, अब वहां भी मारे जाएंगे और यहां पीटे जाएंगे…! पढ़ें, एक कश्मीरी के बिहार से अजब प्रेम की गज़ब कहानी
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अब वहां भी मारे जाएंगे और यहां पीटे जाएंगे…! पढ़ें, एक कश्मीरी के बिहार से अजब प्रेम की गज़ब कहानी

, अब वहां भी मारे जाएंगे और यहां पीटे जाएंगे…! पढ़ें, एक कश्मीरी के बिहार से अजब प्रेम की गज़ब कहानी

कश्मीर में अभी अंधेरा चल रहा है. वहां न रोजगार है, न कोई साधन है. मौसम की भी वहां मार है, पाकिस्तान की भी और हिन्दुस्तान की भी. कोई माँ बाप ये नहीं चाहता है कि उसका बेटा आतंकवादी बने. पत्थरबाज बने. पुलिसवालों की गोलियों का शिकार बने. कोई नहीं चाहता.

जब हम कश्मीर जाते हैं, तो वहां की महिलाएं कहती हैं हमसे कि आप बाहर जाते हो तो इन्हें भी अपने साथ ले जाओ. यहां से चले जाएंगे तो सेफ रहेंगे. पत्थरबाज नहीं बनेंगे. इन्हें पुलिस नहीं परेशान करेगी. वो आँखों में आंसू लेकर कहती हैं कि आप चाहे तो इन्हें पैसे भी मत देना. हम दे देंगे. बस आप यहां से इन्हें ले जाओ.

6 महीने तक बच्चे बाहर रहते हैं तो हम सुकून में रहते हैं. हमारा कलेजा ठंडा रहता है. अठारह-बीस साल के बच्चे भटके न, इसीलिए हम उन्हें यहां ले आते हैं.यहां भी हमें मजदूर मिल जाते हैं, पर बच्चों को बचाने के लिए उन्हें हम कश्मीर से ही ले आते हैं. यहां पर यदि दस लोगों की जरूरत होती है तो हम उनको बीस दे देते हैं.

पटना में हमको जिंदगी मिली. 1983 में मैं यहां आया था. तब मेरी शादी भी नहीं हुई थी. मैं गठरी में शॉल वगैरह बेचता था. घर-घर जाकर. हर घर में हमें प्यार मिला, सम्मान मिला. जिस घर की मैं घंटी बजाता था, वहां पहले मुझे चाय और नाश्ता कराया जाता था. फिर वो हमसे सामान लेते थे. इतना ही नहीं. वो हमें अपने नातेदारों, रिश्तेदारों का पता भी देते थे और ये कहते थे कि जाओ इन्हें भी शॉल आदि बेच आओ. मेरा सर्कल इस तरीके से बढ़ता गया. एक साल में सब मेरे यहां अपने से हो गए.
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जहां हम मेला लगाते हैं, वहां एक मंदिर भी है. वहां हवन कुंड भी है. अक्टूबर से मार्च तक हम देखभाल करते हैं. मार्च के बाद मैदान का गेट बंद हो जाता है. अक्टूबर में नवरात्र, दशहरा और दिवाली के समय यहाँ यज्ञ होता है. यहां हम किसी को सिगरेट भी नहीं पीने देते. हम ये मानते हैं कि यज्ञ आदि होने के बाद ये जगह पवित्र हो गयी है.

अपने लोगों के ऊपर हुए हमले के बाद भी मैं दुखी नहीं हूं. कुछ लोगों के किये की सजा मैं सबको क्यों दूँ. जिन लोगों ने मुझे प्यार दिया, उनके लिए मेरी जान भी हाजिर है. एक आदमी की वजह से मैं उनकी खिदमत करना नहीं बंद करूंगा. फिर हम आएंगे. मुझे जो प्यार यहां की जमीं से मिला है, मैं उसे भूल नहीं सकता.

यहां से जाने के बाद मैं वापस आने का बड़ी बेसब्री से इंतज़ार करता हूँ. पटना की सरजमीं पर आते ही मेरे सारे दुःख दर्द दूर जाते हैं. लेकिन अब तो हम वहां भी मारे जाएंगे और यहां पीटे जाएंगे. मैं तो पूरा का पूरा बिहारी हो चुका हूं, फिलहाल जा रहा हूं. लेकिन हालात सुधरते ही वापस अपने बिहार लौट आऊंगा.

– जैसा हमारे संवाददाता को बशीर अहमद ने बताया

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