जम्मू-कश्मीर राजभाषा विधेयक पर अकाली दल ने कहा- पंजाबी के समर्थन में उठी आवाज को दबाया गया

शिरोमणी अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने कहा कि संसद के समक्ष 'जम्मू-कश्मीर राजभाषा विधेयक- 2020' को मंजूरी के लिए रखते समय संसदीय प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया.

SAD President Sukhbir Singh Badal
Sukhbir Singh Badal

शिरोमणी अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने आज जम्मू-कश्मीर राजभाषा विधेयक, 2020 को लेकर अपनी बात रखी है. सुखबीर सिंह बादल ने कहा कि यह गहरी चिंता का विषय है कि संसद के समक्ष विधेयक को मंजूरी के लिए रखते समय संसदीय प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया. उन्होंने कहा कि इस विधेयक को कल न तो लोकसभा के एजेंडे में और न ही आज राज्यसभा में रखा गया था. आज भी यह विपक्ष की अनुपस्थिति में अंतिम क्षणों में पारित किया गया है.

उन्होंने कहा कि यह बेहद निंदनीय है कि पंजाबी भाषा के समर्थन में जम्मू-कश्मीर के लोगों की आवाज को दबाया गया है. सरदार सुखबीर सिंह बादल ने इस तथ्य की निंदा की कि इस विधेयक को जम्मू-कश्मीर के अन्य क्षेत्रीय दलों की आपत्तियों पर विचार किए बिना मंजूरी के लिए लिया गया था.

‘संविधान के अनुसार एक मान्यता प्राप्त भाषा थी’

उन्होने लोकसभा में बोलते हुए कहा कि पंजाबी न केवल केंद्र शासित प्रदेश में बड़ी संख्या के लोगों की मातृभाषा थी बल्कि पूर्ववर्ती जम्मू-कश्मीर राज्य के संविधान के अनुसार एक मान्यता प्राप्त भाषा भी थी.

‘नेशनल कांफ्रेंस के फारूख अबदुल्ला जोकि जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री हैं ने मेरा समर्थन किया और कहा कि बड़ी संख्या में कश्मीरी पंजाबी भाषा बोलते हैं. पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) ने भी केंद्र शासित प्रदेश में पंजाबी को राजभाषा के रूप में शामिल करने का समर्थन किया है.’

‘1981 तक उर्दू के साथ-साथ एक अनिवार्य भाषा भी थी’

सरदार बादल ने कहा कि महाराजा रंजीत सिंह के खालसा राज के समय से ही जम्मू-कश्मीर में पंजाबी बोली जा रही थी और इसे शिक्षा के माध्यम के रूप में व्यापक रूप से इस्तेमाल किया जाता था और 1981 तक उर्दू के साथ साथ एक अनिवार्य भाषा भी थी. जम्मू-कश्मीर के पहले प्रधानमंत्री मेहर चंद महाजन पंजाबी थे और अब भी पंजाबियों की आबादी राज्य का तीन प्रतिशत है.

पंजाबियों की भावनाओं को ठेस पहुंची- सुखबीर सिंह

सरदार बादल ने इस पूरे घटनाक्रम को लोकतंत्र के लिए दुखद दिन बताते हुए कहा कि संविधान के निर्माता भारत के एक बहु-धार्मिक, बहुसांस्कृतिक और बहुभाषी राष्ट्र के रूप में एक दृष्किोण से प्रेरित थे और क्षेत्रीय भाषाओं के प्रति सम्मान को इस आदर्श के संरक्षण और संवर्धन के लिए इसे एक महत्वपूर्ण लड़ी के रूप में देखा जाता था.

उन्होंने इस बात पर रोष जताया कि जहां पंजाबी को राजभाषा की सूची से बाहर रखा गया है, वहीं अंग्रेजी को इस सूची में शामिल किया गया है. उन्होंने कहा कि इससे जम्मू-कश्मीर के साथ साथ हर जगह पंजाबियों की भावनाओं को ठेस पहुंची है.

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