स्टीलमैन के नाम से जानती थी दुनिया, पढ़ें- देश के विकास में अहम भूमिका निभाने वाले दोराबजी टाटा की कहानी

साल 1907 में दोराबजी टाटा (Dorabji Tata) ने टाटा स्टील (Tata Steel) और 1911 में टाटा पावर (Tata Power) की स्थापना की थी. 1919 में उन्होंने भारत की सबसे बड़ी जनरल इंश्योरेंस कंपनी 'न्यू इंडिया इंश्योरेंस कंपनी' बनाई.
dorabji tata on his birth anniversary, स्टीलमैन के नाम से जानती थी दुनिया, पढ़ें- देश के विकास में अहम भूमिका निभाने वाले दोराबजी टाटा की कहानी

एक कहावत अक्सर सुना करते थे कि जूते में बाटा और स्टील में टाटा का कोई जोड़ नहीं. तो अब ये भी जान लीजिये कि भारत में स्टील उद्योग (Steel Industry) की शुरुआत जमशेदपुर (Jamshedpur) में टाटा स्टील (Tata Steel) ने की, और इसकी नींव रखने वाले टाटा ग्रुप के पहले चेयरमैन दोराबजी टाटा (Dorabji Tata) की आज 161वीं जयंती है. 27 अगस्त, 1859 को मुबंई में उनका जन्म हुआ था. वो जमशेदजी नौसरवानजी टाटा और हीराबाई के बड़े बेटे थे. दुनिया उन्हें स्टीलमैन के नाम से जानती है. देश के विकास में उनकी अहम भूमिका रही है.

जमशेदपूर शहर को भी बसाया

साल 1907 में दोराबजी टाटा ने टाटा स्टील और 1911 में टाटा पावर की स्थापना की थी. 1919 में उन्होंने भारत की सबसे बड़ी जनरल इंश्योरेंस कंपनी ‘न्यू इंडिया इंश्योरेंस कंपनी’ बनाई. जमशेदपूर शहर को भी उन्होंने ही बसाया था. साल 1910 में उन्हें ब्रिटिश सरकार ने नाइटहूड से सम्मानित किया था.

बतौर पत्रकार बॉम्बे गजट अखबार में किया काम

दोराबजी टाटा जब भारतीय ओलंपिक संघ के अध्यक्ष थे, तो साल 1924 में हुए पेरिस ओलंपिक के लिए उन्होंने भारतीय दल की आर्थिक मदद भी की थी. दोराबजी ने बॉम्बे गजट अखबार में दो सालों तक बतौर पत्रकार काम किया था.

लोहे की खानों का ज्यादातर सर्वेक्षण उन्हीं के निर्देशन में पूरा हुआ. उन्होंने कारखाना लगाने के लिए ज़रूरी लोहा, मैंगनीज, कोयला समेत इस्पात खनिज पदार्थ की खोज की, और फिर कारखाना लगाने के लिए सही जगह की तलाश भी की थी. खनिज पदार्थों की खोज के लिए दोराबजी टाटा अप्रैल 1904 को मुंबई से निकले थे. तब उनके साथ दो विशेषज्ञ सर्वेयर सीएम वेल्ड और सापुरजी सकलतवाला थे.

बेतहाशा गर्मी में घने जंगलों और खतरनाक जानवरों से सामना

कहते हैं कि बेतहाशा गर्मी में महाराष्ट्र से जब ये मध्यप्रदेश के चंदा जिले में पहुंचे, तो इनका सामना घने जंगल और खतरनाक जानवरों से हुआ. इस मुश्किल सफर में इन्हें लौह अयस्क और चूना पत्थर के भंडार का पता चला, लेकिन लौह अयस्क और कोयले की कमी खल रही थी.

अभियान में विफल हुए तो सीएम वेल्ड अमेरिका वापस जाने की बात करने लगे, लेकिन दोराबजी ने उन्हें रोक लिया. फिर ये नागपुर पहुंचे, जहां सचिवालय में सेंट्रल प्रोविंस के नक्शे पर रिसर्च की. इससे पता चला कि नागपुर से 224 किलोमीटर दूर, दुर्ग में लौह अयस्क का बड़ा भंडार है. साथियों के साथ दोराबजी वहां गए, तो लौह अयस्क मिला, लेकिन चूना पत्थर, कोयला और पानी नहीं मिला.

मिली एडवर्ड-सेवन द्वारा नाइटहुड की उपाधि

कई साल की मशक्क़त के बाद फिर साकची और आसपास के इलाकों में लोहे का कारखाना लगाने के लिए ज़रूरी चीज़ें मिलीं तो कारखाने की नीव रखी गई, और साकची एक आदर्श शहर के तौर पर विकसित हुआ, जिसे बाद में जमशेदपुर के नाम से जाना गया. 1910 में दोराबजी टाटा को एडवर्ड-सेवन द्वारा नाइटहुड की उपाधि से नवाजा गया. सर दोराबजी की शादी 1897 में मेहरबाई से हुई, लेकिन उनकी कोई संतान नहीं हुई. वह अप्रैल 1932 में यूरोप गए, जहां 3 जून 1932 को जर्मनी के किसिंग्रन में उनकी मौत हो गई.

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