नेताजी सुभाष चंद्र बोस अलग-अलग हालातों में बदल लेते थे पहचान, जानें ये खास तीन नाम

हम लोग नेताजी का एक ही नाम जानते हैं- सुभाष चंद्र बोस. लेकिन उनके कई नाम थे. परिस्थिति के अनुसार वह अपना नाम बदलते थे. 1941 में उन्हें जब कोलकाता में घर में नजरबंद कर दिया गया था तो और नेताओं की तरह आराम से घर में नहीं बैठे...
Netaji Subhash Chandra Bose Death Anniversary, नेताजी सुभाष चंद्र बोस अलग-अलग हालातों में बदल लेते थे पहचान, जानें ये खास तीन नाम

देश की आजादी के नायक रहे नेताजी सुभाष चंद्र बोस (Netaji Subhash Chandra Bose) की आज 75वीं पुण्यतिथि है. माना जाता है कि ताइपे में हुई विमान दुर्घटना में नेताजी का निधन हो गया था. उनकी देशभक्ति की कई सारी बातें आज लोग शेयर कर रह रहे हैं. उन्हें नमन कर रहे हैं.

आज हम आपको बता रहे हैं नेताजी सुभाष चंद्र बोस के वह नाम जिनका जिक्र 23 जनवरी 2000 (सुभाष चंद्र बोस की जयंती) पर प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने भाषण में किया था.

प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी (Atal Bihari Vajpayee) ने उस दौरान अपने भाषण में कहा था, ”हम लोग नेताजी का एक ही नाम जानते हैं- सुभाष चंद्र बोस. लेकिन उनके कई नाम थे. परिस्थिति के अनुसार वह अपना नाम बदलते थे. 1941 में उन्हें जब कोलकाता में घर में नजरबंद कर दिया गया था तो और नेताओं की तरह आराम से घर में नहीं बैठे.

Netaji Subhash Chandra Bose Death Anniversary, नेताजी सुभाष चंद्र बोस अलग-अलग हालातों में बदल लेते थे पहचान, जानें ये खास तीन नाम
File Pic-Netaji Subhash Chandra Bose

पहरे की नजर बचाकर, अंग्रेजी साम्राज्य की आंखों में धूल झोंककर नेताजी रात के अंधेरे में चुपचाप अंग्रेजों के पहरे से उसी तरह से निकल गए जिस तरह से छत्रपति शिवाजी महाराज औरंगजेब के पहरे से निकले थे. नेताजी अदृश्य हो गए और उस समय उन्होंने अपना नाम रखा था मौलवी जियाउद्दीन. नेताजी ने मौलवी जियाउद्दीन का रूप धारण कर लिया. लेकिन इतना काफी नहीं था.

जब वे जर्मनी में पहुंचे तो उन्होंने अपना नाम रखा औरलेंडो मेजेरेटा. यह जर्मनी का नाम था. जब जापान गए, सबमरीन में बैठकर, तो कल्पना करिए- लड़ाई के दिनों में सबमरीन पानी की भीतर चलती है, पल-पल खतरा है, लेकिन नेताजी को सुरक्षित जाना था. नेताजी पनडुब्बी में गए और वहां पर अपना नाम रखा कमांडर मक्सूदा. नेताजी की रणनीति यह थी कि भारत को आजाद कराने के लिए कोई ना कोई रास्ता निकाला जाए.

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इस भाषण का जिक्र सूचना और प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार के प्रकाशन विभाग से छपी पुस्तक (अटल बिहारी वाजपेयी के चुने हुए भाषण) में मिलता है.

अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने भाषण में कहा था, ”नेताजी जानते थे कि अंग्रेज अपनी फौज के बल पर हमारे ऊपर राज करते हैं. भारत एक पुराना देश है. भारत के लोग शक्तिशाली हैं, प्रतिभा संपन्न हैं त्यागी और बलिदानी भी हैं. लेकिन, आपस में मिलकर नहीं रहते, प्रेम से नहीं रहते देश की चिंता जितनी करनी चाहिए उतनी नहीं करते.

नेताजी ने सोचा कि अगर जिस फौज के बल पर अंग्रेज राज करते हैं उसमें बगावत हो जाए, 1857 में हुई थी. नेताजी ने आईएनए का गठन किया और उस आईएनए को लेकर भारत की स्वाधीनता के लिए आगे बढ़ाना चाहते थे. यह आरोप गलत है कि वह जापानियों से मिल गए थे या जर्मनों से मिल गए थे. नेताजी महान देशभक्त थे. नेताजी की रग-रग में देशभक्ति का ज्वार भरा हुआ था. वे किसी के इशारे पर चलें इसका तो प्रश्न ही पैदा नहीं होता.

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जय हिंद का नारा

अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था, ”जय हिंद का नारा नेता जी ने देश को दिया था. इस नारे में बड़ी प्रेरणा है, सब को जोड़ने की शक्ति है. आजाद हिंद सेना स्वाधीनता की प्राप्ति के लिए, जिसका गठन नेताजी ने किया था, इसी नारे को लगाते हुए आगे बढ़ी थी. युद्ध में उतरी थी. आज यह नारा सारे भारत का नारा बन गया है. नेताजी ने नगर आजाद हिंद सेना का गठन ना किया होता और उसके पहले अगर हमारी नियमित सेना में बगावत ना हुई होती तो शायद अंग्रेजों को भारत से जाने में और भी वक्त लगता.

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