धरती तो छोड़ो अंतरिक्ष में इंसानों ने फैलाया 1,72,365 किलो कचरा, सबसे पहले इस देश ने की थी शुरुआत

रद्दी या कचरा बन गयी इन चीजों के चंद्रमा पर पहुंचने, वहां छोड़ देने या फेंक दिये जाने की शुरुआत नील आर्मस्ट्रांग के थैली फैकने से करीब 10 साल पहले 13 सितंबर 1959 को हुई थी.

नई दिल्ली: पूरा विश्व भारत टकटकी लगाकर इसरो के मिशन चंद्रयान-2 को देख रहा था. लेकिन आखिरी समय में चंद्रयान-2 का संबंध विक्रम लैंडर से टूट गया. इसके साथ ही करोड़ों लोगों का दिल भी टूट गया. इस मौके के साक्षी बनने के लिए खुद पीएम मोदी इसरो सेंटर पर मौजूद थे. इसरो के वैज्ञानिकों को जब इस बात का पता चला तो हताशा उनके चेहरे पर साफ झलक रही थी लेकिन उस वक्त पीएम मोदी ने उनका ढांढ़स बंधाया. इसरो चीफ के सिवन पीएम मोदी के गले लगकर भावुक हो गए. हालांकि अभी तक कहा जा रहा है कि हमारा लैंडर विक्रम सही सलामत है. उसमें किसी भी प्रकार की टूट फूट नहीं हुई है.

मेरी तरह कई और लोगों के जेहन में एक बात तो जरूर आती होगी कि अगर कोई भी यान चंद्रमा पर जाता है और अगर वो नष्ट हो जाता है तो उसके टुकड़े कहां बिखरते होंगे. या फिर वो हवा में ही तैरते रहते होंगे. इस बारे में हमने खगोल वैज्ञानिक आर सी कपूर से बात की और आसान शब्दों में इस सवाल का उत्तर जानने की कोशिश की. आर सी कपूर ने बताया कि जब कोई सैटेलाइट या फिर और उपकरण अंतरिक्ष में टूटता है तो वह उसी के आस पास मंडराता रहता है. इतना ही नहीं इसके मंडराने के कारण कई बार दूसरे देश जब कोई मिशन लॉन्च करते हैं तो उनके सामने ये खतरा मंडराता रहता है कि कई इनके टुकड़े दूसरे लॉन्च किए गए उपकरण से टकरा न जाएं. अगर ऐसा होता है तो कई बार मिशन फेल भी हो जाता है.

आर सी कपूर ने बताया कि अभी अंतरिक्ष में हजारों टुकड़े जिसका साइज 10 सेमी. से बड़ा है वो अंतरिक्ष में तैर रहे हैं. जिसकी वजह से खोज करने वाले देशों को परेशानी होती है. स्पेस का कूड़ा साफ करने के लिए भी प्रयास शुरू किए जा रहे हैं. जिससे कि शोध के कार्यों में किसी भी तरह के बड़े जोखिम से बचा जा सके.

जरा हम इसके इतिहास की ओर रूख करते हैं. अमेरिका के नील आर्मस्ट्रांग चंद्रमा पर अपने पैर रखने वाले पहले धरतीवासी थे. वह 21 जुलाई 1969 के दिन भारतीय समयानुसार सुबह आठ बजकर 26 मिनट में चंद्रमा में पैर रखा था. हममें से ज्यादातर ने यही पढ़ा-सुना होगा कि अंतरिक्षयान ‘कोलंबिया’ से अलग होकर जो अवतरण यान ‘ईगल’ चंद्रमा पर उतरा था उससे आर्मस्ट्रांग ही सबसे पहले बाहर निकले थे. अपने पैर चंद्रमा की मिट्टी पर रखने से पहले आर्मस्ट्रांग ने गांठ मारकर बंद की हुई प्लास्टिक की एक थैली चंद्रमा पर फेंकी थी.

इस थैली में दोनों का मल-मूत्र और उड़ान के दौरान खाने-पीने की सामग्रियों का कचरा था. यह थैली आर्मस्ट्रांग के सहयात्री बज़ एल्ड्रिन ने उन्हें तब पकड़ाई थी. यह ऐसा पहला कचरा था, जिसे किसी मनुष्य ने अपने हाथ से चंद्रमा पर फेंका था. यह संभवतः आज भी वहां ज्यों का त्यों पड़ा है. हालांकि ऐसा उन्होंने जान के नहीं किया था बल्कि उनकी मजबूरी हो गई थी.

चंद्रमा पर अपने विचरण के बाद ईगल में ही बैठकर दोनों को ‘कोलंबिया’ के पास वापस जाना था और चंद्रमा के आकाश में उसकी परिक्रमा कर रहे कोलंबिया’ को उन्हें पृथ्वी पर वापस ले आना था. ‘ईगल’ में जगह की बहुत तंगी थी और ईंधन भी बहुत नपा-तुला था. कचरा फेंककर उसका भार हल्का करने से थोड़ा ईंधन बच सकता था और कुछ जगह भी ख़ाली हो जाती. इसलिए चंद्रमा को ग़ंदा करने के सिवाय कोई रास्ता नहीं था.

अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी ‘नासा’ का अनुमान है कि चंद्रमा पर भले ही कोई नहीं रहता, पर वहां 190 टन मनुष्य-निर्मित कचरा यहां-वहां बिखरा पड़ा है. ‘नासा’ की एक सूची के अनुसार, अकेले उस क्षेत्र में, जहां अमेरिका के दोनों प्रथम चंद्रयात्री 21 जुलाई 1969 के दिन उतरे थे, 50 से अधिक चीजें बिखरी पड़ी हैं.

जर्मनी में बर्लिन की एक फर्म दूरनियंत्रित रोबोट भेजकर ऐसी ही किसी जगह की जांच-परख करना चाहती है, जहां अमेरिका के चंद्रयात्री कुछ छोड़ आये हैं. उसका कहना है कि इन चीजों के साथ कोई छेड-छाड़ नहीं की जायेगी. ये चंद्रमा पर मनुष्य के पहुंचने के ऐतिहासिक स्मारकों जैसी धरोहर हैं.

रद्दी या कचरा बन गयी इन चीजों के चंद्रमा पर पहुंचने, वहां छोड़ देने या फेंक दिये जाने की शुरुआत नील आर्मस्ट्रांग के थैली फैकने से करीब 10 साल पहले 13 सितंबर 1959 को हुई थी. उस दिन तत्कालीन सोवियत संघ का चंद्रमा तक पहुंचने वाला पहला चंद्रयान ‘लूना2’ उससे टकराकर ध्वस्त हो गया था. ‘लूना2’ एक ही दिन पहले, 12 सितंबर 1959 को, प्रक्षेपित किया गया था. मात्र एक दिन 14 घंटे और 22 मिनट की उड़ान के बाद वह चंद्रमा के पास पहुंचते ही उससे टकरा गया. उसके सारे टुकड़े चंद्रमा पर मनुष्य-निर्मित पहला कचरा बने.

बाद में सोवियत संघ के ही कुछ और ‘लूना’ चंद्रयान वहां पहुंचे. 1966 में पहुंचा ‘लूना9’ ऐसा पहला यान था, जो बिना टूटे-फूटे चंद्रमा की सतह पर उतर पाया. उसने वहां के कुछ फ़ोटो भी पृथ्वी पर भेजे. लेकिन तीन ही दिन बाद उसकी बैटरी पूरी तरह डिस्चार्ज हो गयी और वह भी कूड़े में तब्दील हो गया.

समय के साथ अमेरिका, यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी ‘ईएसए’, चीन, जापान और भारत ने भी अपने यान चंद्रमा पर भेजे. कुछ सफलतापूर्वक वहां उतरे, कुछ उससे टकराकर ध्वस्त हो गये. जो सफलतापूर्वक उतरे, उनका जीवनकाल बाद में समाप्त हो गया. वे भी अब रद्दी या कूड़े की ही तरह यहां-वहां पड़े हुए हैं. अब तक 30 से अधिक यान चंद्रमा पर उतरे हैं या उससे टकराकर नष्ट हो चुके हैं. सितंबर 2019 शुरू होने तक चंद्रमा पर पहुंचने के बाद उससे टकराकर नष्ट हो जाने वाला अंतिम यान ‘बेरेशीत’ था.

समय के साथ अमेरिका, यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी ‘ईएसए’, चीन, जापान और भारत ने भी अपने यान चंद्रमा पर भेजे. कुछ सफलतापूर्वक वहां उतरे, कुछ उससे टकराकर ध्वस्त हो गये. जो सफलतापूर्वक उतरे, उनका जीवनकाल बाद में समाप्त हो गया. वे भी अब रद्दी या कूड़े की ही तरह यहां-वहां पड़े हुए हैं. अब तक 30 से अधिक यान चंद्रमा पर उतरे हैं या उससे टकराकर नष्ट हो चुके हैं. सितंबर 2019 शुरू होने तक चंद्रमा पर पहुंचने के बाद उससे टकराकर नष्ट हो जाने वाला अंतिम यान ‘बेरेशीत’ था.

मार्च में भारत ने भी एक सैटेलाइट अंतरिक्ष पर ही नष्ट किया था. बताया जा रहा था कि ये भारत का ही एक शोध था. लेकिन बाद में विश्व की तमाम स्पेस एजेंसियों ने इसका विरोध किया था. एजेंसियों का कहना था कि नष्ट होने के बाद जो टुकड़े अंतरिक्ष में बिखरे हैं उससे बाकी देशों को परेशानी होती है. ये बात सच भी है क्योंकि कोई भी देश जब कोई शोध करता है तो इसमें खर्च भी बहुत आता है और वक्त भी लगता है ऐसे में किसी दूसरे की गलती के कारण अगर अपना नुकसान होता है तो दुख पहुंचता है.