भारतीय राजनीति के ये 7 मैदान हैं गेम चेंजर

नयी दिल्ली भारतीय लोकतंत्र की अब तक की चुनावी यात्रा बड़ी दिलचस्प रही है. भारत के लोकतंत्र को अपनी इस यात्रा में कई पड़ावों से होकर गुजरना पड़ा है. इन विभिन्न पड़ावों के अनुभव लोकतंत्र को मजबूत करने में काम आए हैं. लोकतंत्र का सबसे अहम पहलू है चुनाव, जो चुनावी रैलियों के बगैर पूरे […]

नयी दिल्ली
भारतीय लोकतंत्र की अब तक की चुनावी यात्रा बड़ी दिलचस्प रही है. भारत के लोकतंत्र को अपनी इस यात्रा में कई पड़ावों से होकर गुजरना पड़ा है. इन विभिन्न पड़ावों के अनुभव लोकतंत्र को मजबूत करने में काम आए हैं. लोकतंत्र का सबसे अहम पहलू है चुनाव, जो चुनावी रैलियों के बगैर पूरे नहीं होते. स्वतंत्र भारत के इतिहास में अब तक कई ऐतिहासिक चुनावी रैलियां हुई हैं. इन रैलियों ने भारतीय राजनीति की दशा और दिशा को बदलने में खास भूमिका निभाई है.

आज हम इन रैलियों की बात नहीं करेंगे. बल्कि हम बात करेंगे उन मैदानों की जहां पर इन ऐतिहासिक चुनावी रैलियों को अंजाम दिया गया. जी हां, भारत में कई ऐसे ऐतिहासिक मैदान हैं जहां भारतीय राजनीति की नई इबारतें लिखी गई हैं. ये वो मैदान हैं जो ऐतिहासिक चुनावी रैलियों में जुटी लाखों की भीड़ का गवाह रहे हैं. इन मैदानों पर हुई कई रैलियां गेम चेंजर साबित हुई हैं.

1. रामलीला मैदान
इस मैदान का उल्लेख किए बिना भारतीय राजनीति का इतिहास अधूरा माना जाएगा. रामलीला मैदान में अब तक कई ऐसी चुनावी रैलियां हो चुकी हैं जो ऐतिहासिक मानी जाती हैं. इस मैदान पर आयोजित हुई ऐतिहासिक रैलियों ने भारतीय राजनीति पर अपनी गहरी छाप छोड़ी है. भारत की राजधानी नई दिल्ली में स्थित रामलीला मैदान आजादी की लड़ाई, पाकिस्तान पर जीत, इमरजेंसी, राममंदिर आंदोलन और जनलोकपाल जैसे अनेक ऐतिहासिक घटनाक्रमों का गवाह बना है.

बताते हैं कि इस मैदान को अंग्रेजों ने साल 1883 में बनवाया था. इसे ब्रिटिश सैनिकों के शिविर के लिए तैयार किया गया था. कुछ सालों बाद इस मैदान में रामलीलाओं का आयोजन किया जाने लगा. इसके चलते इसे रामलीला मैदान के रूप में जाना जाने लगा. गुलाम भारत में भी रामलीला मैदान कई ऐतिहासिक घटनाक्रमों का साक्षी बना.

स्वतंत्र भारत में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने दिसंबर 1952 में रामलीला मैदान में सत्याग्रह किया था. मुखर्जी का यह सत्याग्रह जम्मू-कश्मीर के मुद्दे को लेकर था. साल 1965 में तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने पाकिस्तान के खिलाफ लड़ाई में रामलीला मैदान पर एक विशाल जनसभा को संबोधित किया था. इन जनसभा में उन्होंने ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा भी दोहराया था.

लोकनायक कहे जाने वाले जय प्रकाश नारायण का भी रामलीला मैदान से गहरा नाता रहा है. जेपी ने 25 जून 1975 को इसी मैदान पर विपक्षी नेताओं के साथ इंदिरा गांधी की तानाशाही सरकार को उखाड़ फेंकने का ऐलान किया था. भारतीय जनता पार्टी ने भी राम मंदिर आंदोलन के शंखनाद के लिए रामलीला मैदान को ही चुना था.

आपको याद होगा कि सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने साल 2011 में लोकपाल की मांग को लेकर रामलीला मैदान में आमरण अनशन किया था. साथ ही बाबा रामदेव भी काले धन और भ्रष्टाचार के खिलाफ इसी मैदान पर अनशन करते नजर आए थे.

2. गांधी मैदान
गांधी मैदान, वैसे तो बिहार की राजधानी पटना में स्थित है लेकिन यह दिल्ली में भी अपनी दखल रखता है. जी हां, कहने का तात्पर्य यह है कि गांधी मैदान में आयोजित होने वाली चुनावी रैलियां राज्य के साथ-साथ केन्द्र सरकार को भी प्रभावित करने का माद्दा रखती हैं. जानना दिलचस्प है कि आजादी से पहले गांधी मैदान को बांकीपोर मैदान और पटना लॉन के नाम से जाना जाता था.

गांधी मैदान की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि जब भी बताई जाती है उसमें नेताजी सुभाष चंद्र बोस का नाम जरूर आता है. दरअसल साल 1939 में नेताजी ने अपनी पार्टी फॉरवर्ड ब्लॉक की पहली रैली इसी मैदान में की थी. जयप्रकाश नारायण के द्वारा दिया गया ‘संपूर्ण क्रांति’ का नारा आपको याद होगा. जेपी ने 5 जून, 1974 को गांधी मैदान में ही यह नारा बुलंद किया था.

इसके अलावा गांधी मैदान में अब तक राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, पूर्व राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद, प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, जेबी कृपलानी, ईएमएस नंबूदरीपाद, राम मनोहर लोहिया, अटल बिहारी वाजपेयी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित कई नेताओं की रैलियों हो चुकी हैं.

3. ब्रिगेड परेड ग्राउंड
पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में स्थित ब्रिगेड परेड ग्राउंड हाल के दिनों में सुर्खियों में रहा. इसकी वजह थी राज्य की मुख्यमंत्री और तृणमूल क्रांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी द्वारा विपक्षी नेताओं को इसी मैदान में एक मंच पर लाना. 2019 के लोकसभा को ध्यान में रखते हुए विपक्षी पार्टियों द्वारा किया गया यह शक्ति प्रदर्शन काफी अहम माना जा रहा है. देखना दिलचस्प होगा कि विपक्ष की एकजुटता भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाले एनडीए गठबंधन किस हद तक चुनौती दे पाती है.

ब्रिगेड परेड ग्राउंड के बारे में कहा जाता है कि इसे 18वीं सदी में अंग्रजों द्वारा बनवाया गया था. समय गुजरने के साथ राजनेता इसका इस्तेमाल जनसभाओं के लिए करने लगे. साल 1972 में बांग्लादेश के पहले प्रधानमंत्री शेख मुजीब-उर-रहमान ने इस मैदान में एक विशाल जनसभा को संबोधित किया था. इस अवसर पर तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी मौजूद थीं.

वहीं, कम्युनिस्ट नेताओं के लिए ब्रिगेड परेड ग्राउंड काफी अहम रहा है. 90 के दशक में ज्योति बसु ने इसी मैदान में क्षेत्रीय पार्टियों को एकजुट करके शक्ति प्रदर्शन किया था.

मुख्यमंत्री ममता मनर्जी की भी कई यादें कोलकाता के इस मैदान से जुड़ी हुई हैं. ममता ने साल 1992 में इसी मैदान में यूथ कांग्रेस लीडर की हैसियत से माकपा को चुनौती दी थी. कुछ समय बाद वह कांग्रेस से अलग हो गईं और तृणमूल कांग्रेस का गठन किया. कुछ सालों के संघर्ष के बाद साल 2011 में वह वाममोर्चा को सत्ता से बेदखल करने में सफल हुईं.

ब्रिगेड परेड ग्राउंड देश के बाकी मैदानों से काफी अलग है. इस मैदान में चुनावी रैली का आयोजन कराना एक चुनौती मानी जाती है. दरअसल यह मैदान इतना बड़ा है कि यहां पर किसी राजनेता को सुनने के लिए भीड़ जुटा पाना आसान नहीं होता. कई बार सीटें खाली रह जाने के डर से नेताओं को अपनी रैलियां दूसरी जगहों पर करनी पड़ी हैं.

4. शिवाजी पार्क
शिवाजी पार्क महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई में स्थित है. इसकी गिनती राज्य के सबसे बड़े पार्कों में होती है. शिवाजी पार्टी में आयोजित होने वाली चुनावी रैलियों की गूंज महज राज्य ही नहीं बल्कि केंद्र सरकार के कानों तक भी पहुंचती है. शिव सेना के संस्थापक बाला साहब ठाकरे का इस मैदान से खास रिश्ता है.

ऐसा भी कहा जाता है कि बाला साहब ने अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत इसी मैदान से की थी. बताते हैं कि साल 1966 में बाला साहब ने अपनी पहली सार्वजनिक सभा को शिवाजी पार्क में ही संबोधित किया था.

शिवाजी पार्क मुंबई के दादर में स्थित है. क्या आप जानते हैं कि इसे आजाद मैदान और अगस्त क्रांति मैदान के नाम से भी जाना जाता था? जानकारों की मानें तो शिवाजी पार्क का निर्माण अंग्रेजों के शासनकाल में बाम्बे म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन द्वारा 1925 में कराया गया था.

इसका नामकरण सत्रहवीं सदी के महान राजा छत्रपति शिवाजी के नाम पर हुआ है. चलते-चलते यह भी जान लें कि शिवाजी पार्क में सचिन तेंदुलकर, विनोद कांबली, संजय मांजरेकर और अजीत अगरकर जैसे खिलाड़ी अपना हुनर तराश चुके हैं.

5. जंबूरी मैदान
जंबूरी मैदान पिछले कुछ सालों से अक्सर सुर्खियों में आता रहा है. और इसकी वजह है इस मैदान में आयोजित होने वाली चुनावी रैलियां या फिर मुख्यमंत्री पद के लिए शपथ ग्रहण समारोह का आयोजन. हाल ही में राज्य के निर्वाचित सीएम कमलनाथ ने भी जंबूरी मैदान में ही मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. इससे पहले भूतपूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी इस मैदान में सीएम पद की शपथ लिए थे.

जंबूरी मैदान का इतिहास बड़ा दिलचस्प है. साल 1990 में मध्य प्रदेश को स्काउट-गाइड जंबूरी की राष्ट्रीय मेजबानी मिली थी. इस आयोजन में दुनियाभर के स्काउट-गाइड कैडेट्स ने हिस्सा लिया था. यह आयोजन इतना पॉपुलर हुआ कि इस मैदान को जंबूरी नाम से ही जाने जाना लगा. धीरे-धीरे इस मैदान का इस्तेमाल राजनेता अपनी चुनावी रैलियों के लिए करने लगे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भी भोपाल के जंबूरी मैदान में आगमन हो चुका है.

6. रिज मैदान
हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में ऐतिहासिक रिज मैदान स्थित है. इस मैदान में अब तक कई ऐसी चुनावी रैलियां हो चुकी हैं जो इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं. 25 जनवरी, 1971 को इंदिरा गांधी ने रिज मैदान से ही हिमाचल प्रदेश को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की घोषणा की थी. इस प्रकार से हिमाचल के लोगों का रिज मैदान से भावनात्मक लगाव भी है.

साल 1977 में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री राजनारायण ने राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री शान्ता कुमार से रिज मैदान में जनसभा करने की इजाजत मांगी थी. लेकिन सीएम से उन्हें इसकी अनुमति नहीं मिली. इस पर राजनारायण ने शान्ता कुमार के खिलाफ बगावत की मुहिम छेड़ दी. अंत में शान्ता कुमार को मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़नी पड़ी.

7. रमाबाई अंबेडर मैदान
रमाबाई अंबेडर मैदान, भारत की राजनीति में अहम स्थान रखने वाले राज्य उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में स्थित है. इसे आम बोलचाल में रमाबाई मैदान कहा जाता है. यह मैदान 403 विधानसभा सीटों वाले राज्य उत्तर प्रदेश की राजनीति में अहम स्थान रखता है. इस मैदान में विशाल रैलियों का आयोजन करके राजनेता अक्सर अपना शक्ति प्रदर्शन करते रहते हैं. आए दिन यह मैदान किसी न किसी चुनावी रैली की वजह से मीडिया की सुर्खियों में आ जाता है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ-साथ कई नेता रमाबाई मैदान में चुनावी रैलियां कर चुके हैं. इसके अलावा इस मैदान में अक्सर सामाजिक कार्यकर्ता और आम लोग भी अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन करते रहते हैं. बता दें कि इस मैदान का नामकरण भारतीय संविधान के निर्माता बाबा साहब भीमराव अंबेडर की पत्नी रमाबाई के नाम पर हुआ है.