मुगल बादशाह औरंगजेब ने आगरा में दिया था शिवाजी महाराज को धोखा, जानें- क्यों मजबूत है नाम बदलने की वजह

मुगलों को नाकों चने चबाने वाले देश के महानायक शिवाजी का आगरा से जुड़ाव किसी से छिपा नहीं. करीब 354 साल बाद एक बार फिर छत्रपति शिवाजी चर्चा के विषय बने हैं. आगरा किला के बाहर शिवाजी महाराज की प्रतिमा लगी हुई है.

Mughal Museum named on Shivaji maharaj in agra, मुगल बादशाह औरंगजेब ने आगरा में दिया था शिवाजी महाराज को धोखा, जानें- क्यों मजबूत है नाम बदलने की वजह

देश में खासकर उत्तर भारत में नाम बदलने से जुड़ा मसला एक बार फिर प्रासंगिक हो गया है. सोशल मीडिया पर नाम बदलने को लेकर नामचीन हो चुके उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) ने सोमवार को कहा है कि आगरा में निर्माणाधीन मुगल म्यूजियम छत्रपति शिवाजी महाराज के नाम स्थापित होगा. उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार (Uttar Pradesh Government) राष्ट्रवादी विचारों को पोषित करने वाली है. गुलामी की मानसिकता के प्रतीक चिन्हों को छोड़कर राष्ट्रीयता के प्रति गौरवबोध कराने वाले विषयों को बढ़ावा देने की आवश्यकता है. हमारे नायक मुगल नहीं हो सकते. शिवाजी महाराज हमारे नायक हैं. मुख्यमंत्री ने इस संग्रहालय में छत्रपति शिवाजी महाराज के दौर से जुड़ी चीजें भी रखने का निर्देश दिया.

इस बदलाव के बाद पहले की तरह विरोधियों ने एक बार फिर ‘नाम बदलने से क्या होगा’ जैसे सवालों के साथ हमले शुरू कर दिए हैं. हालांकि गंभीरता से सोचें तो इस प्रश्न की प्रासंगिकता संदेह के दायरे में आती है. अगर नाम बदलने से कुछ नहीं होगा तो फिर सवाल ही क्यों? कुछ होने वाले सवाल उठाए जाएं. दूसरा विषय उठाते हुए सवाल पूछने वाले आगरा के इतिहास की बात करते हैं. आगरा को मुगलकालीन राजधानी होने की याद दिलाते हुए पुराने प्रस्तावित नाम का औचित्य साबित करने की कोशिश करते हैं. मुगल म्यूजियम का नाम बदलने की मांग भी एक इतिहासविद राजकिशोर राजे ने उठाई थी. उन्होंने जनसुनवाई पोर्टल पर शिकायत की थी. इसके बाद पर्यटन विभाग ने आधा दर्जन नाम सरकार को सुझाए.

आगरा का संक्षिप्त इतिहास

इस मौके पर आगरा के संक्षिप्त इतिहास की चर्चा लाजिमी है. इसका संबंध महर्षि अंगिरा से है जो 1000 वर्ष ईसा पूर्व हुए थे. इतिहास में पहला ज़िक्र आगरा का महाभारत के समय से माना जाता है, जब इसे अग्रबाण या अग्रवन के नाम से संबोधित किया जाता था. कहते हैं कि पहले यह नगर आयॅग्रह के नाम से भी जाना जाता था. टॉलमी पहला ज्ञात व्यक्ति था जिसने इसे आगरा नाम से संबोधित किया. आगरा शहर को सिकंदर लोदी ने सन् 1506 ई. में बसाया था.

Mughal Museum named on Shivaji maharaj in agra, मुगल बादशाह औरंगजेब ने आगरा में दिया था शिवाजी महाराज को धोखा, जानें- क्यों मजबूत है नाम बदलने की वजह

दिल्ली सल्तनत के उदय से पहले आगरा का इतिहास स्पष्ट नहीं है. 17वीं शताब्दी के एक वृत्तांत में सिकंदर लोदी (1488-1517) के समय से पहले आगरा को एक पुरानी बस्ती के रूप में बुलाया जाता था. महमूद गजनवी के आक्रमण में इसके विनाश के कारण यह महज एक गांव था. 11वीं सदी के फ़ारसी कवि मासूद सलमान ने आगरा के किले पर गजनवी के आक्रमण का उल्लेख किया है. तब आगरा राजा जयपाल के शासन के अधीन था. जयपाल के आत्मसमर्पण के बावजूद, महमूद ने किले को लूट लिया था. साल 1504 में सिकंदर लोदी ने अपनी राजधानी को दिल्ली से आगरा स्थानांतरित किया था. उनके काल में किले में कई महल, कुएं और एक मस्जिद का निर्माण किया गया. 1526 में पानीपत के प्रथम युद्ध में हार के बाद यह मुगल शासन के अंतर्गत आया. 1540 और 1556 के बीच, शेरशाह सूरी ने इस क्षेत्र पर शासन किया. यह 1556 से 1648 तक यह मुगल साम्राज्य की राजधानी रहा. आगरा पर बाद में मराठों का अधिपत्य रहा. उनके बाद यह ब्रिटिश राज के अंतर्गत आ गया.

विदेशी आक्रांता मुगलों को क्यों याद रखें?

आगरा शहर को धार्मिक-सांस्कृतिक दृष्टि से ब्रज यानी भगवान श्रीकृष्ण की लीला स्थली का हिस्सा माना जाता रहा है. राजस्थान-हरियाणा सीमा के साथ ही मथुरा के काफी नजदीक और यमुना किनारे बसे आगरा के रोजमर्रा में ‘राधे-राधे’ का संबोधन आम है. ऐसे में महज नौ दशकों तक मुगलों की राजधानी रहने मात्र से किसी जगह को उसकी ही यादों में रुढ़ कर दिया जाना या उसको बदलने का विरोध किए जाने के तुक को समझना आसान है. जबकि मुगल बाहरी और आक्रांता थे- इसमें किसी को कई शक नहीं है. अगर है भी तो महज राजनीतिक और आर्थिक है. हाल ही में दिवंगत हुए भारत रत्न पूर्व राष्ट्रपति डॉ. प्रणब मुखर्जी बीते साल मुगलों को विदेशी आक्रमणकारी कह चुके हैं.

आगरा से शिवाजी महाराज का जुड़ाव

दूसरी ओर मुगलों को नाकों चने चबाने वाले देश के महानायक शिवाजी का आगरा से जुड़ाव किसी से छिपा नहीं. करीब 354 साल बाद एक बार फिर छत्रपति शिवाजी चर्चा के विषय बने हैं. आगरा किला के बाहर शिवाजी महाराज की प्रतिमा लगी हुई है. वर्ष 1674 में पश्चिम भारत में मराठा साम्राज्य की नींव रखने वाले छत्रपति शिवाजी ने कई सालों तक औरंगजेब के मुगल साम्राज्य से संघर्ष किया था और मुगल सेना को धूल चटाई थी. शिवाजी के पराक्रम से परेशान होकर औरंगजेब ने बाद में उनसे संधि करने की योजना बनाई. इसके लिए उन्हें आगरा बुलाया. वहां उचित सम्मान नहीं मिलने से शिवाजी ने भरे दरबार में नाराज हुए और औरंगजेब पर विश्वासघात का आरोप लगाया.

इतिहासकार बताते हैं कि छत्रपति शिवाजी 16 मार्च, 1666 को अपने बड़े पुत्र संभाजी के साथ आगरा आए थे. मुगल बादशाह औरंगबेज ने उचित सम्मान न दिया तो शिवाजी ने मनसबदार का पद ठुकरा दिया था. फिर वह राजा जय सिंह के पुत्र राम सिंह के आवास पर रुके. कुछ इतिहासकार इसी आवास यानी राम सिंह छावनी में और कुछ कहते हैं कि शिवाजी को आगरा किले में कैद कर औरंगजेब ने 5 हजार सैनिकों का कड़ा पहरा लगा दिया. औरंगजेब के दरबारी खाफी खां ने अपनी किताब ‘मुन्तखब-उल-लुबाब’ में शिवाजी को राजा जयसिंह की हवेली के पास नगर से बाहर एक मकान में ठहराने का जिक्र किया है. इलियट और डाउसन ने इसका संपादन ‘भारत का इतिहास’ पुस्तक में किया है. लेखक राधेश्याम की किताब ‘औरंगजेब’ में शिवाजी को फिदाई हुसैन के निवास पर रखे जाने का उल्लेख किया है.

शहर के कई जगहों पर शिवाजी की यादें

अभिलेखों के अनुसार, शिवाजी ने जेल में बीमार होने का बहाना बनाया. वे फलों की टोकरियां दान में भेजने लगे. 13 अगस्त, 1666 को वे फल की एक टोकरी में बैठकर गायब हो गए. शिवाजी के स्थान पर उनका चचेरा भाई हीरोजी चादर ओढ़कर लेटा रहा. इससे किले के सुरक्षा प्रहरी भ्रम में रहे. औरंगजेब हाथ मलता रह गया. बताया जाता है कि यमुना में नाव से शिवाजी ताजगंज श्मशान घाट स्थित मंदिर की ओर आए. यहां भी कुछ दिन छिपकर रहे. स्टेशन रोड स्थित महादेव मंदिर में भी रुकने की किंवदंती है. फिर वे साधु-संतों की टोली में बैठकर मथुरा की ओर रवाना हो गए. औरंगजेब फिर शिवाजी को पकड़ नहीं सका.

इससे पहले भी आगरा में बदले जा चुके हैं कई नाम

– योगी सरकार बनने के कुछ समय बाद ही 17 अगस्‍त 2017 को खेरिया एयरपोर्ट का नाम बदलकर पं. दीनदयाल एयरपोर्ट किया गया था.
– वर्ष 1927 में बने आगरा विवि का नाम वर्ष 1996 में बदलकर डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय कर दिया गया था. उस समय प्रदेश में बसपा सरकार थी. नाम बदले जाने को लेकर काफी विरोध हुआ था, लेकिन सरकार की सख्ती के आगे किसी की नहीं चली थी.
– इसी तरह एमजी रोड कभी ठंडी सड़क/डबल रोड के नाम से जानी जाती थी.
– पालीवाल पार्क पूर्व में हीबिट पार्क हुआ करता था.
– सरदार पटेल उद्यान पूर्व में कंपनी गार्डन के नाम से जाना जाता था. इसे भारत में ठग ऑपरेशन करने वाले कर्नल स्लीमैन के नाम पर बनाया गया था.
– ब्रिटिश काल में ताजमहल और आगरा किला के बीच स्थित खंडहरों की जगह पर मैकडोनल्ड पार्क बनाया गया था. इसका नाम बदलकर उसी दौरान विक्टोरिया पार्क कर दिया गया था. विक्टोरिया की मूर्ति भी लगाई गई थी. आजादी के बाद यहां मोतीलाल नेहरू की प्रतिमा लगाई गई. आज उस मैकडोनल या विक्टोरिया पार्क रहे पार्क का आधा भाग मोतीलाल नेहरू और आधा भाग शाहजहां के नाम से जाना जाता है.

म्यूजियम में दिखाने लायक मुगलों का है क्या

रिपोर्ट्स के मुताबिक स्थानीय जानकार लोगों ने भी नाम बदले जाने को लेकर कहा कि प्रदेश सरकार के पास म्यूजियम में रखने-दिखाने लायक मुगलों से संबंधित कोई कलाकृति उपलब्ध नहीं है. इसके चलते मुगल म्यूजियम नाम रखना उचित नहीं होता. आगरा में तैनात रहे इतिहास में काफी दिलचस्पी रखने वाले एक आला पुलिस अधिकारी (DIG) के आगरा से काफी कलाकृतियां अपने साथ ले जाने और कभी नहीं लौटाने की बात भी सामने आई. आगरा में कमिश्नर रहे के. राम मोहन राव के समय म्यूजियम में प्रदर्शन के लिए एंटीक्विटी जुटाने को हुई बैठक में शहरवासियों ने इस मामले को उठाया भी था.

नाम, प्रतीकों या पहचान की राजनीति की अहमियत

नाम, प्रतीकों या पहचान की राजनीति को व्यर्थ नहीं कहा जा सकता. ये सबी कभी-कभी बहुत क्रांति या बड़े बदलाव या असर पैदा करते हैं. प्रथम स्वातंत्र्य समर के समय रोटी और कमल का प्रतीक चिन्ह हो, बाद के दिनों में वंदे मातरम, जय हिंद या इंकलाब जिंदाबाद का नारा हो, गांधीजी का दांडी में नमक बनाने का प्रतीकात्मक आंदोलन हो या महाराष्ट्र में लोकमान्य तिलक का गणेशोत्व या शिवाजी महोत्सव हो. इन सबने भारत की आज़ादी के आंदोलन में बड़ी भूमिका निभाई. आज़ादी के पहले तिरंगा लेकर सड़क पर निकलना भी ब्रिटिश सरकार के खिलाफ एक साहसी प्रतिरोध था. जहां तक नाम का सवाल है तो गांधीजी ने राम का नाम लेकर देश को एक करने का बहुत बड़ा काम किया था. आजादी के बाद गुजरात में सोमनाथ मंदिर के पुनरोद्धार में भी पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद और गृह मंत्री सरदार पटेल ने इस तर्क को मजबूती दी थी.

Mughal Museum named on Shivaji maharaj in agra, मुगल बादशाह औरंगजेब ने आगरा में दिया था शिवाजी महाराज को धोखा, जानें- क्यों मजबूत है नाम बदलने की वजह

 

निर्माणाधीन भवन के प्रस्तावित नाम बदलने का गैरजरूरी विरोध

राजनीति में देश के लगभग सभी राज्यों में कई शहरों का नाम बदला जाना (कोलकाता, चेन्नई, मुंबई, बेंगलुरु वगैरह), उत्तराखंड और उत्तरांचल का मसला ऐसे कई प्रमुख उदाहरण हैं, जिन्हें काफी सकारात्मक ही माना गया. पश्चिम बंगाल के नाम को लेकर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की कोशिशें भी इन्ही दलीलों के सहारे आगे बढ़ रही है. देश में पक्ष हो या विपक्ष के दल सब इस मामले में एक समान हैं. लोक संस्कृति में भी कोई भी अपने परिवार में किसी नकारात्मक किरदार का नाम सामने नहीं आने देना चाहता. हर सुबह भगवान का या शुभ नाम लेने की अपनी प्राचीन परंपरा है. घरों, संस्थानों-प्रतिष्ठानों या ट्रेन तक के नाम रखे जाने में हम लोग काफी सावधानी रखते हैं.

सरकार को इसका संवैधानिक अधिकार है और इसके विधि सम्मत तरीके से सकारात्मक उपयोग में किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए. हां, अगर मामला इससे अलग वोटबैंक को खुश करने के लिए, सिर्फ विरोध के लिए या खबरों में आने के लिए विरोध करना हो तो और बात है. वो भी तब जब मुगलों से जुड़ा नाम सिर्फ प्रस्तावित और भवन निर्माणाधीन हो तो कहना ही क्या है. बहरहाल, भारत में राष्ट्रीय विचारों को बढ़ाने के लिए छत्रपति शिवाजी महाराज के नाम पर किसी जगह को जोड़ना हमेशा स्वागतयोग्य है. जब सामने मुगलों जैसे आक्रांताओं से जुड़ा विकल्प हो तब तो और ज्यादा.

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