शहादत हकीकत, ”शहीद का दर्जा” सिर्फ फसाना, जानें आखिर क्‍या है सच

Share this on WhatsAppनई दिल्‍ली। जम्‍मू-कश्‍मीर के पुलवामा में हुए आत्‍मघती आतंकी हमले में 40 से ज्‍यादा सीआरपीएफ जवान शहीद हो गए. पीएम नरेंद्र मोदी ने इस घटना पर ट्वीट कर लिखा, ‘पुलवामा में सीआरपीएफ कर्मियों पर हमला घृणित है. मैं इस नृशंस हमले की कड़ी निंदा करता हूं. हमारे बहादुर सुरक्षाकर्मियों का बलिदान व्यर्थ […]

नई दिल्‍ली। जम्‍मू-कश्‍मीर के पुलवामा में हुए आत्‍मघती आतंकी हमले में 40 से ज्‍यादा सीआरपीएफ जवान शहीद हो गए. पीएम नरेंद्र मोदी ने इस घटना पर ट्वीट कर लिखा, ‘पुलवामा में सीआरपीएफ कर्मियों पर हमला घृणित है. मैं इस नृशंस हमले की कड़ी निंदा करता हूं. हमारे बहादुर सुरक्षाकर्मियों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा. पूरा देश बहादुर शहीदों के परिवारों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा है. घायल जल्दी ठीक हों.’

प्रधानमंत्री ने केवल ट्वीट ही नहीं किया बल्कि सीआरपीएफ जवानों के पार्थिव शरीर पर श्रद्धासुमन भी अर्पित किए. यहां तक किसी प्रकार की दिक्‍कत नहीं है, लेकिन समस्‍या यह है कि जिन सीआरपीएफ जवानों की ड्यूटी के वक्‍त हमले में जान गई, उन जवानों को प्रधानमंत्री मोदी ने शहीद कहकर पुकारा, मगर विंडबना यह है कि सरकार इन जवानों को शहीद नहीं मानती है. ”शहीद का दर्जा” इसे लेकर लंबे समय से बहस हो रही है, लेकिन हकीकत में ”शहीद का दर्जा” सिर्फ और सिर्फ इमोश्‍नल डोमेन में है। कई सालों से पैरामिलिट्री फोर्सेज की ओर से ”शहीद का दर्जा” को लेकर बहस हो रही है, लेकिन एक सच यह भी है कि ”शहीद का दर्जा” तो आर्मी में भी नहीं है.

दिल्‍ली हाईकोर्ट में पैरामिलिट्री फोर्स के जवानों को शहीद का दर्जा दिलाने के लिए डाली गई एक याचिका में बताया गया कि पिछले 53 सालों में पैरामिलिट्री फोर्स के 31,895 जवानों ड्यूटी करते वक्‍त बलिदान दिया, लेकिन इन्‍हें शहीद का दर्जा नहीं मिला. पैरामिलिट्री फोर्सेज-सीआरपीएफ सीआईएसएफ, एसएसबी, असम राइफल्‍स, आईटीबीपी, नेशनल सिक्‍योरिटी गार्ड्स और बीएसएफ में 10 लाख से ज्‍यादा सुरक्षाकर्मी सेवा दे रहे हैं. पैरामिलिट्री फोर्सेज को शहीद का दर्जा न दिए जाने से जुड़े कई अहम सवाल खड़े हैं.

साल 2017 में एक आरटीआई डाली गई, इसमें शहीद/Martyr शब्‍द की परिभाषा पूछी गई थी. जवाब के लिए यह आरटीआई कई अधिकारियों की टेबल पर पहुंची, लेकिन जवाब से संतुष्टि नहीं मिलने के बाद आरटीआई डालने वाले सीआईसी से मदद मांगी. इन्‍फॉरमेशन कमिश्‍नर यशोवर्धन आजाद को डिफेंस और होम मिनिस्‍ट्रीज से इस संबंध में जो जवाब मिला, उसमें कहा गया कि मिनिस्‍ट्री ऑफ डिफेंस ”शहीद” शब्‍द का इस्‍तेमाल नहीं करते बल्कि वे बैटल कैजुअल्‍टी और ऑपरेशंस कैजुअल्‍टी जैसे शब्‍दों का इस्‍तेमाल किया जाता है. हां, सेना में ”शहीद” हुए जवानों को कई और प्रकार की सुविधाएं मिलती हैं.

-यदि किसी सैनिक की ड्यूटी के दौरान मौत हो जाए तो उसे 10 लाख रुपये की राशि मिलती है.

– आतंकी हमले में मौत हो जाने पर भी 10 लाख रुपये

– आतंकियों के खिलाफ एक्‍शन के दौरान मारे जाने पर 15 लाख

-युद्ध और युद्ध जैसे हालात में मौत पर 20 लाख रुपये

सेना में ”शहीद” जवानों को इसके अलावा भी कई सुविधाएं मिलती हैं

-”शहीद” की पत्‍नी या परिवार के किसी भी सदस्‍य को रिटायरमेंट तक 100 प्रतिशत पेंशन दी जाती है

-सेना में ”शहीद” के परिवार के सदस्‍य को राज्‍य सरकार नौकरी देती हैं

-रेल और हवाई किराए में छूट भी मिलती है

-पेट्रोल पंप और गैस एजेंसी आवंटन में शहीद के परिवारों को प्राथमिकता मिलती है, इसके अलावा मकान भी आवंटित किए जाते हैं

रिटायर्ड ब्रिगेडियर विवेक सोहेल के मुताबिक, सेना में भी ”शहीद का दर्जा” जैसी टर्म नहीं है. यहां तक कि सरकार के पास भी ”शहीद” की कोई परिभाषा नहीं है. वह कहते हैं कि सेना में अधिकारिक तौर पर ”शहीद” शब्‍द का इस्‍तेमाल नहीं होता है, लेकिन इमोश्‍नल डोमेन में यह टर्म मौजूद है. इस समय पुलवामा हमले में मारे गए सीआरपीएफ जवानों को देश ”शहीद” कह रहा है. सेना के जवानों को इसी प्रकार से ”शहीद” कहा जाता है. जहां तक सुविधाओं का सवाल है तो इसमें सेना और अर्द्धसैनिक बलों के बीच थोड़ा बहुत अंतर है. वह बताते हैं कि अर्द्धसैनिक बलों को ड्यूटी पर मौत के दौरान करीब 35 लाख मिलता है. ‘

यह बात सही है कि ”शहीद का दर्जा” आधिकारिक तौर पर सेना के पास भी नहीं है और पैरामिलिट्री फोर्सेज तो इसके लिए जंग लड़ ही रही हैं। तर्क यह है कि भले ही ”शहीद” शब्‍द का इस्‍तेमाल सेना में भी नहीं होता है, लेकिन वहां वतन के लिए प्राण देने वाले सपूतों के लिए कई प्रकार के प्रावधान हैं।

सेना की तुलना में पैरामिलिट्री फोर्सेज के पास कुछ अधिकारों की कमी है:

-सेना के जवानों के लिए लगभग हर ट्रेन में अलग डिब्बे होते हैं। ऐसा प्रावधान पैरामिलिट्री के लिए नहीं है। बमुश्किल 4 से 6 ट्रेनों में सीआरपीएफ और बाकी पैरामिलिट्री के लिए कुछ सीटें आरक्षित हैं।

-शहादत के बाद सेना में परिवारवालों को राज्य सरकार में नौकरी में कोटा, एजुकेशन इंस्टीट्यूट में बच्चों के लिए सीटें रिजर्व हैं. पैरामिलिट्री के लिए ऐसी सुविधा नहीं है.

-एंट्री लेवल पर पैरामिलिट्री के जवानों को 21 हजार रुपये सैलरी मिलती है, जबकि डिफेंस फोर्सेज में यह 35,000 है.

कुल मिलाकर देखा जाए तो सेना और पैरामिलिट्री फोर्सेज को मिलने वाली सुविधाओं को लेकर बहस हो सकती है, लेकिन इस तर्क का जवाब किसी के पास नहीं कि अगर सेना का जान दुश्‍मन से लड़ता है तो बॉर्डर पर बीएसएफ का जवान भी तो गोली खाता है. किसे कितनी मुआवजा मिले, कितनी सुविधाएं मिलें, अलग-अलग परिस्थितियों के आधार पर इसे तय किया जा सकता है, लेकिन ”शहीद का दर्जा” सेना को भी आधिकारिक तौर पर मिले और पैरामिलिट्री को भी। अब यह बेहद जरूरी है कि सरकार ”शहीद” को पारिभाषित करे और देश के लिए प्राण न्‍योछावर करने वाले हर सपूत को ”शहीद का दर्जा” आधिकारिक तौर पर प्रदान किया जाए।

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