आरबीआई ने रेपो रेट घटाया, बैंक से कर्ज लेना होगा सस्ता

रिजर्व बैंक अगर रेपो रेट कम करता है तो बैंकों के लिए ऋण लेना आसान होगा. यदि बैंक के लिए ऋण लेना आसान होगा तो ग्राहकों को भी कम ब्याज़ दर पर पैसा मिलेगा.

नई दिल्ली: भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने वर्तमान वित्त वर्ष की पहली मौद्रिक नीति समीक्षा में गुरुवार को वाणिज्यिक बैंकों के लिए रेपो रेट में 25 आधार अंक की कटौती की है. आरबीआई की रेपो रेट अब 6 प्रतिशत हो गई है.

इससे पहले आरबीआई ने फरवरी महीने में रिवर्स रेपो दर को 6 फीसदी और मार्जिनल स्टैंडिंग फैसिलिटी (एमएसएफ) दर और बैंक दर को 6.5 फीसदी कर दिया था.

आरबीआई ने यह कदम तरलता के संकट से निपटने के लिए उठाया है, जिससे चुनावी साल में अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलेगा.

बता दें कि शक्तिकांत दास ने दिसंबर महीने में भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर का कार्यभार संभाला था. उनके गवर्नर बनने के बाद से ही लगातार तरलता के संकट से निपटने की कोशिश की जा रही है.

रेपो रेट

वाणिज्यिक बैंक कामकाज के लिए केंद्रीय बैंक यानी कि भारतीय रिज़र्व बैंक से कर्ज़ लेता है. बाद में आरबीआई उनसे ऋण वसूलती है.

ऐसे में रिजर्व बैंक अगर रेपो रेट कम करता है तो बैंकों के लिए ऋण लेना आसान होगा. यदि बैंक के लिए ऋण लेना आसान होगा तो वो ग्राहकों को भी कम ब्याज़ दर पर पैसा दे पाएगें. ऐसा करने से लोग लेने वाले कस्टमर्स की संख्या बढ़ती है और फिर मार्केट में ज़्यादा पैसा आता है.

रिवर्स रेपो रेट

दिन भर के काम-काज के बाद बैंकों में जो रुपया बचता है उसे शाम में आरबीआई में जमा किया जाता है. बैंक इस पैसे के बदले में आरबीआई से ब्याज़ लेती है. इसी ब्याज़ को रिवर्स रेपो रेट कहते हैं.

दरअसल, रिवर्स रेपो रेट बाज़ारों में नकदी की तरलता को नियंत्रित करने के काम आती है. जब भी बाज़ारों में बहुत ज्यादा नकदी दिखाई देती है, आरबीआई रिवर्स रेपो रेट बढ़ा देता है, ताकि बैंक ज़्यादा ब्याज कमाने के लिए अपनी रकमें उसके पास जमा करा दें.

इस तरह बैंकों के कब्जे में बाज़ार में छोड़ने के लिए कम रकम रह जाएगी.