व्यंग्य: बजट के ‘हलवे’ से याद आया… #चेंजयोरमाइंडसेट #इंट्रोड्यूसन्यूग्रोथरेट

सरकार बगैर देर किए राष्ट्रवाद, हिंदुत्व और पाकिस्तान सरीखे कुछ नए सूचकांक जेनरेट करे. अगर राहुल बाबा कह सकते हैं कि गरीबी तो बस मन की अवस्था है, तो देशवासियों के दिमाग में उन्नत और उर्वर हो रहे राष्ट्रवाद को मन की एक बड़ी सकारात्मक अवस्था क्यों न माना जाए?
Satire on budget halwa ceremony, व्यंग्य: बजट के ‘हलवे’ से याद आया…  #चेंजयोरमाइंडसेट #इंट्रोड्यूसन्यूग्रोथरेट

बजट का हलवा बन और बंट चुका है. एक देसी कहावत है. हलवा टाइट होना. देश के कुछ दुखचिंतक और विलाप पसंद लोग कह रहे हैं कि रोजगार के क्षेत्र में हलवा टाइट है. महंगाई ने आम आदमी का हलवा टाइट कर रखा है. किसानों का हलवा टाइट है और कुल मिलाकर इकॉनमी का हलवा टाइट है. निर्मला मैडम और अनुराग सर को इन रुदालियों को सुनने की जरूरत नहीं है. हम तो कहेंगे कि हलवे की ‘मीठी गोली’ बनाएं और बजट के साथ बांट दें. जनता मस्त, दुखचिंतक पस्त.

लेकिन ये तो टेंपररी अरेंजमेंट है. वित्त मंत्री जी के लिए मेरी एक दीर्घकालिक योजना है. रुदालियों की टोली को जवाब देने का वक्त आ गया है. अर्थव्यवस्था की नई परिभाषा गढ़ने का मौका भी है और दस्तूर भी. विलापियों के आंसुओं का पानी सिर के ऊपर से गुजर रहा है.

सरकार बगैर देर किए राष्ट्रवाद, हिंदुत्व और पाकिस्तान सरीखे कुछ नए सूचकांक जेनरेट करे. अगर राहुल बाबा कह सकते हैं कि गरीबी तो बस मन की अवस्था है, तो देशवासियों के दिमाग में उन्नत और उर्वर हो रहे राष्ट्रवाद को मन की एक बड़ी सकारात्मक अवस्था क्यों न माना जाए? और इसके प्रखर होते स्वरूप के लिए सरकार को क्यों न क्रेडिट मिले?

इसी तरह से पाकिस्तान की ‘दैनिक जुबानी ठुकाई’ भी तो हमारी उपलब्धियों में शुमार है! इस मोर्चे पर हुए ग्रोथ का भी तो आकलन हो. और हां, हिंदुत्व को भला कैसे भूल सकते हैं? ये तो दरअसल न्यू इंडिया की प्राण वायु है. देश में हिंदुत्व की भावना 100-200 प्रतिशत के ग्रोथ रेट से बढ़ रही हो, तो क्या इसके लिए मुए इकॉनमी के 2-3 प्रतिशत ग्रोथ की कुर्बानी हम राष्ट्रभक्त नहीं दे सकते?

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एक सूचकांक सोशल मीडिया का भी हो. सोशल मीडिया पर गालियों की ग्रोथ रेट को हम कैसे नजरअंदाज कर सकते हैं? कितना सकारात्मक बदलाव आया है देश में. सोशल मीडिया पर अपनी एक पोस्ट पर हजार-पांच सौ गालियां पड़ जाएं, तो कितनी चैन की नींद आती है! कुछ लोगों का दिन तो 25-50 गालियों में भी बन जाता है. आखिर यही तो धर्म हमें सिखाता है. निंदा में भी विचलित न होना. विचलित तो क्या, यहां तो हम अपनी निंदा सुनकर फूले नहीं समा रहे. आह्लादित हैं. फेल हो चुके हैं सतयुग-द्वापर-त्रेता के ऋषि-मुनि.

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रुदालियों ने फालतू ही इकॉनमी की ग्रोथ रेट का रोना लगा रखा है. ये सबके-सब घिसी-पिटी पुरातन सोच वाले लोग हैं. ऐसे लोगों के लिए ‘रिवाइज्ड’ नागरिकता कानून आना चाहिए. इस नए कानून के प्रारूप का खुलासा और इस पर चर्चा बाद में. फिलहाल सोचो इंडिया. उपरोक्त तमाम मोर्चों पर दिख रहे बेमिसाल ग्रोथ के बारे में सोचो. अपने नीति-निर्माताओं को सराहो.

पिछले दिनों अपने गडकरी साहब इंदौर में थे. एक रोबोट से सवाल पूछ लिया. देश की अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए आपके क्या सुझाव हैं? रोबोट ने कहा- हम निश्चित ही 5 ट्रिलियन डॉलर की इकॉनमी का लक्ष्य हासिल कर लेंगे. सवाल से ऐसा लगता है कि गडकरी साहब मान रहे हैं कि इकॉनमी में दिक्कतें हैं. माना कि गडकरी धुन और काम के पक्के माने जाते हैं. लेकिन ये क्या बात हुई? निर्मला मैम ने तो कभी किसी रोबोट से नहीं पूछा कि देश में सड़कों पर कितने गड्ढे हैं?

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खैर, रोबोट ने जवाब चंगा दिया. यकीन मानिए 5 ट्रिलियन डॉलर की इकॉनमी की बात करते हुए उसने उपर वर्णित नए और नायाब सूचकांकों के ग्रोथ को भी कैलकुलेट किया होगा. राष्ट्रवाद, हिंदुत्व और पाकिस्तान जैसे सूचकांक अगर अवाम को उतनी खुशी दे देते हैं, जितनी कि 1 ट्रिलियन डॉलर की इकॉनमी दे सकती है, तो ‘परंपरागत बुढ़ियाए इकॉनमी’ के 4 ट्रिलियन डॉलर के आंकड़े पर पहुंचते ही हम 5 ट्रिलियन डॉलर के लक्ष्य को स्वत: ही छू लेंगे. 4 प्लस 1 आखिर 5 ही तो होता है.

आखिर रुपये-पैसे या पद-प्रतिष्ठा को हम खाते तो हैं नहीं. इनसे मिलने वाला सुख ही तो आखिरी सत्य और लक्ष्य है. न्यू इंडिया को अगर पाकिस्तान को जुबान से ठोक कर, हिंदुत्व के नारे लगाकर, राष्ट्रवाद की रौ में बहकर सुख मिल रहा है, तो ये सब भी देश की समृद्धि जाहिर करने वाले सूचकांकों में क्यों न हों? तो आज से चला दीजिए अभियान- “#चेंजयोरमाइंडसेट” “#इंट्रोड्यूसन्यूग्रोथरेट”

फिर न सुब्रह्मण्यम साहब को नोट पर लक्ष्मी जी की तस्वीर छापने की सलाह देनी पड़ेगी और न गडकरी जी को रोबोट से इकॉनमी में सुधार की सलाह मांगनी पड़ेगी.

(डिस्क्लेमर : ग्रोथ रेट के उपरोक्त नवीन सूचकांकों की कॉपीराइट लेखक के पास रिजर्व है. लागू करते हुए क्रेडिट देना न भूलें. इन दिनों कई बार क्रेडिट से भी पेट भर जाता है.)

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