Ayodhya Case: मुस्लिम पक्ष की दलीलों पर बोले जज- आप कह रहे हैं कि ज़मीन अपने आप में एक मस्जिद है?

अयोध्या मामले पर सोमवार को आज 33वें दिन की सुनवाई शुरू हो गयी. आइये जानते हैं कौन पक्ष क्या दे रहा है कोर्ट में दलील....

अयोध्या मामले में सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने 34वें दिन की सुनवाई पूरी कर ली. कल निर्मोही अखाड़ा परिषद दलीलें पेश करेगा. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर साफ किया कि सभी पक्ष समय से अपनी दलीलों को पूरा कर लें. हिंदू पक्षकारों को कहा गया कि वो गुरुवार को अपना जवाब किसी भी हाल में पूरा कर लें. उसके बाद शुक्रवार को सुन्नी सेन्ट्रल वक्फ.बोर्ड की तरफ से राजीव धवन अपनी दलील रखेंगे और उसी दिन पूरा भी करेंगे.

हिंदू पक्ष से जन्मभूमि पुनरोद्धार समिति के वकील पीएन मिश्रा ने कोर्ट से और समय की मांग की तो मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि हमारे पास समय नहीं है. आप वो चीज मांग रहे हैं, जो हमारे पास है ही नहीं. आइये जानते हैं आज किस पक्ष ने क्या दी कोर्ट में दलील.

  • मुस्लिम पक्ष के वकील की रोचक दलील निर्मोही का मतलब होता है मोह का अभाव और बैरागी का मतलब वैराग्य होता है. फिर भी ये लोग जमीन पर कब्जे की मांग पर अड़े हुए हैं!

    निज़ाम पाशा की दलील – ‘निर्मोही का अर्थ है मोह का अभाव. निर्मोही अखाड़े को संपत्ति कोई लगाव नहीं होना चाहिए. लेकिन वे अभी भी दावा करते हैं इसलिए बहस धार्मिक पहलुओं पर आधारित नहीं होना चाहिए बल्कि कानूनी पहलुओं पर निर्भर होना चाहिए.

    निज़ाम पाशा की दलील – बाबरी मस्जिद वैध मस्जिद थी या नहीं, वहां वजू करने की व्यवस्था थी या नहीं इसे इस्लाम के सिद्धांतों पर परखने की जरूरत नहीं है.
    यह देखे जाने की जरूरत है कि वहां के लोग इसे मस्जिद मानते थे या नहीं.

    मीडिएशन को लेकर एक वकील ने कहा कि तमाम रिपोर्ट चल रही हैं. राम लला विराजमान ने कहा हम किसी से मीडिएशन नहीं कर रहे. कोर्ट ने फिर कहा कि अगर जरूरत पड़ी तो हम शनिवार को सुनवाई करेंगे.

    निज़ाम पाशा ने कहा कि जमाली कमाली मस्जिद, सिद्धि साईद मस्जिद के बारे में बताते हुए कहा कि उस मस्जिद में कोई गुम्बद नही है, वहां पर जाली लगी हुई है, जिसको ट्री ऑफ लाइफ कहते है तो वहां पर जो नक्काशी है उसमें पेड़ और फूल बने हुए है.

    निज़ाम पाशा ने हदीस के बारे में बताते हुए कहा कि अगर कोई तस्वीर बनाना चाहता है तो वह पेड़, फूल की तस्वीर बना सकता है, लेकिन किसी जीवित व्यक्ति की तस्वीर नहीं बना सकता है, अगर बनाता है तो वह मकरूह होगी. निज़ाम पाशा इस बारे में बता रहे अहि इस्लाम में किस तरह की तस्वीर बनाने की इज्ज़त है और किसकी तस्वीर बनने की इजाज़त नहीं है.

    निज़ाम पाशा ने कहा कि यह ज़रूरी नहीं है मस्जिद में गुम्बद हो और वज़ू करने की जगह हो, ऐसी मस्जिद में नमाज़ पढ़ी जा सकती है और उसके मस्जिद होने पर कोई असर नहीं होता.

    पाशा ने कहा कि अगर किसी गैर मुस्लिम धार्मिक स्थान पर मस्जिद बनाई जाती है तो वह अवैध है लेकिन अगर कोई मस्जिद कहीं बनी है और उसे तोड़ा जाता है तो वह मस्जिद ही रहेगी.

    जस्टिस बोबड़े ने कहा कि आप कह रहे हैं कि ज़मीन अपने आप में एक मस्जिद है?

    पाशा ने कहा- जी हां

    निज़ाम पाशा ने कहा कि हज़रत निज़ामुद्दीन दरगाह और अजमेर में दरगाह के पास क़ब्र मौजूद है और दोनों दरगाहों के पास मस्जिद भी है तो यह कहना कि बाबरी मस्जिद के पास क़ब्र थी और वह मस्जिद नहीं थी यह ग़लत है. अगर एक व्यक्ति भी मस्जिद में नमाज़ पढ़ता है तो उसके मस्जिद होने का स्टेट्स बरक़रार रहेगा यह कहना कि बाबरी मस्जिद में सिर्फ 2 वक़्त की नमाज़ होती थी इसलिए उसका मस्जिद होने का स्टेट्स खत्म हो गया यह ग़लत है.

    निज़ाम पाशा ने ट्रांसलेशन पर भी सवाल उठाया, मीर बाकी को बाबरनामा मे ताशकंदी बताया गया क्योंकि यह ताशकंद से था, मीर बाकी इस्फ़हान नहीं था. बाकी आसिफ़ था आसिफ का मतलब दूसरा(second) होता है पाशा बताने की कोशिश कर रहे है फ़ारसी से अनुवाद में कई तरह की त्रुटि है.

    निज़ाम पाशा ने कहा कि यह कहना गलत है मस्जिद में खाना नहीं बनाया जा सकता और खाया नहीं जा पाशा ने एक हदीस का हवाला देते हुए कहा मोहम्मद साहब ने मस्जिद में खाना खाया था. पाशा ने कहा यह कहना कि मस्जिद में सोया नहीं जा सकता यह भी गलत है.

    पाशा ने कहा मस्जिद कल्चर एक्टिविटी का सेंटर होती है. निज़ाम पाशा के ट्रांसलेशन पर सवाल उठाने पर CJI ने कहा कि आप जिन ट्रांसलेशन पर सवाल उठा रहे हैं उसका सही ट्रांसलेशन करके इंग्लिश में दें और उस शब्द के सही ट्रांसलेशन का सबूत दें.

    रामलला विराजमान के वकील के पराशरन ने मुस्लिम पक्ष कि दलीलों का जवाब देना शुरू किया

  • पराशरन ने कहा कि न्यायिक व्यक्ति का हिन्दू देवता न्यायिक व्यक्ति हो सकता है. कोर्ट के पूर्व में दिए गए फैसलों को पराशरन ने स्पष्ट किया. के परासरन ने कहा कि न्यायिक व्यक्ति को हिन्दू कानून की दृष्टि से देखा जाना चाहिए. रोमन कानून या अंग्रेजी कानून से देखना गैर जरूरी है.

    परासरन ने कहा कि हिंदू कानून में न्यायिक व्याख्या के द्वारा उदाहरण के लिए विकसित और विकसित हुआ है. परासरन ने कहा कि हिन्दू धर्म में परम ईश्वर एक परम आत्मा है, जिसकी विभिन्न मंदिरों में विभिन्न रूपों में उनकी पूजा की जाती है.

    राजीव धवन ने हिन्दू पक्षाकर के वकील के परासरन के ज़रिए दिए जा रहे उदाहरण पर आपत्ति जताते हुए कहा कि जो उदाहरण दिए जा रहे है उसका इस केस से कोई लेना-देना नहीं है. जब हम उदाहरण दे रहे थे तो कोर्ट ने हमको टोका हम चाहते है कि कोर्ट इस मामले में निष्पक्ष रहे.

    के परासरन की दलील – विवादित जगह पर मूर्ति थी या नहीं यह महत्वपूर्ण नहीं. पूजा स्थल कई प्रकार के होते हैं,कहीं मूर्ति होती है कहीं नहीं होती. पूजास्थल का उद्देश्य देवत्व की पूजा. मूर्ति नहीं होने को आधार बनाकर जन्मस्थान पर सवाल उठाना उचित नहीं.

    जस्टिस बोबडे ने कहा कि आप न्यायिक व्यक्तित्व को साबित करने के लिए देवत्व पर जोर क्यों दे रहे हैं ? इसकी आवश्यकता नहीं अगर इसकी एक वस्तु या उत्तराधिकार है, तो न्यायिक व्यक्तित्व की आवश्यकता है, हम देवत्व की बहस पर क्यों जा रहे हैं.

  • परासरन ने कहा कि भगवान को अपने लोगों की रक्षा के लिए संरक्षित करना होगा. कोई भी मूर्ति का मालिक नहीं है. इसका विश्वास है जो महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. वह कभी पैदा नहीं होता और वह कभी नहीं मरता. उसकी कोई शुरुआत और अंत नहीं है. दिव्यता के बाद ही मूर्ति पवित्र हो जाती है.
  • परासरन ने कहा कि मूर्ति अपने आप में न्यायिक व्यक्तित्व नहीं है, लेकिन एक मूर्ति की जब स्थापना और पूजा होती है तब उसमें न्यायिक व्यक्ति विकसित होता है, क्योंकि उसमें देव की पवित्रता आ जाती है.
  • परासरण ने जस्टिस बोबड़े के सवाल पर कहा कि हिंदुओं की यह आस्था है कि जब भक्त या आस्था संकट में होती है, तब भगवान आते हैं. महाभारत इसका सीधा उदाहरण है, जहां भगवान के शस्त्र उठाए बिना पांडवों को जीत मिल गई, क्योंकि भगवान उनके साथ थे.
  • परासरन ने कहा कि धवन ने हमारे सवालों पर 4 दिन जवाब दिया, लेकिन मेरे बोलने पर सवाल खड़ा कर रहे हैं. मैं जो भी बोल रहा हूं उसका मतलब है. स्वयंभू दो प्रकार के होते हैं एक तो मूर्ति रूप में दूसरा जो स्वयं प्रकट होते हैं. मेरे यहां भूमि भी स्वयंभू होती है. जमीन की दिव्यता के बारे में बताते हुए परासरण ने कहा कि जरूरी नहीं है कि भगवान का कोई निश्चत रूप हो लेकिन सामान्य लोगों को पूजा करने के लिये एक आकृति की जरूरत होती है, जिससे लोगों का ध्यान केंद्रित हो.बोबड़े ने पूछा कि आपको इस जमीन को ज्यूरिस्टिक पर्सन बताने के लिये दिव्य साबित करने की जरूरत क्यों पड़ रही है?परासरण ने कहा- सामान्य लोगों को पूजा करने के लिये भगवान के एक रूप की जरूरत पड़ती है जबकि जो लोग आध्यात्म में काफी ऊपर उठ चुके होते हैं उनको इसकी जरूरत नहीं पड़ती.
  • परासरन ने कहा कि हिंदू धर्म में ईश्वर एक होता है और सुप्रीम होता है. अलग रूप में अलग प्रकार से अलग-अलग मंदिरों में पूजा होती है. राजीव धवन ने परासरन की दलील पर विरोध किया और कहा कि ये जो उदाहरण दे रहे हैं इसका इस केस से कोई लेना देना नहीं हैं. इन्होंने हमारे उठाए सवाल का जवाब नहीं दिया.
  • परासरन की दलील- विवादित जगह पर मूर्ति थी या नहीं, यह महत्वपूर्ण नहीं है. पूजा स्थल कई प्रकार के होते हैं. कहीं मूर्ति होती है, कहीं नहीं होती. पूजास्थल का उद्देश्य देवत्व की पूजा है. मूर्ति नहीं होने को आधार बनाकर जन्मस्थान पर सवाल उठाना उचित नहीं.
  • राजीव धवन ने हिंदू पक्षकर के वकील परासरन के ज़रिए दिए जा रहे उदाहरण पर आपत्ति जताते हुए कहा कि जो उदाहरण दिए जा रहे हैं, उसका इस केस से कोई लेना देना नही है. जब हम उदाहरण दे रहे थे तो कोर्ट ने हमको टोका हम चाहते है कि कोर्ट इस मामले में निष्पक्ष रहे.
  • परासरन ने कहा कि न्यायिक व्यक्ति को हिंदू कानून की दृष्टि से देखा जाना चाहिए. रोमन कानून या अंग्रेजी कानून से देखना गैरजरूरी है. परासरन ने कहा कि हिंदू धर्म में परम ईश्वर एक परम आत्मा है, जिसकी विभिन्न मंदिरों में विभिन्न रूपों में पूजा की जाती है.
  • रामलला विराजमान के वकील परासरण ने मुस्लिम पक्ष की दलीलों का जवाब देना शुरू किया. रामलला विराजमान के वकील परासरण ने कहा कि न्यायिक व्यक्ति का हिंदू देवता न्यायिक व्यक्ति हो सकता है. कोर्ट के पूर्व में दिए गए फैसलों को परासरण ने स्पष्ट किया.
  • निज़ाम पाशा ने ट्रांसलेशन पर भी सवाल उठाया. मुस्लिम पक्षकार की दलील पूरी हुई.
  • निज़ाम पाशा ने कहा कि हज़रत निज़ामुद्दीन दरगाह और अजमेर में दरगाह के पास क़ब्र मौजूद है और दोनों के पास मस्जिद भी है तो यह कहना कि बाबरी मस्जिद के पास क़ब्र थी और वह मस्जिद नही थी यह ग़लत है.अगर एक व्यक्ति भी मस्जिद में नमाज पढ़ता है तो उसके मस्जिद होने का स्टेटस बरक़रार रहेगा यह कहना कि बाबरी मस्जिद में सिर्फ 2 वक़्त की नमाज होती थी इसलिए उसका मस्जिद होने का स्टेटस खत्म हो गया यह ग़लत है.
  • पाशा ने कहा अगर किसी गैर मुस्लिम धार्मिक स्थान पर मस्जिद बनाई जाती है तो वह अवैध है. लेकिन अगर कोई मस्जिद कहीं बनी है और उसे तोड़ा जाता है तो वह मस्जिद ही रहेगी.जस्टिस बोबड़े ने कहा कि आप कह रहे हैं कि ज़मीन अपने आप में एक मस्जिद है?पाशा ने कहा जी हां
  • मीडिएशन को लेकर एक वकील ने कहा कि तमाम रिपोर्ट चल रही हैं. रामलला विराजमान ने कहा- हम किसी से मीडिएशन नहीं कर रहे. कोर्ट ने फिर कहा कि अगर जरूरत पड़ी तो हम शनिवार को सुनवाई करेंगे. मीडिएशन पर कोर्ट ने कहा कि हम उस पर गौर नहीं कर रहे हैं.
  • मुस्लिम पक्ष के वकील की रोचक दलील निर्मोही का मतलब होता है मोह का अभाव और बैरागी का मतलब वैराग्य होता है. फिर भी ये लोग जमीन पर कब्जे की मांग पर अड़े हुए हैं.निज़ाम पाशा की दलील- ‘निर्मोही का अर्थ है मोह का अभाव. निर्मोही अखाड़े को संपत्ति का कोई लगाव नहीं होना चाहिए, लेकिन वे अभी भी दावा करते हैं. इसलिए बहस धार्मिक पहलुओं पर नहीं बल्कि कानूनी पहलुओं पर होनी चाहिए.निज़ाम पाशा की दलील – बाबरी मस्जिद वैध मस्जिद थी या नहीं, वहां वजू करने की व्यवस्था थी या नहीं, इसे इस्लाम के सिद्धांतों पर परखने की जरूरत नहीं है.
    यह देखे जाने की जरूरत है कि वहां के लोग इसे मस्जिद मानते थे या नहीं.
  • CJI ने पाशा से पूछा कि आपको अपनी दलील पूरी करने के लिए कितना समय लगेगा. पाशा ने कहा कि 20 मिनट से 30 मिनट लगेगा.
  • पाशा ने कहा कि मस्जिद में स्तंभ नहीं होते, यह पूरी तरह से गलत है. क्योंकि हदीस में स्पष्ट है कि मस्जिद में नमाज अदा दो खंभों पर बनी दीवार के सामने की जाती है.
  • निज़ाम पाशा ने कहा कि मस्जिद में तस्वीर इस वजह से नहीं लगाई जाती, क्योंकि उससे ध्यान भंग होता है. एक हदीस के अनुसार मस्जिद में तस्वीर रखना मकरूह है. हिंदू पक्षकार की तरफ से कहा गया कि वहां पर जो स्तम्भ माइक थे, उस पर तस्वीरें और मूर्ति बनी हुई थीं. पाशा ने कहा कि जिस तस्वीर को दिखाया जा रहा है, वह दिखने में साफ भी नहीं है. अलग-अलग हिंदू गवाहों ने उस पर अलग-अलग तस्वीर होने की बात कही है.
  • पाशा ने कहा कि पुरातत्व विभाग के मुताबिक कई स्तंभ मिले. ऐसे में जो अंदाजा इन खंभों के आधार पर लगाया गया, उस पर कितना भरोसा किया जा सकता है.
  • पाशा ने कहा कि क्या स्ट्रक्चर मस्जिद थी. उसका निर्णय शरिया के हिसाब से नहीं बल्कि देश के मौजूदा कानून के हिसाब से होगा. देश में कुरान का कानून नहीं चलता. ऐसे में मस्जिद कि वैधता पर कोई सवाल नहीं बल्कि उन पर है जो उसे तोड़ गए. हम किसी अंदाजे पर नहीं चल सकते. गौर करने वाली बात यह है कि वक्फ को जब इस संपत्ति का जिम्मा मिला, तब क्या स्थिति थी?
  • मुस्लिम पक्ष के याचिकाकर्ता मिसबाहुद्दीन के वकील ने जिरह शुरू की.  वकील निज़ाम पाशा ने जिरह शुरू करी.
  • मुस्लिम पक्षकारों के वकील नाफड़े ने अपनी दलील पूरी की. नाफड़े ने सुप्रीम कोर्ट में आज समय दिए जाने के लिए धन्यवाद कहा. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अब आगे हमारे लिए ऐसा करना मुश्किल होगा.
  • वकील नाफड़े ने कहा कि महंत किसका प्रतिनिधित्व करता है. कानून के हिसाब से महंत मठ का प्रतिनिधित्व करता है. अभी कोर्ट में नाफड़े यह बताने की कोशिश कर रहे हैं. रघुबरदास ने जो याचिका दाखिल की थी वह पूरे हिंदू समाज का प्रतिनिधित्व था. 1885 में मोहम्मद अज़गर मुस्लिम का प्रतिनिधित्व कर रहे थे और रघुबरदास हिंदुओं का.
  • नाफड़े ने कहा कि रघुबरदास के महंत होने को सभी ने माना और उसको किसी ने भी चैलेंज नही किया था. 1885 का फैसला भी यही कहता है. नाफड़े ने कहा कि सवाल यह नही कोर्ट ने क्या कहा. सवाल यह है कि याचिकाकर्ता ने कोर्ट को कहां बताया कि निर्मोही अखाड़ा ने भी उनको महंत माना था.जस्टिस भूषण ने कहा कि उन्होंने खुद को निर्मोही अखाड़े के महंत ने बताया था, निर्मोही अखाड़ा एक मठ है.जस्टिस बोबडे़ ने कहा कि याचिका में रघुबरदास ने खुद को हिंदुओं का प्रतिनिधि नहीं बताया था न ही मठ का प्रतिनिधि बताया था.नाफड़े ने कहा कि याचिका में रघुबरदास ने खुद को पूजास्थल का महंत बताया था, जिसको कोर्ट ने भी माना था. इसका यही मतलब हुआ कि उन्होंने खुद को हिंदुओं का प्रतिनिधि माना था.
  • नाफड़े ने कहा कि मुस्लिम कब्ज़े का दावा कर सकते हैं या नहीं. वहां पर मस्जिद थी और उसको 1885 में चैलेंज नही किया गया था. वहां चबूतरे पर एक छोटा मंदिर था. मस्जिद की मौजूदगी को माना गया था. ज्यूडिशियल कमिश्नर ने रिपोर्ट में साफ कहा था हिंदू अपने अधिकार को बढ़ाना चाहते हैं.
  • नाफड़े- 1885 में विवादित क्षेत्र में हिंदुओं का प्रवेश केवल बाहरी आंगन में स्थित राम चबूतरा और सीता रसोई तक ही सीमित था. हिंदू राम चबूतरा को जन्मस्थान कहते थे. बाकी जगह मस्जिद थी, जहां मुस्लिम नमाज अदा करते थे.
  • नाफड़े ने कहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज ने 1885 के फैसले को भी माना. नाफड़े ने कहा कि हिंदू पक्षकारों ने सीमित अधिकार माना था. उन्होंने अपने अधिकार को बढ़ाने की कोशिश की और सीता की रसोई पर भी दांव किया. नाफड़े ने कहा कि हिंदू का अंदरूनी आंगन में कोई अधिकार नहीं था. यह ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट ने भी माना था. नाफड़े ने कहा कि हिंदुओं का वहां पर सीमित अधिकार था. वहां पर मस्जिद मौजूद थी. अंदरूनी आंगन मस्जिद का हिस्सा था. रघुबरदास ने जो कहा भी निचली अदालत में कहा. वह पूरे हिंदुओं की तरफ से था इसीलिए 1885 का फैसले पर रेस ज्युडि केटा लागू होता है.
  • नाफड़े- मौजूदा मुकदमा और 1885 का मुकदमा, दोनों ही एक जैसे हैं. फर्क सिर्फ इतना है कि 1885 में इन्होंने केवल एक हिस्सा पर अपना दावा ठोंका था और अब ये पूरे विवादित क्षेत्र पर अपने मालिकाना हक का दावा ठोंक रहे हैं. अब सवाल यह उठता है कि क्या इसे स्वीकार्य किया जा सकता है कि 1885 में महंत का केस सभी हिंदुओं का प्रतिनिधित्व कर रहा था या नहीं?हाईकोर्ट के फैसले पर सवाल उठाते हुए वकील नाफ़ड़े ने कई न्यायिक फैसलों का हवाला दिया और कहा कि रेस ज्यूडी काटा के नियम का ख्याल हाईकोर्ट ने नहीं रखा.
  • नाफड़े- मैं समझता हूं कि कोर्ट पर मामला जल्द से जल्द समय पर खत्म करने का प्रेशर है. माय लार्ड, मैं आज कोर्ट का ज्यादा समय न लेते हुए कोशिश करूंगा कि सारांश में अपनी बात कोर्ट के सामने कम समय में रख दूं.
  • मुस्लिम पक्ष की ओर से शेखर नफाड़े ने दलील देनी शुरू की.