी सावधानी से चुना था. गामा 170 नाविकों और चार जहाजों के एक बेड़े के साथ लिस्बन से निकले थे.

भारत का रास्ता खोजनेवाला वास्को डि गामा

आज से 523 साल पहले सन 1497 में 8 जुलाई (शनिवार) को पुर्तगाली नाविक वास्को डी गामा अपने जहाज से रवाना हुए और समुद्र के रास्ते भारत की यात्रा करने वाले पहले यूरोपीय बने. इसे भारत को खोजने जैसे हास्यास्पद तथ्यों की तरह पेश किया गया. हालांकि बाद में यह साफ हो गया कि वास्को डी गामा ने यूरोप को पहली बार भारत तक पहुंचने का समुद्री मार्ग बताया था. भारत की खोज नहीं की थी.

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भारत की राह तलाशने की कारोबारी वजह

दरअसल, भारत पहले यूरोप के देशों के लिए एक पहेली जैसा था. यूरोप तब अरब के देशों से मसाले और मिर्च वगैरह खरीदता था. अरब देश के कारोबारी उसे यह नहीं बताते थे कि मसाले कहां उपजाते हैं या कहां से लाते हैं. यूरोप के बड़े व्यापारी इस बात को समझ चुके थे कि अरब कारोबारी उनसे जरूर कुछ छुपा रहे हैं. यूरोप वाले अरब के उस पार पूर्वी देशों से ज्यादा परिचित भी नहीं थे. इसलिए कारोबारी बुद्धि से प्रेरित होकर ही इटली के नाविक क्रिस्टोफर कोलंबस उस देश का समुद्री रास्ता ढुंढने निकले जिसको उनके यहां कोई नहीं जानता था. जिसके बारे में सिर्फ सुना था.

रंग लाई कोलंबस और गामा की मुहिम

अटलांटिक महासागर में कोलंबस भम्रित हो गए और अमेरिका की तरफ पहुंच गए. उसे लगा कि अमेरिका ही भारत है. इसी कारण वहां के मूल निवासियों को रेड इंडियंस के नाम से जाना जाने लगा. कोलंबस की यात्रा के करीब 5 साल बाद पुर्तगाल के नाविक वास्को डी गामा भारत का समुद्री मार्ग खोजने निकले. सफर का दिन पुर्तगाल के शाही ज्योतिषयों ने बड़ी सावधानी से चुना था. गामा 170 नाविकों और चार जहाजों के एक बेड़े के साथ लिस्बन से निकले थे. उनके साथ तीन दुभाषिए भी थे जिसमें से दो अरबी बोलने वाले और एक कई बंटू बोलियों का जानकार था. बेड़े में वे अपने साथ एक पेड्राओ (पाषाण स्तंभ) भी ले गए थे जिसके माध्यम से वह अपनी खोज और जीती गई भूमि को चिन्हित करता था. इसके साथ जहाज पर तोप भी रखे गए थे.

केरल में कालीकट पहुंचे वास्को डी गामा

गामा ने समुद्र के रास्ते कालीकट पहुंचकर यूरोपवासियों के लिये भारत पहुंचने का एक नया मार्ग खोज लिया. केन्या के तटीय शहर मालिंदी से एक गुजराती मुसलमान व्यापारी जो हिंद महासागर से काफी परिचित था ने गामा की मदद की थी. कालीकट या ‘कोलिकोड’ केरल राज्य का एक शहर और बंदरगाह है. 12 हजार मील का सफर कर 20 मई 1498 को वास्को डी गामा कालीकट तट पहुंचे. वहां के राजा से कारोबार के लिए इजाजत ली. 3 महीने वहां रहने के बाद पुर्तगाल लौट गए. फिर वह भारत आते-जाते रहे. साल 1499 में भारत पहुंचने के लिए रास्ते की खोज की यह खबर फैल गई.

यूरोप के लिए क्यों मुश्किल थी भारत की राह

भारत के एक ओर हिमालय की ऐसी शृंखलाएं हैं जिसे पार करना उस दौर में असंभव था. वहीं तीन ओर से भारत को समुद्र ने घेर रखा था. ऐसे में यूरोप वासियों के लिए भारत पहुंचने के तीन रास्ते थे. पहला रूस पार करके चीन होते हुए बर्मा वाला लंबा और जोखिम भरा रास्ता. दूसरा अरब और ईरान को पार करके आना. इस रास्ते का इस्तेमाल अरब के कारोबारी करते थे. वे किसी दूसरे को ईधर आने नहीं देते थे. तीसरा और आखिरी रास्ता समुद्र का ही था. इस रास्ते में प्रकृति के अलावा तब कोई और चुनौती नहीं थी. इसलिए यूरोप वालों ने इसे चुना.

यूरोप को भारत का समुद्री मार्ग मिलने पर क्या हुआ

वास्को डी गामा की मेहनत के बाद यूरोप के लुटेरों, शासकों और व्यापारियों के लिए भारत पहुंचने का समुद्री रास्ता मिल गया. भारत पर कब्जा जमाने, व्यापार करने और लूटने की लगातार कोशिश होती रही. इसके साथ ही ईसाइयत के प्रचारक भी बड़ी संख्या में ईधर आने लगे. उन्होंने भारत के खासकर केरल राज्य के लोगों का धर्म बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

वास्को डी गामा के वापस पहुंचने के छह महीने बीतते ही पेद्रो अल्वारेज़ काबराल के नेतृत्व में दूसरा पुर्तगाली बेड़ा हिंदुस्तान की ओर रवाना हुआ. उस में 13 जहाज़ शामिल थे. उसकी तैयारी व्यापारिक अभियान से ज़्यादा जंगी कार्रवाई की थी. पुर्तगालियों के बाद डच और ब्रिटिश ने भी भारत की राह पकड़ी. सूरत में ईस्ट इंडिया कंपनी आने के 9-10 साल बाद 1615 में यह क्षेत्र ब्रिटिश अधिकार में आने लग गया. 1698 में भारत के अंदर फ्रांसीसी बस्तियां बसने लगी. फ्रांस और ब्रिटेन के बीच के युद्ध के दौरान यहां भी बड़े बदलाव सामने आए.

क्यों हुआ था वास्को डी गामा का चयन

दरअसल, साल 1492 में नाविक प्रिंस हेनरी की नीति का अनुसरण करते हुए किंग जॉन ने एक पुर्तगाली बेड़े को भारत भेजने की योजना बनाई थी. इससे उन्हें एशिया के लिए समुद्री रास्ते खुलने की उम्मीद थी. उनकी योजना मुसलमानों खासकर अरबी कारोबारियों को पछाड़ने की थी. उस समय भारत और अन्य पूर्वी देशों के साथ व्यापार पर अरब और मध्य पूर्व देशों का लगभग एकाधिकार था. पहले एस्टावोडिगामा को इस अभियान की अगुवाई के लिए चुना गया. उनकी अचानक मौत के बाद वास्को द गामा को इस मुहिम की कमान सौंपी गई.

भारत में ही मौत, केरल का एक हिस्सा मानता है विलेन

यूरोप से वास्को डी गामा केप ऑफ गुड होप, अफ्रीका के दक्षिणी कोने से होते हुए भारत तक पहुंचे थे. साल 1503 में गामा हमेशा के लिए पुर्तगाल लौट गए. बीस साल वहां रहने के बाद वह फिर भारत वापस चले आए. 24 मई 1524 को उनकी मौत हो गई. लिस्बन में वास्को के नाम का एक स्मारक है, इसी जगह से उन्होंने भारत की यात्रा शुरू की थी. गोवा के पुर्तगाली आबादी वाले इलाके में भी एक जगह है जिसे वास्को डी गामा के नाम से जाना जाता है.

बताया जाता है कि चांद के एक गढ्ढे का और पुर्तगाल में कई सड़कों का नाम वास्को के नाम पर रखा गया है. साल 2011 में संतोष शिवन के डाइरेक्शन में बनी मलयालम फिल्म उरुमि में उसको एक खलनायक की तरह दिखाया गया है.

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