सुनो मिडिल क्लास वालों सुनो…दीपिका पादुकोण भी ‘माल’ मांगती है!

कमाल की बात है. सुना नहीं आपने? दीपिका पादुकोण (Deepika Padukone) भी ‘माल’ बोलती है. ‘माल’ की डिमांड करती है. अब से आपको ‘माल’ बोलते हुए झेंपने की जरूरत नहीं. खुलकर बोलिए. धड़ल्ले से बोलिए. ‘माल’ अब बेमिसाल है.

deepika padukone
(PS- Instagram@deepikapadukone)

(ध्यान रहे: आगे आपका सामना जिस लेख से होने जा रहा है वह कोरी गप्पबाजी के सिवा कुछ भी नहीं है. प्रस्तुत लेख में कही गई बातें अमल योग्य नहीं हैं. इनसे प्रेरणा लेकर अगर आपको NCB, CBI या ED के चक्कर लगाने पड़े, तो इसके लिए लेखक जिम्मेदार नहीं होगा. हां, स्थानीय पुलिस में मामला फंसा, तो उन्हें सेट करने की कोशिश जरूर की जा सकती है. बशर्ते कि वे पहले से दूसरी साइड से सेट न हों. धन्यवाद.)

कमाल की बात है. सुना नहीं आपने? दीपिका पादुकोण (Deepika Padukone) भी ‘माल’ बोलती है. ‘माल’ की डिमांड करती है. हद हो गई. सारा भी दम मारने में यकीन रखती है. बाप रे बाप. न श्रद्धा पीछे है, न रिया और न रकुलप्रीत. भाइयों खुशखबरी. अब ‘माल’ हम मिडिल क्लास लोगों का डाउनमार्केट शब्द नहीं रहा. दीपिका (Deepika Padukone) के मुंह से निकलकर अपमार्केट हो गया. अब से आपको ‘माल’ बोलते हुए झेंपने की जरूरत नहीं. खुलकर बोलिए. धड़ल्ले से बोलिए. ‘माल’ अब बेमिसाल है.

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बात फिल्मी लोगों की है, तो शोले फिल्म का हर सीन आपको याद होगा. ‘वीरू’ के रिश्ते के लिए ‘जय’ और ‘मौसी’ का संवाद भी आपको जरूर याद होगा. ‘मौसी’ के सामने ‘जय’ कबूल करता है कि उसका दोस्त ‘वीरु’ शराबी है, जुआरी है और गाहे-ब-गाहे ‘नाचने वाली’ के पास भी चला जाता है. फिर भी वह ‘वीरू’ को बड़ा नेक इंसान मानता है. 1975 में आई इस फिल्म ने बेड़ा गर्क कर रखा था. 45 साल से लड़कों में अपराध बोध भर रखा था. ‘वीरु’ सरीखा कोई भी कर्म करते हुए खुद के अंदर छिछोरेपन का भाव बार-बार उमड़ता-घुमड़ता था. मन सवाल भी करता था. शादी के लिए लड़कों के ही चरित्र प्रमाण पत्र की मांग क्यों? लेकिन कोई जवाब नहीं मिलता था.

अब लड़के की मौसी भी पूछेंगी सवाल

अब ऐसा नहीं होगा. अब लड़के वालों की ‘मौसी’ भी पूछेगी. लड़की ‘माल’ तो नहीं मांगती ना? लड़की को ‘हैश’ तो पसंद नहीं है ना? लड़की ‘वीड’ से काम चलाती है या कुछ और लेती है? ऐसे कई सवाल वर पक्ष भी पूछ पाएगा. ये हुई ना ‘लेवल प्लेइंग फील्ड’ वाली बात!

‘वीरू’ लोअर मिडिल क्लास का लड़का था. ‘नाचने वाली’ के पास जाता था. बसंती को पाने के लिए छल-प्रपंच रचता था. लौंडा बड़ा ही छिछोरा नजर आता था. अब टेंशन खत्म हो गई है. हमाम में अब सब छिछोरे हैं. आलीशान महानुभावों ने घर-दफ्तर पर ही ‘नाचने वालियों’ की तलाश शुरू कर दी. बकौल आरोप- एक के मना करने पर खुद अपनी प्रतिभा का इजहार ये कहकर किया कि उनके लिए तो 200 नाचने वालियां तैयार हैं. मिडिल क्लास के ‘वीरु’ का ये चरित्र चित्रण तो उसके दोस्त ‘जय’ ने किया था. इन्होंने तो खुद हलफनामा दे दिया. ऐसा कर इन सेलिब्रिटी लोगों ने लोअर मिडिल क्लास पर बड़ी मेहरबानी की है. छिछोरेपन को रातों रात अपमार्केट बना दिया.

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वैसे तो इन फिल्मी छोरियों की क्षमताओं और प्रतिभाओं पर पहले से ही कोई शक नहीं था. लेकिन इन कन्याओं ने अब दूसरी फील्ड में भी शक की कोई गुंजाइश ही नहीं छोड़ी है. दीपिका, सारा, श्रद्धा, रकुलप्रीत, रिया. न जाने और कौन-कौन? अब कौन कहेगा कि छोरियां…छोरों से कम हैं? तो लगाइए जयकारा- ‘म्हारी छोरियां छोरों से कम हैं के.

गंजेड़ी-नशेड़ी अब तक पुरुषों के लिए प्रयुक्त होने वाले विशेषण थे. अब इन विशेषणों का दायरा भी बढ़ जाएगा. बॉलीवुड की नशेबाज बालाओं का ये योगदान इतिहास याद रखेगा. सास-बहू-ननद के झगड़े वैसे तो बड़े घरों की भी कहानी रहे हैं. लेकिन ज्यादातर इसके लिए बदनाम मिडिल और लोअर मिडिल क्लास ही होता रहा है. रिया ने साबित किया कि सेलिब्रिटी भी ननद और ससुर को ठेंगे पर रखने का माद्दा और जज्बा रखते हैं. सास-बहु टाइप साजिश पर अब गरीबों और मिडिल क्लास का ही एकाधिकार नहीं होगा.

कलाकार कितने ईनामदार हैं!

पहली बार जाना कि हमारे कलाकार कितने ईमानदार हैं! पर्दे पर जो दिखाते और बताते हैं, उसे जीवन में भी बखूबी उतारते हैं. पर्दे पर ‘उड़ता पंजाब’ दिखाते हैं. जीवन में ‘उड़ता बॉलीवुड’ वैसे ही उतार लेते हैं. पर्दे पर नेताओं और माफिया की गैंगबाजी और ग्रुपबाजी दिखाते हैं, असल जीवन में भी यही करते हैं. जिसे अपग्रेडेड भाषा में नेपोटिज्म कहते हैं. पर्दे पर करप्ट पुलिस को दिखाते हैं. करप्ट पुलिस पैसे वालों के हाथों कैसे सेट होती है, यह बताते हैं. खुद फंसते हैं, तो अडवांस में सेट हुई पड़ी मुंबई पुलिस हू-ब-हू उसी चरित्र में दिखती है, जिसमें ये फिल्म वाले पर्दे पर पुलिस का चरित्र चित्रण करते हैं. वाह भाई वाह.

पर्दे पर हीरो अन्याय के खिलाफ गुंडों से लड़ता है. खुद को बर्बाद कर लेता है, लेकिन न्याय का झंडा थामे रहता है. बड़ी ग्लानि होती थी. काश, हम भी ऐसे होते. किसी के लिए हीरोगीरी कर पाते. सच के लिए गांधीगीरी करने का आत्मबल जुटा पाते. ताजा बॉलीवुड कांड ने इस मोर्चे पर भी हम मिडिल क्लास को अपराधमुक्त कर दिया. पर्दा उठा तो सबकुछ बेपर्दा हो गया. दूसरों के लिए मर-मिटने की तो छोड़िए जनाब ये सेलिब्रिटी बिरादरी तो अपने ही कुनबे के लिए बेवफा निकली.

जिसे चुप रहने में भलाई लग रही है वह मौन है, जिसे बोलने में लाभ है वह बोले ही जा रहा है. चुप्पी के पीछे भी सिर्फ स्वार्थ है, बोलने के पीछे भी अपना उल्लू सीधा करने की जुगाड़ है. अपने सितारों का धन्यवाद है. आप भी हमारे जैसे हैं, ये जानकर अब हम बिल्कुल भी नहीं परेशान हैं. आपका आभार है…आभार है…आभार है.

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