बोडोलैंड की मांग का हुआ अंत…. जानें चार दशक के हिंसक आंदोलन की पूरी कहानी

चौथा समझौता NDFB से हुआ है, जिसके बाद लाखों लोगों को विस्थापित करने और हजारों की जान लेने वाले इस हिंसक आंदोलन का अंत हुआ.
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प्रतिबंधित उग्रवादी संगठन नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड (NDFB) के साथ केंद्र सरकार ने समझौते पर हस्ताक्षर कर पूर्वोत्तर की एक अहम समस्या को सुलझा दिया है. अब यह संगठन अलग राज्य या केंद्र शासित राज्य की मांग नहीं करेगा. इस समझौते के तहत NDFB के 1550 लोग 30 जनवरी को 130 हथियारों के साथ सरेंडर करेंगे.

दरअसल पूर्वोत्तर के राज्यों में कई अलग और नए राज्यों के गठन को लेकर आंदोलन चल रहे हैं. इन्हीं में से एक है बोडोलैंड की मांग, जो कि तमाम राज्यों की मांग में सबसे पुरानी है. चार दशकों से ज्यादा समय से पूर्वोत्तर की बोडो जनजाति यह मांग कर रही है.

बोडोलैंड में आता है असम का ये इलाका

बोडो जनजाति असम के चार जिलों में बहुसंख्यक है और इसी राज्य से काट कर अलग राज्य की मांग कर रही है. इस आंदोलन के तहत असम के कुछ जिलों से काटकर एक अलग राज्य की मांग की जा रही थी. उत्तर, मध्य और पश्चिम असम के चार जिलों को मिलाकर प्रस्तावित बोडोलैंड बनता है. बोडोलैंड राज्य में असम के कोकराझार, बारपेटा, मंगलदोई विधानसभा का क्षेत्र आता है.

बोडो जनजाति की बहुलता वाले इन चार जिलो को प्रशासन की एक स्वायत्त परिषद देखती थी. हालांकि इस जनजाति की मांग थी कि इन चार जिलों के अलावा अन्य बोडो इलाकों को मिलाकर नए बोडो राज्य का गठन किया जाए. अब ये मसला सुलझा लिया गया है और बोडो आंदोलन के प्रमुख NDFB ने केंद्र सरकार से ये मांग न करने को लेकर समझौता किया है.

क्यों की गई बोडोलैंड की मांग

ब्रह्मपुत्र नदी के उत्तरी हिस्से में बसने वाली बोडो जनजाति खुद को असम का मूल निवासी मानती है. आंकड़ो में देखा जाए तो ये जनजाति असम की आबादी का कुल 28 फीसद हैं. बोडो जनजाति आरोप लगाती है कि दूसरी संस्कृतियां और अलग पहचान वाले समुदाय असम में इस जनजाति की जमीन पर कब्जा कर रहे हैं.

बोडो जनजातियों का मानना था कि अलग संस्कृति वाले लोगों के इस कब्जे के चलते ये जनजाति अपने ही घर में अल्पसंख्य होते जा रही थी. इस आंदोलन के बढ़ने का एक प्रमुख कारण बांग्लादेश घुसपैठ को भी माना जाता है. बांग्लादेश से हो रही घुसपैठ के चलते भी इस जनजाति की जनसंख्या का संतुलन बिगड़ा है. ऐसे में इस जनजाति का असंतोष और भी बढ़ने लगा.

अलग बोडोलैंड की मांग इस जनजाति के कई संगठनों ने की. सरकार द्वारा तवज्जो न मिलने पर कई संगठनों ने हथियार उठा लिए. उग्रवाद के चरम दौर में नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड (NDFB) का गठन हुआ. इस संगठन में बोडो समुदाय के युवकों ने हिस्सा लिया और हथियार के बूते अपनी मांग सामने रखी.

अब तक हुए चार समझौते

बोडोलैंड आंदोलन को लेकर होने वाली हिंसक झड़पों पर लगाम के लिए सरकार ने बोडो संगठनों से समझौते शुरू किए. पहला समझौता ऑल बोडो स्टूडेंट्स यूनियन (ABSU) के साथ 1993 में हुआ. इस समझौते के तहत बोडोलैंड ऑटोनॉमस काउंसिल (BAC) बनाई गई, जिसे कुछ सीमित राजनीतिक शक्तियां दी गईं.

दूसरा समझौता साल 2003 में बोडो लिब्रेशन टाइगर्स के साथ हुआ. इस समझौते के बाद बोडोलैंड टेरिटोरियल काउंसिल (BTC) का गठन हुआ. BTC में असम के चार जिले कोकराझार, चिरांग, बस्का और उदलगुरी को शामिल किया गया. इसी इलाके को बाद में बोडोलैंड टेरिटोरियल एरिया डिस्ट्रिक्ट कहा जाने लगा.

चौथा समझौता NDFB से हुआ है, जिसके बाद लाखों लोगों को विस्थापित करने और हजारों की जान लेने वाले इस हिंसक आंदोलन का अंत हुआ. इस मांग को खत्म करने पर केंद्र सरकार ने बोडो आदिवासियों को आर्थिक और राजनीतिक पैकेज देने की घोषणा की है. समझौते के बाद बोडोलैंड टेरिटोरियल एरिया डिस्ट्रिक्ट (BTAD) को न ही अलग केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा दिया जाएगा और न ही इसमें कोई नया क्षेत्र शामिल किया जाएगा. हिंसक आंदोलन के खत्म होने के बाद अब असम में स्थिरता, शांति और समृद्धि के नए दौर की शुरुआत हो सकेगी.

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