जेडीयू से प्रशांत किशोर की छुट्टी ! नीतीश कुमार से मुलाकात में फैसला आज

नीतीश कुमार की राजनीति से समय-समय पर अपनी अलग राय रखकर वह पार्टी के भीतर भी बड़े नेताओं के गुस्से का शिकार होते रहे हैं. प्रशांत के नीतीश कुमार से करीबी की वजह से पहले उन पर दबी जुबान से हमले होते थे.

नागरिकता संशोधन कानून के लिए जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) और नीतीश कुमार की रणनीति से प्रशांत किशोर की नाराजगी उन पर भारी पड़ती दिख रही है. शनिवार शाम उनकी मुलाकात जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से होनेवाली है. बताया जा रहा है कि प्रशांत मुलाकात के बाद भी पार्टी के कदम से असहमत रहे तो उनकी छुट्टी तय है. इसके साथ ही बिहार विधानसभा चुनाव 2015 से पहले जेडीयू और नीतीश कुमार राजनीतिक प्रबंधक के तौर पर जुड़े प्रशांत किशोर का साथ खत्म हो जाएगा.

इसके पहले ही प्रशांत किशोर की ओर से जेडीयू के लिए साल 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में प्रचार अभियान से अपनी कंपनी आईपैक का नाता तोड़ने की बात सामने आ चुकी है. वहीं नीतीश कुमार की राजनीति से समय-समय पर अपनी अलग राय रखकर वह पार्टी के भीतर भी बड़े नेताओं के गुस्से का शिकार होते रहे हैं. प्रशांत के नीतीश कुमार से करीबी की वजह से पहले उन पर दबी जुबान से हमले होते थे. यह हमले अब तेज हो गए हैं.

नीतीश कुमार के इलाकाई दोस्त, पूर्व नौकरशाह और जेडीयू के राज्यसभा सदस्य आरसीपी सिंह ने शुक्रवार को प्रशांत किशोर के बारे में कहा कि पार्टी ने अपनी लाइन तय कर दी है, जिन्हें पसंद नहीं है वो अपना रास्ता चुनने के लिए स्वतंत्र हैं. उन्होंने कहा कि वह (प्रशांत किशोर) कौन हैं? वह पार्टी में कब आए ? संगठन का कौन सा काम उन्होंने किया है और अब वह कहां काम कर रहे हैं ? उनके जैसे लोग अनुकंपा के आधार पर पार्टी में आए हैं और अगर पार्टी की नीति के साथ नहीं हैं तो उन्हें अपना रास्ता चुनना चाहिए.

राजनीतिक प्रबंधक के रूप में पार्टी से जुड़े प्रशांत किशोर के पार्टी में शामिल होने, महागठबंधन की सरकार में मंत्री का दर्जा मिलने, पार्टी उपाध्यक्ष मनोनीत किए जाने और पार्टी के बैठकों में नीतीश के बगल में बैठने से उनको लेकर नीतीश के नजदीकी सिपाहसालारों में गुस्सा पनपने लगा था. नीतीश के सबसे करीबी माने जानेवाले नेता राजीव रंजन सिंह ललन, आरसीपी सिंह और संजय झा में इसको लेकर नाराजगी साफ दिखने लगी थी. इन नेताओं का मानना था कि बिना राजनीतिक अनुभव या योगदान के पार्टी में अहम पद दिया जाना सही नहीं है. बड़े नेता तो प्रशांत किशोर को राज्य की राजनीति में नौसीखिया ही मानते रहे.

दूसरी ओर महागठबंधन से दूर होकर एनडीए में शामिल होने के नीतीश कुमार के रुख पर भी प्रशांत की असहमति सामने आई थी. इसके बाद एनडीए के विरोधी दलों के लिए उनकी कंपनी आईपैक के काम करने पर सहयोगी दलों ने खासकर बीजेपी के नेताओं की नाराजगी भी सामने आने लगी थी. जेडीयू के उपाध्यक्ष रहते हुए प्रशांत की कंपनी पार्टी के सबसे बड़े विरोधी कांग्रेस के लिए पंजाब. यूपी में कांग्रेस और सपा, पश्चिम बंगाल में टीएमसी के बाद महाराष्ट्र में शिवसेना का काम करने की वजह से यह गुस्सा बढ़ता जा रहा था.

नागरिकता संशोधन कानून पर उनके हालिया रुख और लगातार तीसरे दिन भी ट्वीट से जेडीयू और एनडीए के दूसरे सहयोगी दलों के नेताओंका गुस्सा परवान चढ़ता दिख रहा है. अब मुमकिन है कि जेडीयू और नीतीश कुमार के साथ अब वह न दिख पाएं.

प्रशांत किशोर के काम करने का तरीका –

प्रशांत किशोर अपनी कंपनी इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमिटी की टीम के जरिए राजनीतिक प्रबंधन करते हैं. इस कंपनी में मीडिया टीम से जुड़े 25-30 लोग और सोशल मीडिया टीम में 40-50 लोग शामिल हैं. डाटा एनालिसिस से जुड़ी टीम में भी दसेक लोग जुड़े हैं. उन्होंने फील्ड ऑपरेशन टीम भी बनाई है. यह टीम चुनाव क्षेत्र में काम करती है. लोगों से फीडबैक लेने का काम भी यह टीम करती है.ये लोग इलाके के डॉक्टरों, किसानों, वकीलों, अध्यापकों जैसे ऑपीनियन मेकर लोगों से फीडबैक इकट्ठा करते हैं.

चुनाव क्षेत्र में काम करनेवाली टीम चुनाव क्षेत्र में जब काम करती है. वह इलाके का ऐतिहासिक आंकड़ा भी जुटाती है. वे लोग कौन सा बूथ मजबूत है और कौन सा कमजोर के हिसाब से रणनीति तैयार करते हैं. यह टीम जाति से जुड़े समीकरणों पर भी ध्यान देती है. यह टीम सर्वे भी करती है. उम्मीदवार के जीत की संभावना का आकलन भी यही टीम करती है. बूथ लेवल पर व्हाट्सएप ग्रुप बनाए जाते हैं जिसमें चुनाव से जुड़ी जानकारी दी जाती है. कार्टून और मीम भी ग्रुप पर भेजे जाते हैं. नेताओं को भाषण और मुद्दों के लिए इनपुट भी दिया जाता है.

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