दिल्ली दंगों की कहानी पुलिस की जुबानी…कब क्या हुआ?

दिल्ली पुलिस के सूत्रों ने कहा, ‘हमने फायरिंग इसलिए नहीं कि क्योंकि बहुत लोग मारे जाते. किसी भी अफसर ने मौका नहीं छोड़ा. भीड़-भाड़ और बड़े इलाके में दंगे के बीच हर जगह पहुंचना आसान नहीं था.’
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दिल्ली के उत्तर पूर्वी क्षेत्र में हुई उत्तर पूर्वी दिल्ली में इस सप्ताह की शुरुआत में नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के समर्थक व विरोधियों के बीच हुई हिंसा के दौरान काफी तबाही देखने को मिली. इस हिंसा में अब तक 42 लोगों की मौत हो चुकी है. दिल्ली तीन दिन तक धूं-धूं कर जली. इस दौरान सैकड़ों मकानों, दुकानों, स्कूल, फैक्टरियां और वाहनों को आग के हवाले कर दिया गया. पुलिस के के सूत्रों ने मीडिया को बताया कि दिल्ली में ये दंगे कब और कैसे शुरू हुए. दिल्ली पुलिस की जुबानी जानिए दिल्ली दंगो का पूरा हाल…

  • 22 तारीख को जाफराबाद मेट्रो स्टेशन के नीचे  लोग आकर बैठे. हमारे पास ये जानकारी थी ये लोग हिंसा कर सकते हैं. रात करीब 10:30 बजे 1000 लोग आकर बैठ गए.
  • उनके साथ बच्चे और महिलाएं थीं, उस वक्त रात में फोर्स का प्रयोग करना ठीक नहीं था. ये लोग अंदर गलियों से आये थे, इनमें पिंजरा तोड़ से जुड़ी लड़कियां भी शामिल थीं.
  • एक ग्रुप बाहर से था जो लोकल लोगों की भी बात नहीं सुन रहा था. जाफराबाद रोड पर पीछे की तरफ दूसरे लोग पहले से ही सड़क किनारे बैठे थे. ये इलाका सबसे ज्यादा घनी आबादी वाला है.
  • इसके बाद हिन्दू संगठनों ने कॉल किया कि हम सुबह मौजपुर चौक पर प्रदर्शन करेंगे. हमने उन्हें बहुत समझाया लेकिन वो नहीं माने. उनका कहना था कि अगर ये प्रोटेस्ट कर सकते हैं तो हम क्यों नहीं. उसके बाद दोनों तरफ से पत्थरबाजी शुरू हो गई
  • इसी बीच शाम को चांदबाग में हिंसा शुरू हुई, पुलिस ने बल प्रयोग किया और शांत कराया. हमारे पास जितनी भी फोर्स थी हमने सभी सवेंदनशील इलाकों में तुरंत लगा दी.
  • हमने 24 तारीख को सुबह 9-10 बजे के बीच डीसीपी शाहदरा को चांदबाग भेजा. वहां डीसीपी,एसीपी गोकुलपुरी को बुरी तरह मारा गया और रतनलाल को गोली मार दी गयी.
  • वहां जो 4 कंपनी फोर्स थी वो भीड़ के चलते यहां वहां हो गयी क्योंकि कोई अफसर नहीं था. डीसीपी ईस्ट मौजपुर में फंसे थे और डीसीपी नार्थ ईस्ट अलग-अलग जगहों पर स्थिति संभालने में लगे थे
  • स्थिति और खराब हो रही थी, उसके बाद अलग-अलग जिलों से अफसर और फोर्स बुलाये गए. उसी दिन शाम को 4 बजे वज़ीराबाद और 66 फीटा रोड सबसे पहले खाली कराए गए. दोनों समुदाय के लोग सामने थे और जबरदस्त फायरिंग कर रहे थे, दोनों पुलिस के खिलाफ थे.
  • 93 लोगों से ज्यादा लोगों को गोली लगी. हमने फायरिंग इसलिए नहीं कि क्योंकि बहुत लोग मारे जाते. किसी भी अफसर ने मौका नहीं छोड़ा. भीड़-भाड़  और  बड़े इलाके में दंगे के बीच हर जगह पहुंचना आसान नहीं था. फोर्स का तुरंत मोबलाइजेशन करना आसान नहीं.
  • 25 तारीख को बहुत जगहों से पीसीआर कॉल आ रहे थे. हमने पहले मेन रोड खाली कराए फिर रात होते-होते हमने अंदर के इलाकों में हिंसा रोकी.
  • हमें जितनी फोर्स मिलती गई हम उस हिसाब से हालात पर काबू पाते गए. पूरी उत्तरी पूर्वी दिल्ली में हर जगह फायरिंग हुई. कहीं-कहीं अचानक हिंसा हुई तो कहीं पूरी प्लानिंग से. हर तरह के लोगों और समूहों के अपने एजेंडे थे.
  • हमने बहुत लोगों को रेस्क्यू भी कराया. कुछ जगहों पर पुलिस ने हालात कंट्रोल करने के लिए  फायरिंग भी की. 20 दिसंबर को जाफराबाद में 40 हजार लोगों की भीड़ हुई लेकिन उस दिन हमने बात की और लोग चले गए.

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