व्यंग्य: समाजवादी पार्टी ने निगल लिया एक उभरता हुआ एक्टिंग का सितारा, नाम-फिरोज खान

सारी दुनिया ने अपनी खुली आंखों से देखा कि फिरोज खान एक्सप्रेशन के साथ कैसे एक्सपेरिमेंट कर सकते हैं.

गांधी जयंती पर महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि सभी देते हैं. इस बार उन लोगों ने भी दी जो कभी नहीं देते थे. यही अबकी बार नया हुआ था. एक और नई चीज ये हुई कि वीडियो वायरल हो गया. वीडियो में गांधी प्रतिमा दिख रही थी, उसके नीचे झक सफेद कपड़ों में नेता जी दिख रहे थे. नेता जी फूलों की बजाय आंसू अर्पित कर रहे थे. फफक-फफक कर रो रहे थे.

फेसबुक-ट्विटर-व्हाट्सऐप यानी इंटरनेट की दसों दिशाओं में इनका ही गुणगान हो रहा था. पता चला कि ये जगह उत्तर प्रदेश के संभल जिले का फव्वारा चौक है. नेताजी समाजवादी पार्टी के जिलाध्यक्ष फिरोज खान हैं. इससे पहले भी फिरोज खान कारनामे कर चुके हैं. एक बार इन्हें अखिलेश यादव से मिलना था. 14 सितंबर को अखिलेश यादव रामपुर में आजम खान के समर्थन में प्रदर्शन करने वाले थे. वहां फिरोज को भी जाना था लेकिन प्रशासन ने इजाजत नहीं दी थी. तो खुद दूल्हा बनकर, सेहरा बांधकर निकल गए और कार्यकर्ता बाराती बनकर गाड़ियों में आ गए.

ये भावुकता और स्टंट करने की क्षमता बताती है कि फिरोज खान ‘फिरोज खान’ बन सकते थे. इनके अंदर भरा पूरा हीरो प्रोडक्ट है. इन्हें पता है कि कितनी देर रोने से अच्छा वीडियो शूट हो जाएगा. कहां स्टार्ट करना है, कहां कट करना है. साथ आए लोगों से कैसा रिएक्शन लेना है. ये सारी जानकारी एक मंझे हुए कलाकार को रहती है. फिरोज खान ने साबित कर दिया है कि अगर उन्हें कुसंग के कारण राजनीति में न लाया जाता तो वो नेटफ्लिक्स पर आ रहे होते.

ये राजनैतिक पार्टियां हमारे देश में मौजूद टैलेंट को निगलती जा रही हैं. संबित पात्रा कितने अच्छे सिंगर थे लेकिन उन्हें बीजेपी ने देखो क्या बना दिया. अब उन्हें डिबेट में गंभीर मुद्दों पर हंसी मजाक करने के लिए बुलाया जाता है. कांग्रेस के शशि थरूर को इंगलिश का प्रोफेसर होना चाहिए था लेकिन सब बेकार कर दिया. उसी तरह सपा ने फिरोज खान के टैलेंट के साथ न्याय नहीं किया है. राजनीति तो बुढ़ापे में भी हो जाती है. कला को सारी उम्र साधना पड़ता है. यही सही मौका है. फिरोज खान को राज ठाकरे की नजरों से बचकर मुंबई चले जाना चाहिए.