बाबरी ध्वंस की कहानी सुन रोने लगे थे दिवंगत प्रभाष जोशी

प्रभाष जोशी कारसेवा के लिए केंद्र सरकार और संघ के बीच जो लोग मध्यस्थता कर रहे थे, उनमें से एक थे.

मैं फैजाबाद के इकलौते ठीक-ठाक होटल ‘शान-ए-अवध’ में ठहरा था. यहीं सौ से ज्यादा देशी-विदेशी पत्रकार ठहरे हुए थे. पूरा होटल पत्रकारों से भरा था. इस होटल की खासियत यह थी कि इसके सामने ही तारघर था और पड़ोस में जिलाधिकारी तथा कमिश्नर के सरकारी घर. यानी खबरों के केंद्र अगल-बगल. उस वक्त संचार माध्यमों में क्रांति नहीं हुई थी. तार, टेलेक्स, फैक्स का जमाना था.

होटल की सीढ़ियों पर फोटोग्राफरों ने डार्करूम बना रखा था. रेस्टोरेंट और रिसेप्शन पर पत्रकार साथी अपने-अपने टाइपराइटर लेकर बैठे थे. होटल के मालिक शरद कपूर और अनंत कपूर खुद रिसेप्शन पर आ सबको एस.टी.डी. की सुविधा देते थे. हम सब पहले अपने दफ्तर किसी तरह खबर पहुँचाने को आतुर थे. होटल में पत्रकारों की लाइन लगी थी.

मुझे अपने संपादक प्रभाष जोशी को पूरी घटना की जानकारी देनी थी. प्रभाष जी कारसेवा के लिए केंद्र सरकार और संघ के बीच जो लोग मध्यस्थता कर रहे थे, उनमें से एक थे. होटल में भीड़ देख बाहर आ मैंने पी.सी.ओ. से उन्हें फोन किया तो रामबाबू ने कहा, संपादक जी आपको ही ढूँढ़ रहे हैं. रामबाबू संपादक के सचिव थे.

ram mandir, बाबरी ध्वंस की कहानी सुन रोने लगे थे दिवंगत प्रभाष जोशी
प्रभाष जोशी ने कहा, “यह धोखा है, छल है, कपट है.”

मैंने प्रभाष जी को बाबरी ध्वंस की पूरी कहानी बताई. प्रभाष जी रोने लगे. कुछ देर चुप रहे, फिर कहा, “यह धोखा है, छल है, कपट है. यह विश्वासघात है. यह हमारा धर्म नहीं है. अब हम इन लोगों से निपटेंगे.” प्रभाष जी विचलित थे. उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था और मैं दोपहर बारह बजे से शाम पाँच बजे तक के ध्वंस का पूरा हाल पाँच मिनट में उन्हें सुनाने की रिपोर्टरी उत्तेजना में था. उन्हें ‘ब्रीफ’ करने के बाद मैं अपनी रिपोर्ट लिखने चला गया.

(यह लेख वरिष्ठ पत्रकार हेमंत शर्मा की किताब युद्ध में अयोध्या से लिया गया है.)