दिनकर जयंती: पीएम मोदी-शाह समेत पूरा देश कर रहा याद, चीन के हमले से आहत हो लिखी थी ये किताब

अमित शाह (Amit Shah) ने कहा, "राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी अपनी उपाधि के अनुरूप साहित्य जगत में अपने लेखन के माध्यम से एक सूरज की भांति चमके. उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अपनी कलम की शक्ति से अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी और आजादी के बाद अपने विचारों से समाज की सेवा की."

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर (Rashtrakavi Ramdhari Singh Dinkar) की आज (23 सितंबर) जयंती है. इस अवसर पर पूरा देश दिनकर को श्रद्धांजलि दे रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) समेत तमाम नेताओं ने राष्ट्रकवि दिनकर को विनम्र श्रद्धांजलि दी है. पीएम मोदी ने ट्वीट करके कहा, “राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर जी को उनकी जयंती पर विनम्र श्रद्धांजलि. उनकी कालजयी कविताएं साहित्यप्रेमियों को ही नहीं, बल्कि समस्त देशवासियों को निरंतर प्रेरित करती रहेंगी.”

इस अवसर पर गृहमंत्री अमित शाह ने ट्वीट करके कहा, “राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी अपनी उपाधि के अनुरूप साहित्य जगत में अपने लेखन के माध्यम से एक सूरज की भांति चमके. उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अपनी कलम की शक्ति से अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी और आजादी के बाद अपने विचारों से समाज की सेवा की.”


‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’

गृहमंत्री ने एक अन्य ट्वीट में कहा, “राष्ट्रीय भावनाओं से ओतप्रोत अपनी कविताओं से ‘दिनकर’ जी ने राष्ट्रीयता के स्वर को बुलंद किया. देश के लोकतंत्र पर हुए सबसे बड़े आघात आपातकाल का उन्होंने निडर होकर विरोध किया और उनकी कविता ‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’ उस आंदोलन का स्वर बनी. राष्ट्रकवि दिनकर को कोटिशः नमन.”


1962 में लिखी गई ‘परशुराम की प्रतीक्षा’ 

राष्ट्रकवि दिनकर के समकालीन हिंदी के प्राध्यापक बताते हैं कि देश पर चीनी आक्रमण से आहत होकर दिनकर ने साल 1962 में ‘परशुराम की प्रतीक्षा’ लिखी थी. साथ ही राष्ट्रकवि ने पटना विश्वविद्यालय के सीनेट हॉल में ‘परशुराम की प्रतीक्षा’ का काव्य पाठ किया था. वीर रस से भरी इस कविता को सुनकर छात्रों और शिक्षकों ने खूब तालियां बजाई थीं.

चार साल के अंदर 22 बार तबादला

रामधारी सिंह दिनकर के पोते अरविंद बताते हैं कि मैट्रिक की पढ़ाई पूरी करने के बाद वो गांव से पटना आ गए थे. 1932 में दिनकर ने पटना विवि से इतिहास में ऑनर्स की उपाधि हासिल की. इसके बाद 1934 में पटना निबंधन कार्यालय में सब रजिस्ट्रार के पद से उन्होंने नौकरी की शुरुआत की थी.

जानकार बताते हैं कि पटना के निबंधन कार्यालय में दिनकर पहले भारतीय रजिस्ट्रार थे. रजिस्ट्रार के पद पर रहते हुए उन्होंने हुंकार, रसवंती आदि रचनाएं लिखीं. अंग्रेजों के शासन में चार साल के अंदर 22 बार दिनकर का तबादला किया गया. इससे तंग आकर 1945 में उन्होंने नौकरी छोड़ दी.

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