इटावा के इस कलेक्टर ने बनाई थी कांग्रेस पार्टी, पढ़ें क्यों सुलगी थी ब्रिटिश सरकार से विरोध की चिंगारी

कांग्रेस 28 दिसंबर को अपना स्थापना दिवस मना रही है. 135 साल के इतिहास में कांग्रेस कई बार उतार चढ़ाव से गुजरी है. आइए बात करते हैं कि कांग्रेस की शुरुआत किन परिस्थितियों में हुई.

भारत की सबसे पुरानी राजनैतिक पार्टी कांग्रेस (Congress) आज यानी 28 दिसंबर को अपना 135वां स्थापना दिवस मना रही है. अपनी स्थापना के बाद से इस पार्टी ने कई सारे उतार चढ़ाव देखे हैं. ऐसा भी कहा जा सकता है कि इस पार्टी से कई पार्टियां निकली हैं, क्योंकि इससे निकले बड़े चेहरों ने बाद में अपनी पार्टियां बनाई हैं.

बीजेपी आज देश की सबसे बड़ी पार्टी है तो उसे इस मुकाम पर पहुंचाने का श्रेय काफी हद तक कांग्रेस पार्टी के मौजूदा नेतृत्व को जाता है. बहरहाल कांग्रेस के अभी जो हालात हैं, ये पहली बार नहीं हुआ. 135 साल के इतिहास में कांग्रेस कई बार उतार चढ़ाव से गुजरी है. आइए बात करते हैं कि कांग्रेस की शुरुआत किन परिस्थितियों में हुई.

ब्रिटिश सरकार के अफसर ए ओ ह्यूम

कांग्रेस को स्थापित करने का श्रेय 1829 को इंग्लैंड में जन्मे एलन ऑक्टेवियन ह्यूम (Allan Octavian Hume) को जाता है. ह्यूम ने 1849 में ब्रिटिश शासन के अंतर्गत ‘बंगाल सिविल सेवा’ पास की और सरकारी अधिकारी बन गए. 1857 में जब क्रांति हुई तो वे इटावा में कलेक्टर पद पर तैनात थे.

ए ओ ह्यूम जल्दी ही खुद ब्रिटिश सरकार के आलोचक हो गए और 1882 में उन्होंने अपना पद छोड़ दिया. 1985 में ह्यूम ने कांग्रेस यूनियन का गठन किया. उन्हीं के नेतृत्व में बॉम्बे में पार्टी की पहली बैठक हुई जिसके अध्यक्ष व्योमेश चंद्र बनर्जी थे.

कांग्रेस पार्टी ने शुरुआती समय में ब्रिटिश सरकार के साथ मिलकर भारत की समस्याओं को सुलझाने का प्रयास किया. 1905 आते-आते पार्टी का रुख ब्रिटिश सरकार के खिलाफ हो गया और आंदोलन शुरू हो गए. यही समय था जब महात्मा गांधी भारत लौट चुके थे और उन्होंने खिलाफत आंदोलन की शुरुआत कर दी.

कांग्रेस के अंदर महात्मा गांधी का कद बड़ा था और वही मुख्य विचारक थे. इस वजह से पार्टी के अंदर मतभेद पैदा हुए और चितरंजन दास, एनी बेसेंट और मोतीलाल नेहरू ने अलग पार्टी बना ली. पहले विश्वयुद्ध के बाद गांधी का कद पार्टी में और बड़ा हो गया लेकिन वे आधिकारिक तौर पर अध्यक्ष नहीं बने. कहा जाता है कि सुभाष चंद्र बोस को कांग्रेस से निकलवाने में उनकी भूमिका प्रमुख थी.

स्वतंत्र भारत में कांग्रेस

गांधी का सपना था कि आजादी के बाद कांग्रेस को भंग कर दिया जाए लेकिन ऐसा नहीं हुआ. बल्कि कांग्रेस आजाद भारत में सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टी के रूप में स्थापित हो गई. गांधी की हत्या और सरदार पटेल की मृत्यु के बाद जवाहरलाल नेहरू के हाथ में इसकी कमान आई और 1967 तक कांग्रेस को लगातार शीर्ष पर रखा. नेहरू ने अपने कार्यकाल में धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद और गुट निरपेक्ष विदेश नीति को सरकार और कांग्रेस का आधार बनाया, जिसमें तब से अब तक कई बार बदलाव देखने को मिले हैं.

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