निर्भया केस: जल्लाद से लेकर फांसीघर में मौजूद हर शख्स के लिए था ये पहला एक्सपीरिएंस

लगभग 7 साल 3 महीने के बाद निर्भया गैंगरेप (Nirbhaya Case) और हत्याकांड के चारों दोषियों को फांसी दिए जाने के मामले में कई दिलचस्प पहलू सामने आ रहे हैं.

लगभग 7 साल 3 महीने के बाद निर्भया गैंगरेप (Nirbhaya Case) और हत्याकांड के चारों दोषियों को फांसी दिए जाने के मामले में कई दिलचस्प पहलू सामने आ रहे हैं. निर्भया मामले में चारों दोषियों को फांसी पर लटकाने वाला पवन जल्लाद (Pawan Jallad) का यह अपना मौका था. पवन जल्लाद के परदादा लक्ष्मी जल्लाद, दादा कालू जल्लाद और पिता मम्मू सिंह जल्लाद ने पवन से पहले तमाम मुजरिमों को फांसी पर चढ़ाया था.

पवन ने भी उन सबके साथ कई फांसियों में जाकर फांसी देने की तकनीक सीखी थी. लेकिन यह पहला मौका था, जब उसे जिंदगी में पहली बार अकेले ही मुजरिम को फांसी पर चढ़ाने का मौका मिला. वह भी एक-दो को नहीं, बल्कि पहली ही बार में चार-चार मुजरिमों को एक साथ फांसी दिया.

तिहाड़ जेल के महानिदेशक और सुपरिंटेंडेंट

अब बात करते हैं तिहाड़ जेल के महानिदेशक संदीप गोयल की. संदीप गोयल अग्मूटी काडर के वरिष्ठ आईपीएस हैं. वह दिल्ली सहित देश के कई केंद्र शासित राज्यों में कई महत्वपूर्ण पदों पर तैनात रह चुके हैं. उनके आईपीएस कार्यकाल में भी यह पहला मौका आया, जब उन्हें तिहाड़ जेल का महानिदेशक रहते हुए एक साथ चार-चार अपराधियों को फांसी पर चढ़वाने की कानूनी प्रक्रिया का अनुभव हुआ.

निर्भया के मुजरिमों को फांसी के फंदे तक पहुंचाने की जद्दोजहद भरे ये दो-तीन महीने कैसे थे? इस सवाल का जवाब संदीप गोयल से बेहतर कोई नहीं दे सकता है. तिहाड़ जेल नंबर-तीन के फांसी घर में शुक्रवार तड़के (20 मार्च, 2020) साढ़े पांच बजे फांसी पर टांगा गया, उस जेल के सुपरिंटेंडेंट एस. सुनील की भी जिंदगी में किसी को बतौर जेल सुपरिंटेंडेंट फांसी के फंदे पर चढ़वाना और चढ़ते हुए देखने का यह पहला मौका था.

एस. सुनील अन्य जेल से कुछ वक्त पहले ही तिहाड़ जेल में ट्रांसफर होकर पहुंचे थे. सूत्रों ने बताया कि तिहाड़ जेल नंबर-3 में 6-7 डिप्टी सुपरिटेंडेंट इस वक्त तैनात हैं. एक-दो को छोड़कर ये सब भी नए हैं. यानी इन सबका भी फांसी घर और फांसी की सजा अमल में लाकर अंजाम तक पहुंचाए जाने का यह पहला अनुभव रहा.

पोस्टमॉर्टम करने वाले डॉक्टर 

कमोबेश इसी तरह का आलम तिहाड़ जेल के अपर महानिरीक्षक राज कुमार का भी रहा. राज कुमार तीन साल से तिहाड़ जेल में तैनात हैं. लेकिन उन्होंने भी अपनी जेल की नौकरी के दौरान कभी किसी को फांसी दिलवाए जाने की जिम्मेदारी इससे पहले नहीं निभाई थी.

इतना ही नहीं निर्भया के चारों मुजरिमों के शव का पोस्टमॉर्टम करने वाले पैनल के चेयरमैन बनाए गए डॉ.बी.एन.मिश्रा की भी कमोबेश यही स्थिति रही. डॉ.बी.एन. मिश्रा की गिनती दिल्ली के चुनिंदा और पुराने फॉरेंसिक साइंस एक्सपर्ट्स के रूप में होती है. एक साथ चार-चार फांसी के मुजरिमों के शव का पोस्टमार्टम कराने का उनकी भी जिंदगी का यह पहला बेहद जटिल अनुभव रहा है. डॉ. बी.एन. मिश्रा दीन दयाल उपाध्याय अस्पताल, दिल्ली के फॉरेंसिक साइंस विभाग के अध्यक्ष हैं.

इतना ही नहीं, तिहाड़ जेल मुख्यालय के सूत्रों ने बताया कि शुक्रवार के तड़के सुबह करीब चार से पांच बजे के बीच पश्चिमी दिल्ली जिले के उपायुक्त (डिप्टी कमिश्नर) तिहाड़ जेल नंबर चार में कानूनी कार्यवाही के लिए पहुंचे. उनकी नौकरी में भी यह पहला मौका था, जब उन्होंने किसी फांसी के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए हों.

(आईएएनएस)

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