मोदी-जिनपिंग ही दूर करेंगे भारत-चीन बॉर्डर पर पैदा हुई टेंशन, अगली इन्‍फॉर्मल समिट में निकलेगा हल

भारत-चीन के बीच 3488 किलोमीटर लंबी सीमा रेखा हैं, जिसके बड़े हिस्से पर दोनों देशों के बीच दावेदारी को लेकर स्पष्टता नहीं है. पिछले एक महीने के घटनाक्रम में दोनों सेनाएं कई ऐसे लोकेशन पर गुत्थम-गुत्थी करती दिखी हैं, जहां पहले शांति बनी रहती थी.
border tension of India-China, मोदी-जिनपिंग ही दूर करेंगे भारत-चीन बॉर्डर पर पैदा हुई टेंशन, अगली इन्‍फॉर्मल समिट में निकलेगा हल

जब दिल्ली में पिछले साल 21 दिसंबर को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवल और चीन के विदेश मंत्री और स्टेट काउंसिलर वांग यी सीमा विवाद को सुलझाने के लिए स्पेशल रिप्रेजेटेंटिव स्तर की 22वें राउंड की बैठक कर रहे थे, उसी समय बीजिंग में चीन की सफलता के 70 साल को लेकर एक विशाल प्रदर्शनी लगाई गयी थी. चीन की सरकार ने अपनी इस प्रदर्शनी में वर्ष 1949 से लेकर वर्ष 2019 तक की महत्वपूर्ण उपलब्धियों को बताते हुए अलग-अलग पवेलियन बनाए थे.

टीवी9 भारतवर्ष को उस प्रदर्शनी में ये देखकर हैरानी हुई कि साल 1962 की घटनाओं को बताने वाले पवेलियन में भारत-चीन युद्ध का कोई जिक्र नहीं था. जबकि तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की चीन यात्रा को वर्ष 1988 के पवेलियन में दिखाते हुए भारत से संबंध पुनर्रस्थापित करने को चीन ने अपनी बड़ी सफलता बताया था.

चीन की डिप्लोमेसी में प्रतीकों और ऐसे संदेशों के महत्व को समझने वाले ये जानते हैं कि इसका अभिप्राय क्या है! छह महीने के भीतर ही वुहान ने इस स्पिरिट को डिसकनेक्ट कर दिया (मोदी-जिनपिंग के बीच 2018 और 2019 में हुए अनौपचारिक सम्मेलनों को वुहान स्पिरिट और चेन्नई कनेक्ट नाम दिया गया था).

देखिए NewsTop9 टीवी 9 भारतवर्ष पर रोज सुबह शाम 7 बजे

भारत-चीन के बीच 3488 किलोमीटर लंबी सीमा रेखा हैं, जिसके बड़े हिस्से पर दोनों देशों के बीच दावेदारी को लेकर स्पष्टता नहीं है. पिछले एक महीने के घटनाक्रम में दोनों सेनाएं कई ऐसे लोकेशन पर गुत्थम-गुत्थी करती दिखी हैं, जहां पहले शांति बनी रहती थी. हालांकि जमीनी स्तर पर गलतफहमियों को दूर करने के लिए दोनों देशों ने एक मैकेनिज्म बना रखा है, लेकिन ब्रिगेड कमांडर स्तर की कई बैठकों के बाद तनाव कम करने में सफलता नहीं मिली है.

चीन के इस आक्रामक तेवर को लेकर दुनिया भर के विशेषज्ञों की अलग-अलग राय है. कोई चीन के इस नए रूख को कोरोना मामले से दुनिया का ध्यान भटकाने की कोशिश बता रहा है. कोई अमेरिका और चीन की बढ़ते टकराहट में भारत से अमेरिकी नजदीकियों को जिम्मेदार ठहरा रहा है. भारत-चीन बाउंड्री नेगोसिएशन्स पर पैनी नजर रखने वालों का कहना है कि दोनों देशों द्वारा सीमा से संबंधित नक्शे की अदला बदली के बाद अब सेनाएं अपनी-अपनी पोजीशन को मजबूत करने में जुटी हैं.

कैसे निकलेगा हल

भारत-पाकिस्तान संबंधों से अलग भारत-चीन संबंधों में सबसे खास बात ये हैं कि दोनों देशों के बीच नीचे से लेकर उच्चतम स्तर तक सक्रिय बातचीत जारी रहती है. यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी साल भर में कई मुलाकातें करते हैं. तमाम बहुपक्षीय संगठन जैसे- ब्रिक्स, SCO, जी-20, आसियान के सदस्य देशों के तौर पर भी दोनों देश विभिन्न स्तर पर संपर्क में बने रहते हैं.

इन सबके अलावा मोदी और जिनपिंग के बीच पिछले दो साल से हो रहे अनौपचारिक सम्मेलन- वुहान (2018), महाबलिपुरम ( 2019) अब भारत-चीन संबंधों को गढ़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं. बिना एजेंडे वाले इन औपचारिक सम्मेलनों की महत्ता को लेकर मोदी की टीम में शामिल विदेश मंत्रालय के एक सीनियर अधिकारी का कहना है कि साल भर तक दोनों देशों के बीच पैदा हुए तनाव अगर निचले स्तर पर नहीं सुलझे तो इस बार चीन में होने वाले मोदी-जिनपिंग के अगले इनफॉर्मल समिट में इससे आगे बढ़ने का रास्ता निकाल लिया जाएगा.

Related Posts