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कृषि बिल पर विपक्ष का विरोध जायज या विशुद्ध राजनीति और निजी स्वार्थ हैं इसकी वजह

अब कृषि व्यापार और मार्केटिंग पर लक्षित विधेयक कानून बन चुके हैं और देश के सामने कृषि अर्थव्यवस्था में स्पर्धा से खुशहाली लाने का एक बहुत बड़ा अवसर है, बशर्ते इन सुधारों को लागू करने का काम मुस्तैदी से हो और पूरा किया जाए.

  • TV9 Hindi
  • Publish Date - 5:38 pm, Mon, 28 September 20
किसानों का विरोध प्रदर्शन
किसानों का विरोध प्रदर्शन

भारत में कृषि व्यापार और ट्रेड पर लक्षित सुधारों के लिए बने ताजा कानूनों पर बवाल थमने का नाम नहीं ले रहा है. विपक्षी राजनीतिक पार्टियां और कुछ किसान संगठन, खासकर पंजाब और हरियाणा में, सरकार के आश्वासन को मानने को बिलकुल तैयार नहीं हैं कि इन कानूनों से किसानों और अर्थव्यवस्था दोनों को फायदा होगा. क्या विपक्ष और विरोधी किसान संगठनों का सरकार में विश्वास का अभाव जायज कारणों से है, या इनका विरोध विशुद्ध राजनीतिक और निजी स्वार्थों पर आधारित है, आज की चर्चा इन्हीं सवालों पर.

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने जिन विधेयकों को 27 सितंबर को अपनी स्वीकृति दी वे हैं- पहला, किसान उपज व्‍यापार और वाणिज्‍य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक, 2020. दूसरा, किसान (सशक्‍तिकरण व संरक्षण) कीमत आश्‍वासन और कृषि सेवा पर करार विधेयक, 2020 और तीसरा आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक 2020.

इन तीनों कानूनों का अंतिम लक्ष्य क्या है?

पहले कानून का लक्ष्य APMC मंडियों के एकाधिकार को तोड़ना है, क्योंकि अभी किसान सिर्फ इन मंडियों में ही अपनी फसल बेच सकता है. दूसरे कानून का काम कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग को स्थापित करना है ताकि किसान अपनी फसल जिसे चाहे बेच सके और तीसरे कानून से अभी व्यापारियों द्वारा कृषि सामग्री के भंडारण यानी स्टोरेज पर लगी बंदिशें हट जाएंगी, हालांकि अभी भी कुछ चीजों की स्टोरेज पर लिमिट और शर्तें जारी रहेंगी.

इन तीनों कानूनों को साथ मिला कर देखने की जरूरत है, क्योंकि तभी इनका असली प्रभाव समझ में आएगा. भारत सरकार का कहना है कि ये कानून किसानों का काम आसान करेंगे. किसानों को APMC मंडियों के बाहर बेरोकटोक अपनी फसल बेचने की आजादी होगी. इसके साथ ही किसान प्राइवेट प्लेयर्स के साथ बुवाई के पहले ही अपनी फसल बेचने का कॉन्ट्रैक्ट कर सकेंगे.

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इस व्यवस्था से फसल खरीदने और बेचने में जो कॉम्पिटिशन पैदा होगा, उससे कृषि अर्थव्यवस्था में बेहतर वैल्यू चैन बनेंगी, क्योंकि उत्पाद की मार्केटिंग कॉस्ट कम हो जाएगी, किसान को उसके माल की बेहतर कीमत मिलेगी और साथ-साथ उपभोक्ता यानी हमको और आपको भी कृषि से जुड़े उत्पाद सस्ते  दामों पर मिलेंगे.

इन कानूनों से निजी क्षेत्र के निवेशक भंडारण के लिए गोदाम, कोल्ड चेन आदि में पैसा लगाने में रुचि दिखाएंगे और इससे माल की बर्बादी कम होगी और अन्न, फल और सब्जियों की कीमतों में मौसम के हिसाब से जो ऊंच नीच होती है, इस पर भी बेहतर नियंत्रण रह सकेगा.

क्या है किसानों का डर?

दूसरी ओर, इन कानूनों का विरोध करने वाले किसानों को डर है कि इनसे MSP यानि न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था को खत्म करने का रास्ता खुल जाएगा और किसान बड़ी कृषि उत्पाद कंपनियों के साथ तय होने वाली कीमतों पर आश्रित हो जाएंगे. विरोधी किसानों का कहना है कि भारत सरकार इन कानूनों से कॉर्पोरेट्स को फायदा पहुंचाने की कोशिश कर रही है.

पहले MSP की बात करते हैं. कृषि लागत और कीमत आयोग के पूर्व अध्यक्ष और कृषि विशेषज्ञ, डा. अशोक गुलाटी का कहना है कि MSP 1965 में लागू हुआ था. तब से अब तक सिर्फ 6 फीसदी किसानों को इसका फायदा हुआ है. यानी 94 फीसदी किसान इसके बाहर हैं. फिर, हमेशा APMC मंडियों में तय MSP पर फसल बिके इसकी भी कोई गारंटी नहीं है. बहुत बार फसल MSP से काफी कम कीमत पर बिकती है और लाचार किसान हाथ जोड़े देखता रह जाता है.

मंडियों में किसानों को साढ़े 8 प्रतिशत कमीशन भी देना पड़ता है जो उनको मिलने वाली रकम को और कम कर देता है. साढ़े 8 प्रतिशत कमीशन में ढाई प्रतिशत आढ़तियों को जाता है, पंजाब में 3 प्रतिशत मंडी टैक्स राज्य सरकार लेती है और 3 प्रतिशत ग्रामीण विकास सेस की मद में जाता है. यानी साधारण किसान के लिए ये मुनाफे का सौदा बिलकुल नहीं है.

ध्यान देने वाली बात ये है कि साल 2012 में कांग्रेस भी कृषि सुधारों से उन्हीं फायदों का जिक्र कर कर रही थी जो अभी वर्तमान केंद्र सरकार कर रही है. लेकिन अब दोनों गठबंधनों ने अपने स्टैंड बदल लिए हैं. शायद उन्हें अभी इसमें कोई राजनीतिक अवसर दिखाई दे रहा हो.

सिब्बल ने की थी कृषि सुधारों की वकालत

2012 में संसद में कांग्रेस के कपिल सिब्बल जोरदार शब्दों में कृषि सुधारों की वकालत कर रहे थे. तब उनका कहना था कि किसान जब मंडी जाता है तो भंडारण के अभाव में उसका 40 फीसदी सामान खराब हो जाता है. 8 तरह के बिचौलिए मंडी में होते हैं, जो अपना कमीशन वसूल करते हैं और जो माल बाजार में बिकता है उस कीमत का लगभग 15 से 17 फीसदी ही किसान को मिलता है, बाकी बिचौलिए ले जाते हैं. तब कपिल सिब्बल ने विपक्ष यानी NDA के सांसदों से कहा था कि उन्हें तय करना चाहिए कि वे किसान के साथ हैं या बिचौलिए के साथ.

सिब्बल ने कृषि सुधारों के फायदे गिनाते हुए कहा था कि इनसे कमीशन खत्म हो जाएगा और किसान को समय पर पैसा मिलेगा. किसान को तकनीक का फायदा मिलेगा, कब फसल बोनी है, कितनी बोनी है, ये उसे पता होगा. मेहनत और माल की बर्बादी कम होगी और किसान को खरीदार मिलेगा ये सुनिश्चित रहेगा, क्योंकि ये प्री प्राइसिंग एग्रीमेंट में लिखा रहेगा.

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दूसरी ओर NDA की तरफ से बोलते हुए सुषमा स्वराज का कहना था कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में “आढ़ती” किसान का पारंपरिक एटीएम है और उसके दुख-सुख में काम आता है. उस समय NDA कृषि सुधारों का विरोध कर रहा था. अब कांग्रेस को जवाब देने की जरूरत है कि अगर 2012 में उसे कृषि सुधार सही लग रहे थे, तो अब क्यों वह इनका विरोध कर रही है? क्योंकि इन सुधारों के फायदे तो अभी भी वही हैं. विपक्ष ने वर्तमान केंद्र सरकार पर तीनों विधेयकों पर बहस से बचने का आरोप भी लगाया है.

यहां याद दिलाना जरूरी है कि साल 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार एक मॉडल कृषि विधेयक लेकर आई थी, जो संसद में बहस के बाद पास हुआ था, लेकिन कुछ राज्यों को छोड़ कर बाकी राज्यों में अलग-अलग कारणों से ये लागू नहीं हो पाया. सरकारें बदलीं, पार्टियों के रुख में बदलाव हुआ और 2012 में, जैसा हमने देखा, कपिल सिब्बल कृषि में प्राइवेट ट्रेडिंग के समर्थन में बोलते दिखे और सुषमा स्वराज इसके खिलाफ.

अब कानून बन चुके हैं कृषि विधेयक

तो, इस विषय पर बहस तो लगातार होती रही है विभिन्न मंचों पर, संसद के भीतर भी और बाहर भी, लेकिन लगता है कि विपक्ष की मांग कि तीनों विधेयक एक स्टैंडिंग कमिटी को, विचार के लिए भेजे जाने चाहिए थे, सिर्फ इस विषय को टालने की कोशिश थी. फिर ऐसा भी नहीं है कि देश के सभी राज्य इन कानूनों के खिलाफ हैं. बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक और केरल की सरकारें और किसान दोनों को APMC व्यवस्था से कोई लगाव नहीं है. उनकी राय की भी कद्र होनी चाहिए.

अब कृषि व्यापार और मार्केटिंग पर लक्षित विधेयक कानून बन चुके हैं और देश के सामने कृषि अर्थव्यवस्था में स्पर्धा से खुशहाली लाने का एक बहुत बड़ा अवसर है, बशर्ते इन सुधारों को लागू करने का काम मुस्तैदी से हो और पूरा किया जाए. अब सब कुछ कानून के कार्यान्वयन पर निर्भर है.