, सऊदी के क्राउन प्रिंस ने क्यों नहीं लिया ‘पुलवामा-पाकिस्तान’ का नाम!
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सऊदी के क्राउन प्रिंस ने क्यों नहीं लिया ‘पुलवामा-पाकिस्तान’ का नाम!

, सऊदी के क्राउन प्रिंस ने क्यों नहीं लिया ‘पुलवामा-पाकिस्तान’ का नाम!

भारत दौरे पर आए सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने भारत की आतंकवाद पर चिंता को साझा तो किया लेकिन साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस में पाकिस्तान का नाम तक लेना ज़रूरी नहीं समझा. अलबत्ता आतंकवाद पर भारत को सऊदी अरब के सहयोग का भरोसा ज़रूर मिला. विदेश मंत्रालय के शीर्ष अधिकारी ने बाद में बताया कि पुलवामा आतंकी हमले में पाकिस्तान की संलिप्तता को दोनों नेताओं के बीच बातचीत में उठाया गया. सबसे अहम तो ये है कि महज़ दो दिन पहले क्राउन प्रिंस ने पाकिस्तान की यात्रा पूरी की थी. इस दौरान उन्होंने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को भी आर्थिक सहयोग के कई वादे किए थे.

बातों में विरोध, कागज़ों पर संकोच

पीएम मोदी जब पुलवामा हमले को आतंकवाद की समस्या का क्रूर संकेत बता रहे थे तब सऊदी अरब के युवराज ने पुलवामा का नाम तक नहीं लिया. उनका ज़्यादा ज़ोर दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंधों को नई ऊंचाइयों पर ले जाने पर रहा. क्राउन प्रिंस भारत को सौ अरब डॉलर के विदेशी निवेश का सपना दिखा रहे थे. ये ठीक है कि भारत आर्थिक प्रगति को लेकर गंभीर है लेकिन ये भी सच है कि आतंकवाद की लंबी लड़ाई में भारत को सऊदी अरब का सहयोग चाहिए. ये एक खुली बात है कि पाकिस्तान के विभिन्न आतंकवादी संगठन आर्थिक तौर पर सऊदी अरब के दान दाताओं पर निर्भर हैं. अगर सऊदी अरब अपने दान दाताओं पर नकेल कसे तो बहुत संभव है कि आतंक की रीढ़ आसानी से टूट जाए.

 

भारत ने सऊदी क्राउन प्रिंस की यात्रा के दौरान बार-बार उनका ध्यान आतंकवादी संगठनों की ओर दिलाया है. इतना ही नहीं उन्हें संयुक्त राष्ट्र में आतंकियों पर प्रतिबंध लगाए जाने की अहमयित भी बताई गई है.  उम्मीद की जा सकती है कि जब भारत अगली बार संयुक्त राष्ट्र में सुरक्षा परिषद के सामने मसूद अज़हर को बैन करने का प्रस्ताव लाएगा तो सऊदी अरब का भी साथ मिलेगा. यहां ये ध्यान देने लायक बात है कि पाकिस्तान और सऊदी अरब ने इसी सोमवार को एक संयुक्त बयान में संयुक्त राष्ट्र सूचीबद्धता तंत्र के ‘राजनीतिकरण’ से परहेज करने की बातें कही थीं. ये बयान भारत पर निशाना साधता प्रतीत हो रहा था मगर अब भारत ने सऊदी अरब के सामने अपना पक्ष रखकर बताया है कि क्यों मसूद अज़हर को वैश्विक आतंकी घोषित करना ज़रूरी हो चला है.

उधर सऊदी अरब के विदेश मंत्री अदेल बिन अहमद अल जुबेर ने एक इंटरव्यू में साफ कहा कि किसी भी आतंकवादी या आतंकवाद का समर्थन और आर्थिक मदद करनेवाले किसी भी शख्स को संयुक्त राष्ट्र के ज़रिए प्रतिबंधित किया जाना चाहिए. उन्होंने इस बात से भी इनकार किया कि वैश्विक संगठनों में अज़हर को बैन करने के भारत की कोशिशों का सऊदी अरब विरोध करता है.

 

सऊदी अरब का धर्मसंकट

अपनी बातों में आतंक का विरोध लेकिन औपचारिक बयान में पुलवामा या पाकिस्तान का नाम लेने से परहेज असल में सऊदी अरब का धर्मसंकट ही ज़्यादा दिखा रहा है. वो भारत और पाकिस्तान दोनों ही देशों से अपने संबंध अच्छे रखना चाहता है. इमरान खान के शासन के आठ महीनों में सऊदी अरब ने ही उनकी सबसे ज्यादा मदद की है. पाकिस्तान सऊदी अरब से बीस बिलियन डॉलर के निवेश की अपेक्षा रखता है. हिचकोले खाती अपनी अर्थव्यवस्था को स्थिर बनाने के लिए पाकिस्तान को सऊदी अरब का सहारा किसी भी हाल में चाहिए. उधर सऊदी अरब धार्मिक आधार पर तो पाकिस्तान के साथ अपनी समानता देखता ही है, मध्यपूर्व में उसे पाकिस्तान का साथ ईरान के खिलाफ भी चाहिए. मोहम्मद बिन सलमान के सामने चुनौती अपनी प्रगतिशील छवि को मज़बूत करने की तो है ही, साथ ही धार्मिक आधार पर इस्लामिक जगत की ठेकेदारी भी वो छोड़ नहीं सकता है.

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