राहुल के रास्ते चल आरजेडी की बर्बादी की कहानी लिख रहे हैं तेजस्वी यादव

अगर लालू यादव सक्रिय होते तो उनकी मिमिक्री करने वाले का वीडियो वायरल नहीं होता. यहीं तेजस्वी यादव ( Tejashwi Yadav ) चूक कर रहे हैं. वो अपने पिता की तरह खूंटा गाड़ कर राजनीति करना नहीं जानते.

राहुल छुट्टियों से कोई समझौता नहीं करते.  देश की ग्रांड ओल्ड पार्टी कांग्रेस ( Congress ) के कार्यकर्ता राहुल गांधी ( Rahul Gandhi ). अभी हाल ही में अध्यक्ष पद छोड़ खुद को अदना सा वर्कर घोषित किया है. कमान माँ के पास है, इसलिए अब तो और चिंता नहीं. चर्चा है थाइलैंड गए हैं. उधर महाराष्ट्र और हरियाणा में कांग्रेस से रिसाव जारी है. कई कद्दावर चुनाव से ठीक पहले पार्टी छोड़ रहे हैं. बिहार में राहुल के साथी तेजस्वी यादव (Tejashwi Yadav ) और उनके पिता की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल ( RJD ) का भी वही हाल है.

राहुल गांधी ( Rahul Gandhi ) और तेजस्वी यादव ( Tejashwi Yadav )  की समानता का जिक्र करना बेकार है. आप जानते होंगे. दोनों को पार्टी की कमान जनाधार के साथ मिली. विरासत में. और दोनों ने अपने प्रयासों से बेड़ा गर्क कर दिया.

फर्क भी देख लीजिए. राहुल गांधी ने कमान छोड़ दी. बागडोर सोनिया गांधी के वापस चली गई. यहां तेजस्वी (Tejashwi Yadav ) फंस गए हैं. वो चाह कर भी कमान लालू यादव ( Lalu Prasad Yadav ) को नहीं सौंप सकते. न ही लालू ले सकते हैं. चारा घोटाले के सजायाफ्ता की राजनीतिक पारी खत्म हो चुकी है.

राहुल की नकल

फिर राहुल की नकल कर तेजस्वी सिर्फ अपने पिता की मेहनत पर पानी ही फेर सकते हैं. मोदी लहर में लुटिया डुबोने के बाद भी राहुल मंथन पर विदेश गए. लौट कर आए तो संसद में सिर्फ सशरीर ही पाए गए. ट्वीट हथियार बन कर रह गया. यही हाल तेजस्वी यादव का है.

राहुल के रास्ते पर चलते हुए तेजस्वी यादव (Tejashwi Yadav ) बिहार की सियासी जमीं से मानो गायब हो गए हों. लोकसभा चुनाव में धूल में मिटी आरजेडी ( RJD ) को दोबारा खड़ी करने की कोशिश के बदले तेजस्वी ने क्या किया ? वो नेपथ्य में चले गए. विधानसभा का सत्र चल रहा था और वो गायब रहे.

ये खूंटा ठोक कर राजनीति करने वाले लालू की छवि से मेल नहीं खाती. वो भी तब जब आप सदन में विपक्ष के नेता हैं. पार्टी की कमान संभाल रखी है. यही नहीं आरजेडी की ओर से सीएम कैंडिडेट हैं. लौट कर आए तो राहुल की तरह ट्वीट कर दिया. बीमारी का इलाज करा रहे थे.

तेजस्वी को खूंटा गाड़ना नहीं आता

क्या तेजस्वी यादव ने ये सोंचा कि तीन माह का कनफ्यूजन हार से टूट गए आरजेडी ( RJD ) कैडर को क्या करने पर मजबूर करेगा ? और आने के बाद भी कौन सी राजनीति तेजस्वी कर रहे हैं. न घर संभल रहा है , न पार्टी.

फिर कांग्रेस ( Congress )  की ओर लौटते हैं. सोनिया ने कमान संभालते ही कहा कि सोशल मीडिया से खोया जनाधार वापस नहीं आएगा, मैदान में उतरिए.  लेकिन तेजस्वी इस मामले में फेल साबित हो रहे हैं.

जब पटना पानी में गोता लगा रहा था, तब न कहीं आरजेडी का कार्यकर्ता नजर आया और न ही तेजस्वी यादव. लालू होते तो उनकी मिमिक्री करने वाले का वीडियो वायरल नहीं होता.

यहीं तेजस्वी पिट रहे हैं. बिहार में 81 विधायकों के साथ सबसे बड़ी पार्टी के नेता को नहीं मालूम की कौन सी रणनीति अपनाएं. अगले साल विधानसभा चुनाव है. अगर लोकसभा चुनाव का डाटा देखें तो आरजेडी की मौजूदा 81 सीटों में 73 पर एनडीए आगे था.

2014 में भी आरजेडी का यही हाल हुआ था. तब 20 परसेंट वोट मिले थे. लेकिन 2015 में नीतीश से हाथ मिला लालू ने बाउंस बैक किया. 2019 में आरजेडी का वोट शेयर 15 परसेंट रह गया है. सूरत-ए-हाल वही है लेकिन बाउंस बैक की जिम्मेदारी लालू के बदले तेजस्वी पर है. साथ में कांग्रेस.

तेजस्वी अगर लालू के बदले राहुल गांधी के रास्ते पर चलते रहे तो हश्र कांग्रेस वाली ही होगी.

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