एक के ऊपर एक 12 लाशों का लगा था अंबार, पढ़ें जलियांवाला बाग नरसंहार की दिल दहलाने वाली कहानी

कभी-कभी गोलियां चलनी रुकती तो सिर्फ इसलिए क्योंकि सैनिकों को अपनी राइफ़लें फिर से लोड करनी होती थी. डायर ख़ुद दौड़-दौड़ कर गोलियां चलाने का हुक्म दे रहे थे.

नई दिल्ली: राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को जलियांवाला बाग हत्याकांड के शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की.

कोविंद ने ट्वीट किया, “आज से 100 साल पहले, हमारे प्यारे स्वतंत्रता सेनानियों को जलियांवाला बाग में शहीद कर दिया गया था. एक भयावह नरसंहार, सभ्यता पर एक दाग, बलिदान का वह दिन भारत कभी नहीं भूल सकता.”

वहीं, प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, “भारत उन सभी शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करता है जो उस दुर्भाग्यपूर्ण दिन शहीद हुए थे. उनकी वीरता और बलिदान को कभी नहीं भुलाया जा सकेगा. उनकी स्मृति हमें भारत के निर्माण के लिए और भी अधिक मेहनत करने के लिए प्रेरित करती है, जिस पर उन्हें गर्व होगा.”

शनिवार को जलियांवाला बाग कांड 100वीं बरसी है, 13 अप्रैल, 1919 का नरसंहार, ब्रिटिश कब्जे के खिलाफ भारत के स्वतंत्रता संग्राम के सबसे काले अध्यायों में से एक है.

क्या है जलियांवाला बाग हत्याकांड

Jallianwala Bagh Massacre, एक के ऊपर एक 12 लाशों का लगा था अंबार, पढ़ें जलियांवाला बाग नरसंहार की दिल दहलाने वाली कहानी

13 अप्रैल, 1919 को ब्रिटिश सेना द्वारा नरसंहार किया गया था, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए थे. अमृतसर के जालियांवाला बाग में जमा हुए निहत्थे लोगों को घेरकर चारों तरफ से गोलियां चलाई गई थी, जिसमें बड़ी संख्या में लोगों की मौत हुई थी.

इस घटना में ब्रिगेडियर जनरल रेजिनाल्ड डायर के नेतृत्व में ब्रिटिश सेना ने महिलाओं और बच्चों सहित सैकड़ों निहत्थे, निर्दोष भारतीयों पर गोलियां चलाईं, जो ब्रिटिश सरकार के दमनकारी रौलट अधिनियम के खिलाफ शांतिपूर्ण तरीके से विरोध कर रहे थे.

रेजीनॉल्ड एडवर्ड डायर

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कर्नल रेजीनॉल्ड एडवर्ड हैरी डायर ब्रिटिश सेना का एक अधिकारी था जिसे अस्थायी ब्रिगेडियर जनरल बनाया गया था. कर्नल रेजीनॉल्ड एडवर्ड हैरी डायर पंजाब (ब्रिटिश भारत) के शहर अमृतसर में जलियांवाला बाग़ नरसंहार के लिए उत्तरदायी था. आगे चलकर डायर के अपने पद से हटा दिया गया था, लेकिन वह ब्रिटेन में प्रसिद्ध नायक बन गया था. हालांकि कुछ इतिहासकारों का मानना है कि ब्रिटिश राज के अंत में डायर के इस क़दम की निर्णायक भूमिका थी.

जलियांवाला बाग हत्याकांड के पीछे की वजह

दरअसल पूरे देश में ब्रिटिश उपनिवेश के ख़िलाफ़ और आज़ादी के लिए आंदोलन चलाया जा रहा था. साल 1919 का पंजाब अंग्रेज़ों द्वरा लागू किए गए रॉलेट एक्ट के ख़िलाफ़ विद्रोह की ज्वालामुखी पर बैठा था. 8 मार्च, 1919 ई. को भारत में क्रान्तिकारियों के प्रभाव को ख़त्म करने और राष्ट्रीय भावना को कुचलने के लिए ब्रिटिश सरकार ने इस एक्ट को लागू किया था. यह क़ानून दरअसल न्यायाधीश ‘सर सिडनी रौलट’ की अध्यक्षता में बनी कमेटी के रिपोर्ट पर आधारित थी.

इस विधेयक के अनुसार मजिस्ट्रेट किसी भी संदेहास्पद व्यक्ति को गिरफ्तार कर मुकदमा चला सकता था. इस एक्ट को ‘बिना अपील, बिना वकील तथा बिना दलील’ का क़ानून भी कहा गया. इसके साथ ही इसे ‘काला अधिनियम’ एवं ‘आतंकवादी अपराध अधिनियम’ के नाम से भी जाना जाता है.

इस विधेयक को ‘रौलट एक्ट’ या ‘काला क़ानून’ के नाम से जाना गया. वहीं राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने इस एक्ट का पुरजोर विरोध किया और ब्रिटिश सरकार को ‘शैतानी लोगों’ की संज्ञा दी.

जलियांवाला बाग की आंखोदेखी

13 अप्रैल 1919 को शाम 5:30 बजे अमृतसर सड़कों से होते हुए दो बख्तरबंद गाड़ियां जलियांवाला बाग के पास एक संकरी गली के सामने रुकी. एक गाड़ी पर जनरल डायर दो अंगरक्षकों के साथ बैठे हुए थे जब वो अंदर घुसे तो बैंक क्लर्क ब्रज बेकाल अपनी नज़्म फ़रियाद पढ़ रहे थे.

जनरल डायर ने अंदर घुसने के महज़ 30 सेकेंड बाद बिना किसी चेतावनी के अंग्रेजी सेना को चिल्लाकर आदेश दिया- ‘फ़ायर’. उस 6 एकड़ के क्षेत्र में लगभग 15-20 हज़ार लोग बैठे हुए थे. सेना के पास ली एनफील्ड राइफल थी जिससे थ्री नोट थ्री बुलेट बरसायी जा रही थी.

इस रायफल की रेंज 3000 गज़ तक थी जबकि वहां मौौजूद लोग महज़ 300 फीट की दूरी पर बैठे थे. ऐसे में किसी का बच पाना नामुमकिन था. बुलेट अगर किसी ओरगेन या हड्डी के साथ टकराती थी तो वो फट जाती थी.

जान बचाने के लिए कई लोग भागने की कोशिश कर रहे थे, भगदड़ की वजह से भी काफी लोग मारे गए. कई जगह एक के ऊपर एक 10 से 12 लाशों का अंबार लगा हुआ था.

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नाइजल कोलिट अपनी किताब ‘द बुचर ऑफ़ अमृतसर’ में लिखा है, ‘कभी-कभी गोलियां चलनी रुकती तो सिर्फ इसलिए क्योंकि सैनिकों को अपनी राइफ़लें फिर से लोड करनी होती थी. डायर ख़ुद दौड़-दौड़ कर उस तरफ़ गोलियां चलाने का हुक्म दे रहे थे जिधर ज़्यादा लोग जमा हो रहे थे. बाद में सारजेंट एंडरसन जो जनरल डायर के बिल्कुल क़रीब खड़े थे ने इस बात की जानकारी दी थी.’

उन्होंने बताया, ‘जब गोलीबारी हुई तो पहले तो लगा कि पूरी की पूरी भीड़ ज़मीन पर धाराशयी हो गई है. फिर हमने कुछ लोगों को ऊंची दीवारों पर चढ़ने की कोशिश करते देखा. थोड़ी देर में मैने कैप्टन ब्रिक्स के चेहरे की तरफ़ देखा, ऐसा लगा कि उन्हें काफी दर्द महसूस हो रहा था. वो जनरल डायर की कोहनी की आस्तीन पकड़ने की कोशिश कर रहे थे. भारतीय सैनिकों का फ़ायर कंट्रोल और अनुशासन उच्चकोटि का था. डायर के सैनिकों ने लगभग 10 मिनट तक गोलियां चलाई. कुल मिलाकर 1650 राउंड चलाए गए प्रति सैनिक 33 राउंड.

भरपूर सिंह 13 अप्रैल 1919 को अपने दादा के साथ जलियांवाला बाग गए थे लेकिन उन्हें आज भी वो दृश्य पूरी तरह याद है.

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बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा, ‘लोग बदहवासी में होकर इधर-उधर दौड़ रहे थे. जैसे ही गोलियां चलनी शुरू हुई मेरे दादा मुझे उठाकर सैनिकों से दूर दीवार की तरफ दौड़ने लगे. जब उन्हें लगा कि बाहर जाने का कोई रास्ता नहीं है तो उन्होंने मुझे सात फीट ऊंटी दीवार के बाहर फेंक दिया. नीचे गिरने से मेरी बांह टूट गई लेकिन मैं वो कहानी सुनाने के लिए ज़िदा रहा. हम उस तकलीफ में भी इलाज़ के लिए अस्पताल नहीं गए क्योंकि हमें और परेशान किए जाने का डर था.’

वहीं दूसरी प्रत्यक्षदर्शी रतन देवी बीबीसी से बताती हैं, ‘लालटेन दिखाई दे रही थी सारी रात, लोग अपने परिजनों को ढूंढ़ रहे थे. एक के ऊपर एक लाश लगी थी तो लोग उसमें से अपने लोगों को निकालने और ढूंढ़ने की कोशिश कर रहे थे. पूरी रात लोग चिल्ला रहे थे. एक महिला अपने पति के लाश के पास पूरी रात लेटी रही इसी बीच कई लोगों को बचाने का भी प्रयास करती रही. घायल लोग पानी के लिए चिल्ला रहे थे.’

सुबह होने के बाद मानव रक्त की गंध सूंघकर गली के कुत्ते वहां पहुंच गए थे और सिर के ऊपर चिलें मंडरा रही थी जो मरे और घायल लोगों का मांस नोंच रही थी. शुरू में ब्रिटिश सरकार ने इस घटना को संज्ञान लेने से भी इनकार कर दिया लेकिन बाद में जब अफ़वाह और ख़बरे फैलना शुरू हुई तो ‘हंटर कमेटी’ बनाकर जांच का आदेश दिया गया.

21 साल बाद उधम सिंह ने माइकल डायर को मारकर लिया बदला

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ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर और लेफ़्टिनेंट गवर्नर माइकल ओ डायर इस हत्याकांड के सबसे बड़े गुनहगार थे. बीमारी की वजह से रेजीनॉल्ड डायर की 1927 में मौत हो गई. जबकि माइकल डायर रिटायर होने के बाद हिंदुस्तान छोड़कर लंदन में बस गया था. शहीद उधम सिंह माइकल ओ डायर से बदला लेने के लिए 1934 में लंदन पहुंचे. वहां उन्होंने एक कार और एक रिवॉल्वर खरीदी.

13 मार्च 1940 को उधम सिंह एक किताब में रिवॉल्वर छुपा कर कॉक्सटन हॉल के अंदर घुसे. यहां ओ डायर का भाषण चल रहा था. डायर का कहना था कि अगर उसे दोबारा से जलियांवाला बाग कांड करने का मौका मिले तो वो करेंगे. इसी बीच उधम सिंह ने उसपर गोली चलाकर उसकी हत्या कर दी.

वीर रस कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता दिलाती है याद

Jallianwala Bagh Massacre, एक के ऊपर एक 12 लाशों का लगा था अंबार, पढ़ें जलियांवाला बाग नरसंहार की दिल दहलाने वाली कहानी

जलियांवाला बाग नरसंहार की घटना को याद करते हुए वीर रस कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान ने ‘जलियांवाला बाग’ में बसंत शीर्षक नाम से एक कविता लिखी थी.

यहां कोकिला नहीं, काग हैं, शोर मचाते,
काले काले कीट, भ्रमर का भ्रम उपजाते।

कलियां भी अधखिली, मिली हैं कंटक-कुल से,
वे पौधे, व पुष्प शुष्क हैं अथवा झुलसे।

परिमल-हीन पराग दाग़ सा बना पड़ा है,
हां! यह प्यारा बाग़ खून से सना पड़ा है।

ओ, प्रिय ऋतुराज! किन्तु धीरे से आना,
यह है शोक-स्थान यहां मत शोर मचाना।

वायु चले, पर मंद चाल से उसे चलाना,
दुःख की आहें संग उड़ा कर मत ले जाना।

कोकिल गावें, किन्तु राग रोने का गावें,
भ्रमर करें गुंजार कष्ट की कथा सुनावें।

लाना संग में पुष्प, न हों वे अधिक सजीले,
तो सुगंध भी मंद, ओस से कुछ कुछ गीले।

किन्तु न तुम उपहार भाव आ कर दिखलाना,
स्मृति में पूजा हेतु यहां थोड़े बिखराना।

कोमल बालक मरे यहां गोली खा कर,
कलियां उनके लिये गिराना थोड़ी ला कर।

आशाओं से भरे हृदय भी छिन्न हुए हैं,
अपने प्रिय परिवार देश से भिन्न हुए हैं।

कुछ कलियां अधखिली यहां इसलिए चढ़ाना,
कर के उनकी याद अश्रु के ओस बहाना।

तड़प तड़प कर वृद्ध मरे हैं गोली खा कर,
शुष्क पुष्प कुछ वहां गिरा देना तुम जा कर।

यह सब करना, किन्तु यहां मत शोर मचाना,
यह है शोक-स्थान बहुत धीरे से आना।