अभिजीत बनर्जी ने जीता नोबेल, इधर मच्छी और ढोकला खाने वालों के बीच छिड़ गई ‘जंग’

ये बहस तब शुरू हुई जब मच्छी मांस खाने वालों ने खुद को ढोकला खाने वालों से बेहतर बताना शुरू किया.

अभिजीत बनर्जी को अर्थशास्त्र का नोबेल मिला तो दुनिया भर में कई स्तर पर बहसें शुरू हो गईं. लेकिन सबसे अजब बहस वो थी जो सोशल मीडिया पर चल रही थी. बंगाली भारतीय मूल के अर्थशास्त्री अभिजीत को गरीबी कम करने की दिशा में प्रयोग करने के लिए नोबेल दिया जा रहा है. सोशल मीडिया बहसों के केंद्र में शाकाहारी बनाम मांसाहारी का माहौल बन चुका है.

मंगलवार को ट्विटर पर इस बात को लेकर ‘युद्ध’ छिड़ गया कि लोग मांस मच्छी खाकर नोबेल ला रहे हैं और ढोकला खाने वाले कुछ नहीं पा रहे. बात आगे तब बढ़ी जब अपर्णा नाम के एक ट्विटर हैंडल से ट्वीट किया गया:

‘प्रिय ढोकला खाने वालों. हमने तुम्हें 6 नोबेल, 1 लाइफटाइम अचीवमेंट के लिए ऑस्कर, राष्ट्रगान और वंदेमातरम दिया. हम मछली, मटन, बीफ और पोर्क खाते हैं. तुम अपना ढोकला खांडवी और थेपला हमसे दूर रखो.’

इसके बड़ी संख्या में रिट्वीट होने पर रिएक्शन आने शुरू हो गए. मिस्टर सिन्हा नाम के हैंडल से ट्वीट किया गया कि ‘एक ढोकला खाने वाला राष्ट्रपिता है, एक ढोकला खाने वाले ने देश को एक किया और लौह पुरुष कहलाया, एक ढोकला खाने वाला देश का प्रधानमंत्री है, एक गृहमंत्री है और एक भारत का सबसे अमीर आदमी है जो तुम सब बीफ खाने वालों को खरीद सकता है.’

प्रतीक सिन्हा ने अपर्णा को जवाब में लिखा कि ‘ढोकला, थेपला मेरे घर में नाश्ते में हर हफ्ते बनते हैं. मैं आधा बंगाली आधा गुजराती हूं, अहमदाबाद में पैदा हुआ और रहता हूं. ये बंगाली शुचितावाद जिसमें बाकियों के कल्चर और खाने की आदतों का अक्सर मजाक उड़ाया जाता है, ये घटिया है.’

कुल मिलाकर इस मुद्दे पर अच्छी खासी बहस हो चुकी है. कुछ लोग गुजरातियों का गौरवगान कर रहे हैं तो कुछ लोग बंगालियों का. वहीं कुछ बैलेंस बनाने में भी लगे हुए नजर आए.