राम मंदिर पर शिवसेना का सख्त रुख कहीं महाराष्ट्र की राजनीति में बदलाव के संकेत तो नहीं

शिवसेना राम मंदिर का मुद्दा चुपके से बीजेपी से खींच लेना चाहती है लेकिन सवाल यह है कि क्या यह चाहत केवल महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव को देखते हुए है?

नई दिल्ली: एक समय में राम मंदिर का मुद्दा भारतीय जनता पार्टी के टॉप एजेंडे में हुआ करता था. राम मंदिर मुद्दे की वजह से ही बीजेपी लोकसभा चुनाव में 2 सीट से 85 सीट पर पहुंच पाई लेकिन यह बात 1980-89 की है. 2019 आते-आते यह मुद्दा बीजेपी के संकल्प पत्र में 40वें पेज पर पहुंच गया वो भी सिर्फ दो लाइन में.

बीजेपी ने संकल्प पत्र में कहा, ‘राम मंदिर पर बीजेपी अपना वादा दोहराती है. संविधान के दायरे में रहकर अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए सभी संभावनाओं को तलाशा जाएगा और इसके लिए सभी आवश्यक प्रयास किए जाएंगे.’

हालांकि लोगों ने इस तरीके से भी बीजेपी को स्वीकार किया लेकिन ऐसा लगता है बीजेपी की सहयोगी शिवसेना अब इस मुद्दे को लेकर अपनी पार्टी का झंडा बुलंद करना चाहती है. लोकसभा चुनाव 2019 से पहले शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे राम मंदिर को लेकर अयोध्या गए थे और जनसभा को भी संबोधित किया था.

चुनाव जीतने के बाद एक बाद फिर से शिवसेना नेता अयोध्या पहुंचे. रविवार को शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने पूजा-अर्चना के बाद कहा कि अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए सरकार को अध्यादेश लाना चाहिए. ठाकरे ने कहा कि राम मंदिर का निर्माण जल्द से जल्द करना होगा. सरकार को राम मंदिर निर्माण के लिए अध्यादेश लाना चाहिए.

मंगलवार को शिवसेना का मुख पत्र सामना में भी अयोध्या में राम मंदिर को लेकर कुछ बात लिखी गई है जो इस प्रकार है.

योजनानुसार हम 18 सांसदों के साथ अयोध्या जाकर आए. पिछले नवंबर महीने में भी हम अयोध्या में थे. तब एक अलग तैयारी से आए थे. महाराष्ट्र से और देशभर से हजारों शिवसैनिक अयोध्या में आए वह भी शक्ति प्रदर्शन नहीं था व आज 18 सांसदों के साथ रामलला के दर्शनों को पहुंचना भी शक्ति प्रदर्शन नहीं है. पिछली मुलाकात में हमने ये कहा था ‘चुनावों का शंखनाद हो चुका है इसलिए हम अयोध्या में नहीं आए. चुनावों के बाद सभी विजयी सांसदों के साथ रामलला के चरणों में नतमस्तक होने के लिए आएंगे.’ ये हमारा वचन था और योजनानुसार हम आए.

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सच कहो तो ये अयोध्यावासियों का कहो या रामलला का, पर हमारा निश्चित है. हम अयोध्या आते रहेंगे, ऐसा हमने निश्चित किया है. श्रीराम की कृपा से भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना को लोकसभा चुनावों में अभूतपूर्व जीत मिली है. यह सफलता अभूतपूर्व ही नहीं बल्कि विरोधियों को जमींदोज करनेवाली है, जिसने राम मंदिर का विरोध किया वे नष्ट हो गए. राम के नाम पर समुद्र में पत्थर भी तर गए. रामसेतु खड़ा हो गया. उसी राम के नाम से आज की दिल्ली सरकार भी तर गई. प. बंगाल में जाकर अमित शाह ने ‘जय श्रीराम’ का नारा दिया और प्रभु श्रीराम ने कमाल कर दिया. ममता बनर्जी को दुर्बुद्धि आ गई. श्रीराम का नारा देनेवालों को उन्हीं की सरकार ने अपराधी ठहरा दिया. इसका परिणाम यह हुआ कि ममता बनर्जी ने श्रीराम का विरोध किया इसलिए प. बंगाल की हिंदुत्ववादी जनता ने बीजेपी के 18 सांसद जिता दिये.

प. बंगाल में बीजेपी की ताकत गिनी-चुनी थी, पर राम विरोधियों को सबक सिखाने के लिए बंगाली जनता ने जीत का रसगुल्ला बीजेपी के मुंह में भर दिया. उत्तर प्रदेश में ‘बाबरी भक्त’ अखिलेश-मायावती एक हो गए. राम मंदिर के लिए इन दोनों का विरोध था. इसलिए ‘जय श्रीराम’ का नारा देनेवाले 61 सांसदों को जीत दिलाकर बीजेपी को पूर्ण बहुमत दिला दिया. ये प्रभु श्रीराम का भंडार है. जो बीजेपी और शिवेसना को प्रसाद स्वरूप मिला. अब वनवास के राम को मुक्त कराने की जिम्मेदारी किसकी? तो शत-प्रतिशत बीजेपी और शिवसेना की ही है.

नीतीश कुमार व रामविलास पासवान के लिए भी सेक्युलरवाद के नाम पर राम मंदिर के मुद्दे से भागना संभव नहीं होगा. उनकी जीत में भी राम-नाम का हिस्सा है. जो राम का नहीं, वो काम का नहीं, ऐसा निर्णय जनता ने ही दिया है. राम मंदिर का मुद्दा कोर्ट में अटका है. हमारे लिए राम मंदिर राजनीति नहीं अस्मिता का विषय है. कोर्ट का निर्णय जो होना होगा, होगा पर पूरा देश राम मंदिर के साथ है. जनता ने लोकसभा चुनावों के जरिए निर्णय दिया है. राम मंदिर की बाबत सर्वोच्च न्यायालय को जो निर्णय देना होगा वो देगा, उसे बाद में देखा जाएगा.

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कानून के दायरे में रहकर राम मंदिर का मसला हल करेंगे, ऐसा प्रधानमंत्री मोदी कहते हैं. प्रधानमंत्री के तौर पर उन्हें कानून की भाषा ही बोलनी पड़ेगी यह समझना चाहिए. पर मोदी ये प्रखर हिंदुत्ववादी हैं वे छुपे हिंदुत्ववादी न होकर खुले तौर पर हिंदुत्ववादी हैं. चुनाव संपन्न होने के बाद वे केदारनाथ गुफा में तप के लिए बैठे. देश के ढोंगी, विधर्मियों को क्या महसूस होगा इसकी परवाह न करते हुए वे केदारनाथ की गुफा में बैठे. हाल ही में वे केरला के गुरुवायुर मंदिर गए. वहां पर उन्होंने पीतांबर धारण कर पूजा-अर्चना की. उनका ये रूप देश की जनता को पसंद आ गया. उसका प्रतिसाद मतपेटियों में दिखाई पड़ा. इसलिए मोदी और शाह की धमनियों में राम मंदिर का मुद्दा उफान लेता होगा, इस बारे में हमारे मन में रंच मात्र भी शंका नहीं है.

मंदिर का निर्माण कैसे होगा, किस तरह बनेगा इसका निर्णय अब लेना चाहिए. बीजेपी के उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ये हमसे एक दिन पहले अयोध्या में थे. राम जन्मभूमि न्यास के प्रमुख संत नृत्य गोपालदास महाराज के अयोध्या में जन्मोत्सव कार्यक्रम में साधु-संतों की मौजूदगी में केशव प्रसाद मौर्य ने कहा, ‘राम जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण के दो ही पर्याय हैं. मुस्लिम पक्षकारों से चर्चा और सर्वोच्च न्यायालय का आदेश. ये दोनों पर्याय निष्फल होते हैं तो अध्यादेश के जरिए कानून बनाकर राम मंदिर का निर्माण होना चाहिए!’

इस पर मौजूद साधु-संतों ने विजयी शंखनाद किया. केशव प्रसाद ये साधारण गृहस्थ नहीं हैं. उनका बोलना इसीलिए महत्वपूर्ण है. हमारी और उनकी नीति में कोई अंतर नहीं है. चर्चा के सभी मार्ग विफल हो गए हैं व सर्वोच्च न्यायालय श्रद्धा का निपटारा कैसे करेगा, ये हमारा सवाल है. इसलिए 350 सांसदों का बहुमत ही राम मंदिर का जनादेश है. मंदिर की दिशा में सरकार को ही अब कदम आगे बढ़ाना चाहिए. अयोध्या के श्रीराम का वनवास खत्म होना चाहिए. श्रीराम ने हमें 350 सांसद दिए. सत्ता दी. हम उन्हें उनके जन्मस्थान पर एक हक की छत भी नहीं दे सकते?

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ज़ाहिर है शिवसेना राम मंदिर का मुद्दा चुपके से बीजेपी से खींच लेना चाहती है लेकिन सवाल यह है कि क्या यह चाहत केवल महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव को देखते हुए है क्योंकि शिवसेना राज्य में बड़े भाई की भूमिका में रहना चाहता है और उद्धव ठाकरे को बतौर सीएम देखना चाहता है?